गरुड़ पुराण
Garuda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 431, कुल 634 में से
संदर्भ में पढ़ेंकाण्ड ] विष्णुभक्तिका माहात्म्य ४२१
पुत्र-पौत्रादिक संतान तथा अन्यान्य कर्मसम्पादनसे भी भगवान् हरि संतुष्ट नहीं होते। विमुक्तजनोंके लिये भी हरिका ऐक्य श्रीहरिकी आराधनासे ही प्राप्त होता है; क्योंकि श्रीहरिकी आराधना ही ऐक्यभावका मूल है।
(अध्याय २२९)
विष्णुभक्तिका माहात्म्य
सूतजीने कहा— सभी शास्त्रोंका अवलोकन करके तथा पुनः-पुनः विचार करके यह एक ही निष्कर्ष निकलता है कि मनुष्यको सदैव भगवान् नारायणका ध्यान करना चाहिये—
आलोक्य सर्वशास्त्राणि विचार्य च पुनः पुनः।
इदमेकं सुनिष्पन्नं ध्येयो नारायणः सदा॥
( २३०।१)
जो व्यक्ति एकनिष्ठ होकर नित्य उस नारायणका ध्यान करता है, उसके लिये नाना प्रकारके दान, विभिन्न तीर्थोंका परिभ्रमण, तपस्या और यज्ञोंका सम्पादन करनेसे क्या प्रयोजन? अर्थात् श्रीमन्नारायणका ध्यान सर्वोत्कृष्ट है।
छियासठ हजार तीर्थ भगवान् नारायणके प्रणामकी सोलहवीं कलाकी भी बराबरी नहीं कर सकते। समस्त प्रायश्चित्त और जितने भी तप-कर्म हैं, इन सभीमें भगवान् कृष्णका स्मरण ही सर्वश्रेष्ठ है, ऐसा समझना चाहिये। जिस पुरुषकी अनुरक्ति सदैव पापकर्ममें रहती है, उसके लिये एकमात्र श्रेष्ठतम प्रायश्चित्त भगवान् हरिका स्मरण है।
जो प्राणी एक मुहूर्तभर भी निरालस्य होकर नारायणका ध्यान कर लेता है, वह स्वर्ग प्राप्त करता है, फिर नारायणमें अनन्य-परायण भक्तके विषयमें क्या कहा जाय—
मुहूर्तमपि यो ध्यायेन्नारायणमतन्द्रितः।
सोऽपि स्वर्गतिमाप्नोति किं पुनस्तत्परायणः॥
(२३०।६)
जो मनुष्य योगपरायण है अथवा योगसिद्ध है, उसकी चित्तवृत्ति जागते, स्वप्न देखते तथा सुषुप्तावस्थामें भगवान् अच्युतके ही आश्रित होती है। उठते, गिरते, रोते, बैठते, खाते, जागते भगवान् गोविन्द माधव विष्णुका स्मरण करना चाहिये।
अपने-अपने कर्ममें संलग्न रहते हुए भगवान् जनार्दन हरिमें ही चित्तको अनुरक्त रखना चाहिये, ऐसा शास्त्रका कथन है। अन्य बहुत-सी बातोंको कहनेसे क्या लाभ—
स्वे स्वे कर्मण्यभिरतः कुर्याच्चित्तं जनार्दने।
एषा शास्त्रानुसारोक्तिः किमन्यैर्बहुभाषितैः॥
( २३०।९)
ध्यान ही परम धर्म है, ध्यान ही परम तप है, ध्यान ही परम शुद्धि है, अतः मनुष्यको (भगवद्) ध्यानपरायण होना चाहिये। विष्णुके ध्यानसे बढ़कर अन्य कोई ध्यान नहीं है, उपवाससे बढ़कर अन्य कोई तपस्या नहीं है, अतः भगवान् वासुदेवके चिन्तनको ही अपना प्रधान कर्म मानना चाहिये। इस लोक और परलोकमें प्राणीके लिये जो कुछ दुर्लभ है, जो अपने मनसे भी सोचा नहीं जा सकता, वह सब बिना माँगे ही ध्यानमात्र करनेसे मधुसूदन प्रदान कर देते हैं।
यज्ञ आदि उत्तम कर्म करते समय प्रमादवश स्खलनसे जो न्यूनता होती है, वह विष्णुके स्मरणमात्रसे सम्पूर्णतामें परिवर्तित हो जाती है, ऐसा श्रुतिवचन है—
प्रमादात् कुर्वतां कर्म प्रच्यवेताध्वरेषु यत्।
स्मरणादेव तद्विष्णोः सम्पूर्णं स्यादिति श्रुतिः॥
( २३०।१३)
पापकर्म करनेवालोंकी शुद्धिका ध्यानके समान