गरुड़ पुराण
Garuda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें| ४१६ | संक्षिप्त गरुडपुराण | [ आचार- |
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बहुत बड़ा साधन कहा है। भगवान् त्रिलोकीनाथ विष्णुके नाम तथा कर्मादिके कीर्तनमें तन्मय होकर जो लोग प्रसन्नताके आँसू बहाते हैं और रोमाञ्चित होकर गद्गद हो उठते हैं, वे ही उनके भक्त हैं—
ते भक्ता लोकनाथस्य नामकर्मादिकीर्तने॥
मुञ्चन्त्यश्रूणि संहर्षाद्घो प्रहृष्टतनूरुहाः।
(२२७।३-४)
अतः हम सभीको जगत्स्रष्टा देवदेवेश्वर भगवान् विष्णुके दिव्य उपदेशोंका अनुसरण करना चाहिये। वे ही वैष्णव हैं, जो वेद-शास्त्रोंके अनुसार अवश्यकरणीय नित्य-कर्मोंका पालन करते हुए श्रीविष्णुके प्रति अति स्निग्ध रहते हैं तथा भक्तिप्रवणताके कारण अद्वैतभावसे स्वयंको पृथक्कर जिन नामोंका स्मरण स्वयं भगवान् भी करते हैं, उन मङ्गलमय नामोंका श्रवण-कीर्तन करनेके साथ स्वामि-सेवकभावसे सदा भगवान् श्रीविष्णुको प्रणाम किया करते हैं। वे ही महाभागवत हैं, जो श्रीविष्णुके भक्तजनोंके प्रति वात्सल्यभाव रखते हैं तथा श्रीविष्णुके पूजन एवं उनकी आज्ञाका अनुसरण करते हैं। भगवान् श्रीविष्णुकी मङ्गलमयी कथाओंके श्रवणमें ही अतिशय प्रीतिपूर्वक सदा लीन रहते हैं तथा अपने नेत्र आदि समस्त अङ्गोंकी समस्त चेष्टाएँ भगवान्की सेवाके लिये ही समर्पित किये रहते हैं। संक्षेपमें यह समझना चाहिये कि जो लोग पूर्ण समर्पणभावसे श्रीविष्णुकी भक्तिमें ही अपने मनको निरन्तर एकाग्र रखते हैं, वे ही परम भागवत हैं। इन परम महाभागवत लोगोंका मुख्य लक्षण यह है कि ये लोग ब्राह्मणोंमें ही श्रीविष्णुका सदा निवास मानकर उनकी सेवामें सदा लगे रहते हैं। ये लोग अपने समस्त साधनोंको भी श्रीविष्णुके चरणोंमें ही समर्पित किये रहते हैं। श्रीविष्णुकी सेवाके लिये ही सांसारिक संगोंसे दूर रहते हैं। श्रीविष्णुको ही अपना एकमात्र आश्रय मानकर उन्हींकी अर्चामें सदा तत्पर रहते हैं।<sup>१</sup>
वैष्णव या महाभागवत जिस श्रीविष्णुभक्तिको अपना सर्वस्व मानते हैं, वह (श्रवण, कीर्तन, स्मरण, पादसेवन, अर्चन, वन्दन, दास्य तथा सख्य-भेदसे) आठ प्रकारकी होती है। इसमें म्लेच्छ व्यक्ति भी अधिकारी माना गया है। इस संसारमें तो वही श्रेष्ठ ब्राह्मण है, वही मुनि है, वही ऐश्वर्यसे सम्पन्न है और वही मोक्षको प्राप्त करता है, जो भगवान् हरिकी भक्तिमें तन्मय रहता है। जो भगवद्भक्त है, उसीको दान देना चाहिये, उसीसे दान लेना चाहिये, उसीकी हरिकी भाँति पूजा करनी चाहिये। भगवद्भक्त द्विजोत्तमका स्मरण कर, उनके साथ भाषण कर, उनका पूजन कर हम अपनेको पवित्र कर लेते हैं। यदि कोई भगवद्भक्त चाण्डालजातिका है तो वह भी अपनी पवित्र भक्तिकी महिमासे हम सबको पवित्र कर देता है।<sup>२</sup>
'हे नाथ! आप मुझपर दया करें, मैं आपकी शरणमें हूँ' ऐसा जो प्राणी कहता है, उसको भगवान् हरि सम्पूर्ण प्राणियोंसे अभय कर देते हैं, किसीसे भी उसको भय नहीं होता, यह भगवान्की प्रतिज्ञा है—
दयां कुरु प्रपन्नाय तवास्मीति च यो वदेत्।
अभयं सर्वभूतेभ्यो दद्यादेतद् व्रतं हरेः॥
(२२७।११)
१-प्रणामपूर्वकं भक्त्या यो वदेद्वैष्णवो हि सः। तद्भक्तजनवात्सल्यं पूजनं चानुमोदनम्॥
तत्कथाश्रवणे प्रीतिरश्रूनेत्राङ्गविक्रियाः। येन सर्वात्मना विष्णौ भक्त्या भावो निवेशितः॥
विप्रेभ्यश्च कृतात्मत्वान्महाभागवतो हि सः। विक्षेपोपकरणं नित्यं तदर्थं सङ्गवर्जनम्।
स्वयमभ्यर्चनं चैव यो विष्णुं चोपजीवति॥ (२२७।६-८)
२-भक्तिरष्टविधा ह्येषा यस्मिन् म्लेच्छेऽपि वर्तते। स विप्रेन्द्रो मुनिः श्रीमान् स याति परमां गतिम्॥
तस्मै देयं ततो ग्राह्यं स च पूज्यो यथा हरिः। स्मृतः सम्भाषितो वापि पूजितो वा द्विजोत्तमः॥
पुनाति भगवद्भक्तश्चण्डालोऽपि यदृच्छया॥ (२२७।९-१०)