भारतकोश
गरुड़ पुराण

गरुड़ पुराण

Garuda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 430
४२०संक्षिप्त गरुडपुराण[ आचार-

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पाथेयं पुण्डरीकाक्ष नामसंकीर्तनं हरेः।
संसारसर्पदंशष्टविषचेष्टैकभेषजम् ॥
(२२८।१७)

कृतयुगमें भगवान् हरिका ध्यान करते हुए, त्रेतायुगमें इन्हीं भगवान् हरिके मन्त्रोंका जप करते हुए, द्वापरमें इन्हींकी पूजा करते हुए, जो फल प्राणियोंको प्राप्त होता है, वही फल कलियुगमें मनुष्य उन्हीं भगवान् 'केशव' के स्मरणमात्रसे प्राप्त कर लेता है—

ध्यायन् कृते जपन् मन्त्रैस्त्रेतायां द्वापरेऽर्चयन्।
यदाप्नोति तदाप्नोति कलौ संस्मृत्य केशवम्॥
(२२८।१८)

जिस व्यक्तिकी जिह्वाके अग्रभागमें 'हरि' ये दो अक्षर विद्यमान होते हैं, वह इस संसारसागरको पार कर विष्णु-पदको प्राप्त करनेमें सफल हो जाता है—

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जिह्वाग्रे वर्तते यस्य हरिरित्यक्षरद्वयम्।
संसारसागरं तीर्त्वा स गच्छेद्वैष्णवं पदम्॥
(२२८।१९)

ज्ञानपूर्वक किये गये हजारों पापोंसे परिशुद्धि प्राप्त करनेकी इच्छा करनेवाले व्यक्तिके लिये भगवान्‌का नाम परम कल्याणकारी है। भगवान् नारायणके स्तवन और गुणानुवादसे भरी हुई कथाओंके श्रवणमें निमग्न रहनेवाला व्यक्ति स्वप्नमें भी इस संसारको नहीं देखता—

विज्ञातदुष्कृतिसहस्रसमावृतोऽपि
श्रेयः परं तु परिशुद्धिमभीप्समानः।
स्वप्नान्तरे न हि पुनश्च भवं स पश्ये-
न्नारायणस्तुतिकथापरमो मनुष्यः॥
(२२८।२०)
(अध्याय २२८)

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विष्णुपूजामें श्रद्धा-भक्तिकी महिमा

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सूतजीने पुनः कहा— हे शौनक! समस्त लोकोंके स्वामी भगवान् हरिकी आराधना ही सार है। पुरुषसूक्तके* द्वारा जो मनुष्य पुष्प और जल आदि उस परात्पर देवको समर्पित करता है, वह सम्पूर्ण चराचर जगत्‌की पूजा कर लेता है। जो विष्णुकी पूजा नहीं करते, उन्हें ब्रह्मघाती समझना चाहिये। जिन भगवान्‌से समस्त प्राणियोंकी उत्पत्ति हुई है और यह समस्त चराचर जगत् जिनसे व्याप्त है, उन विष्णुका जो ध्यान नहीं करता, वह विष्ठाका कृमि होता है। नरकलोकमें होनेवाले कष्टोंसे संतप्त हो रहे पापी जीवसे यमराज स्वयं पूछते हैं कि क्या तुमने कष्टविनाशक भगवान् विष्णुदेवका पूजन नहीं किया था? द्रव्योंका अभाव होनेपर मात्र जलसे ही पूजा करनेपर जो देव प्रसन्न होकर

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स्वयं अपने ही लोकको दे देते हैं, क्या तुमने उनकी पूजा नहीं की थी?

श्रद्धापूर्वक की गयी पूजासे संतुष्ट भगवान् हृषीकेश मनुष्यका जो उपकार करते हैं, वह न माता करती है, न पिता करता है और न तो उसका भाई ही करता है। वर्णाश्रम-धर्मका आचरण करनेवाले मनुष्यके द्वारा यदि भगवान् विष्णुकी पूजा होती है तो वे (श्रीविष्णु) उस पूजासे संतुष्ट हो जाते हैं। इसके अतिरिक्त अन्य कोई मार्ग नहीं है, जो उनको संतुष्ट कर सके। न तो वे प्राणियोंके द्वारा दिये गये विभिन्न प्रकारके दानसे उतना संतृप्त होते हैं, न तो पुष्पोपहार और भाँति-भाँतिके सुगन्धित पदार्थोंके अनुलेपनसे उतना संतुष्ट होते हैं, जितना भक्तिसे। सम्पत्ति, ऐश्वर्य, माहात्म्य,

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* 'सहस्रशीर्षा पुरुषः' आदि १६ मन्त्र 'पुरुषसूक्त'-रूपमें प्रसिद्ध हैं। ये मन्त्र सभी वेदोंकी संहितामें उपलब्ध हैं।