गरुड़ पुराण
Garuda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 435, कुल 634 में से
संदर्भ में पढ़ेंकाण्ड ] नृसिंहस्तोत्र तथा उसकी महिमा ४२५
अग्निकी ज्वालासे घिरे हुए पर्वतका आश्रय मृग आदि पशु एवं पक्षी नहीं लेते, वैसे ही सभी पाप योगाभ्यासमें लगे हुए मनुष्यका आश्रय नहीं ग्रहण करते। उन विष्णुके प्रति जिसका विश्वास जितना अधिक दृढ़ होता है, उसको उतनी ही अधिक सिद्धि प्राप्त होती है।
भगवान् कृष्णके ऐसे प्रभावका आकलन कर शत्रुभावसे उन गोविन्दका स्मरण करता हुआ दमघोषका पुत्र शिशुपाल भगवान्में लीन हो गया। यदि कोई मनुष्य भक्तिभावसे विष्णुपरायण है, तो उसके विषयमें क्या कहना? उसकी मुक्ति तो पहलेसे ही सुनिश्चित हो जाती है—
विद्वेषादपि गोविन्दं दमघोषात्मजः स्मरन्।
<p align="right">(२३०।५४)</p> <p align="right">(अध्याय २३०)</p>
शिशुपालो गतस्तत्त्वं किं पुनस्तत्परायणः॥
नृसिंहस्तोत्र तथा उसकी महिमा
सूतजीने कहा—हे शौनक! अब मैं भगवान् शिवद्वारा कही गयी नारसिंहस्तुति (नृसिंहस्तोत्र)-का वर्णन करूँगा।
प्राचीन कालकी बात है, एक बार सभी मातृगणोंने भगवान् शंकरसे कहा कि हे भगवन्! हम सब आपकी कृपासे देव, असुर और मनुष्य आदि जो इस संसारमें प्राणी हैं, उन सबको खायेंगे। हम सभीको आप इसके लिये आज्ञा प्रदान करें।
शंकरजीने कहा—हे मातृकाओ! आप सबके द्वारा संसारकी समस्त प्रजाकी रक्षा होनी चाहिये। इसलिये इस महाभयंकर पापसे आप लोग अपने-अपने मनको शीघ्र वापस कर लें।
भगवान् शंकरके द्वारा ऐसा कहे जानेपर भी मातृकाएँ उनके वचनका अनादर करते हुए त्रिभुवनके समस्त चराचर प्राणियोंको खानेके लिये जुट गयीं। मातृकाओंके द्वारा त्रैलोक्यका भक्षण करते देखकर भगवान् शिवने नृसिंहरूप उन श्रीविष्णुदेवका इस रूपमें ध्यान किया—जो आदि-अन्तसे रहित एवं समस्त चराचर जगत्के कारण हैं, विद्युत्के समान लपलपाती हुई जिनकी जिह्वा है, जिनके बड़े-बड़े महाभयंकर दाँत हैं, जिनकी ग्रीवा देदीप्यमान केसरसे* सुशोभित है, जो रत्नजटित अङ्गद एवं मुकुटसे सुशोभित हैं। जिनका शिरोभाग सोनेके समान दिखायी देनेवाली जटाओंसे युक्त है, जिनके कटिप्रदेशमें सोनेकी करधनी है, जो नीलकमलके समान श्यामवर्णके हैं, जो रत्नखचित पायल धारण किये हुए हैं। जिनके तेजसे सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड व्याप्त है। जिनका शरीर आवर्ताकार रोमसमूहसे युक्त है और जो देव श्रेष्ठतम पुष्पोंसे गूँथी गयी एक विशाल मालाको धारण किये हुए हैं। इस तरह भगवान् रुद्रने भक्तिपूर्वक जिस रूपमें नारायणका ध्यान किया था, उसी रूपमें ध्यान करनेमात्रसे नृसिंहदेव श्रीविष्णुने उन्हें अपना दर्शन दिया। यह रूप देवताओंके द्वारा भी दुर्निरीक्ष्य था।
शिवने देवेश नृसिंहको प्रणाम करके उन्हें तुष्ट किया और वे इस प्रकार उनकी स्तुति करने लगे। शंकरजीने कहा—
नमस्तेऽस्तु जगन्नाथ नरसिंहवपुर्धर।
दैत्येश्वरेन्द्रसंहारिनखशुक्तिविराजित ॥
नखमण्डलसंभिन्नहेमपिङ्गलविग्रह ।
नमोऽस्तु पद्मनाभाय शोभनाय जगद्गुरो।
कल्पान्ताम्भोदनिर्घोष सूर्यकोटिसमप्रभ॥
सहस्रयमसंत्रास सहस्रेन्द्रपराक्रम।
सहस्रधनदस्फीत सहस्रचरणात्मक॥
* सिंहकी ग्रीवाके ऊपरी भागके केशसमूहको 'केसर' कहते हैं।