गरुड़ पुराण
Garuda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंकाण्ड ] भगवद्भक्तिनिरूपण तथा भक्तोंकी महिमा ४१७
मन्त्रका जप करनेवाले हजार जपकर्ताओंकी अपेक्षा सभी वेदान्तदर्शनों, शास्त्रोंमें पारंगत विद्वान् श्रेष्ठ है। सर्ववेदान्तनिष्णात करोड़ों विद्वानोंकी अपेक्षा विष्णुभक्त श्रेष्ठ है। जो लोग भगवान् विष्णुमें ऐकान्तिक भक्ति रखते हैं, वे सशरीर श्रीविष्णुके परमपदको प्राप्त करनेमें सफल हो जाते हैं। श्रीविष्णुभक्तिको ही परम पुरुषार्थ माननेवाले एकान्ती भक्त हैं। इनका चित्त सर्वात्मना भागवत होता है। ऐसे परम भागवत श्रीविष्णुके ही समान हो जाते हैं, किंबहुना, श्रीविष्णु ऐसे परम भागवत भक्तोंके परायण (सर्वथा अभिन्न) रहते हैं। ये परम भागवत भक्त देवदेव श्रीविष्णुके परम प्रिय लोगोंसे भी अधिक सुप्रिय होते हैं। इनकी भक्ति अव्यभिचारिणी (नितान्त सुदृढ़) होती है। इसीलिये कठिन-से-कठिन आपत्कालमें भी यह भक्ति सुस्थिर रहती है। ये परम भागवत भक्त सदा यही प्रार्थना करते रहते हैं—'प्रभो! विष्णो! विषयोंमें जो अधिकाधिक स्थिर प्रीति होती है, वही आपका स्मरण करते हुए मुझमें सदा अविचल-भावसे बनी रहे।' यह विशेष रूपमें ध्यातव्य है कि प्रभु श्रीविष्णुकी ही भक्ति करनी चाहिये। यदि कोई अन्य किसीके प्रति दृढ़ भक्त है, सर्वेश्वर प्रभुका भक्त नहीं है तो वेदादि समस्त शास्त्रोंके अर्थका पारङ्गत होनेपर भी वह वास्तवमें पुरुषाधम ही है। जिसने वेद या अन्य शास्त्रोंका अध्ययन नहीं किया है, जो यज्ञादिक पुण्यकर्मोंको अपने जीवनमें सम्पन्न करनेसे वञ्चित रह गया है, वह भी यदि भगवान् विष्णुमें भक्ति रखता है तो (समझना चाहिये कि) उसने सब कुछ कर लिया है। जो लोग याज्ञिक हैं, अश्वमेध, राजसूयादिक मुख्य यज्ञोंको करनेवाले हैं और वेदोंके पारंगत हैं, वे मुनिसत्तम (मुनिश्रेष्ठ) भी उस परमगतिको प्राप्त नहीं कर पाते, जिस परमगतिको विष्णुभक्त अपनी भक्तिसे प्राप्त कर लेते हैं। इस संसारमें जो मनुष्य निर्दयी हैं, दुष्टात्मा हैं तथा दुराचारमें लगे रहते हैं, वे भी यदि भगवान् विष्णु नारायणकी भक्तिमें संलग्न हों तो उन्हें परमगतिकी प्राप्ति होती है। जब मनुष्यकी भक्ति भगवान् जनार्दनके प्रति अचल और दृढ़ हो जाती है, तब उसके लिये स्वर्गका सुख कितना महत्त्व रखता है! वह भक्ति ही उसके लिये मुक्ति है। हे शौनक! इस संसारके दुर्गम कर्ममार्गमें भ्रमण करते हुए मनुष्योंके लिये भक्ति ही एकमात्र अवलम्ब है, जिसके करनेसे जनार्दन संतुष्ट होते हैं। जो मनुष्य देवाधिदेव विष्णुके दिव्य गुणोंको नहीं सुनता, वह बहरा है और सभी धर्मोंसे बहिष्कृत है। हरिनाम-संकीर्तनसे जिस व्यक्तिका शरीर रोमाञ्चित नहीं हुआ, उसका वह शरीर मृतकके समान है। हे द्विजश्रेष्ठ! जिसके अन्तःकरणमें विष्णुभक्ति विद्यमान रहती है, उसे यथाशीघ्र ही इस संसारके आवागमन-चक्रसे मुक्ति प्राप्त हो जाती है। जिन मनुष्योंका मन हरिभक्तिमें रमा हुआ है, उनके सभी पापोंका विनाश सब प्रकारसे निश्चित है।
हाथमें पाश लेकर खड़े हुए अपने दूतको देखकर यमराज उसके कानमें कहते हैं कि हे दूत! तुम उन लोगोंको छोड़ देना जो मधुसूदन विष्णुके भक्त हैं। मैं तो अन्य दुराचारी और पापियोंका स्वामी हूँ, वैष्णवोंके स्वामी स्वयं हरि हैं। श्रीविष्णुने स्वयं कहा है कि यदि दुराचारी व्यक्ति भी मुझमें अनन्य भक्ति रखता है तो वह साधु ही है; क्योंकि उसने भक्तिका निश्चय कर लिया है कि श्रीविष्णुकी भक्तिके समान अन्य कुछ भी नहीं है। निश्चयपूर्वक भगवान्की भक्तिमें अनन्य भावसे लगा हुआ व्यक्ति तुरंत धर्मात्मा हो जाता है और उसको शाश्वत शान्ति प्राप्त होती है। हे द्विजश्रेष्ठ! आप ऐसा निश्चित ही जान लें कि विष्णुभक्तका कभी विनाश नहीं होता। समस्त संसारके मूल कारण भगवान् हरिमें जिस मनुष्यकी भक्ति स्थिर रहती है, उसके लिये धर्म, अर्थ और काम—इस त्रिवर्गका कोई महत्त्व नहीं है; क्योंकि परम सुखरूप मुक्ति ही उसके हाथमें सदा रहती है। यह जो हरिकी त्रिगुणात्मिका दैवी माया है, उसको वे लोग पार करते हैं जो हरिकी शरणमें