गरुड़ पुराण
Garuda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें| ४२६ | संक्षिप्त गरुडपुराण | [ आचार- |
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सहस्रचन्द्रप्रतिम सहस्त्रांशुहरिक्रम।
सहस्ररुद्रतेजस्क सहस्रब्रह्मसंस्तुत॥
सहस्ररुद्रसंजप्य सहस्राक्षनिरीक्षण।
सहस्रजन्ममथन सहस्रबन्धमोचन॥
सहस्रवायुवेगाक्ष सहस्त्राज्ञकृपाकर।
(२३१। १२-१६ १/२)
हे समस्त संसारके स्वामी ! हे नृसिंहरूपधारिन् ! हे दैत्यराज हिरण्यकशिपुके वक्षःस्थलको विदीर्ण करनेवाले ! शुक्तियोंके समान चमकीले नाखूनोंसे सुशोभित देव ! आपको नमस्कार है। हे नखमण्डलकी कान्तिसे मिश्रित सुवर्णके समान देदीप्यमान शरीरवाले ! हे जगद्वन्द्य ! हे शोभासम्पन्न भगवान् पद्मनाभ ! प्रलयकालीन मेघके सदृश गर्जना करनेवाले, करोड़ों सूर्यके समान प्रभासम्पन्न देव ! आपको नमन है। दुष्ट पापियोंको हजारों यमराजके समान भयभीत करनेवाले ! हजारों इन्द्रकी शक्ति अपनेमें संनिहित रखनेवाले ! हजारों कुबेरके सदृश धनसम्पन्न ! हजारों चरणसे युक्त हे देव ! आपको नमस्कार है। हजारों चन्द्रके समान शीतल कान्तिवाले ! हजारों सूर्यके सदृश पराक्रमशाली ! हजारों रुद्रकी भाँति तेजस्वी ! हजारों ब्रह्मासे स्तुत्य हे देव ! आपको मेरा नमन है। हजारों रुद्र देवताओंके द्वारा मन्त्ररूपमें जप करने योग्य महामहिम ! इन्द्रके हजारों नेत्रोंसे देखे जानेवाले ! हजारों जन्मके पाप-पुण्योंका मन्थन करनेवाले ! संसारके हजारों जीवोंका बन्धन काटकर उन्हें मुक्त करनेवाले ! हजारों वायुदेवोंके समान वेगवान् और हजारों मूर्ख प्राणियोंपर कृपा करनेवाले हे दयानिधान ! आपको मेरा नमस्कार है।
इस प्रकार नृसिंहरूपधारी देवदेवेश्वर भगवान् हरिकी स्तुति करके विनम्रतापूर्वक शिवने पुनः उनसे कहा—
हे देवदेवेश्वर ! अन्धकासुरका विनाश करनेके लिये जिन मातृकाओंकी सृष्टि मैंने की थी, वे तो मेरे ही वचनकी अवहेलना करके संसारकी विविध प्रजाओंका भक्षण कर रही हैं। मातृकाओंकी सृष्टि करके तो अब स्वयं मैं इनका संहार करनेमें असमर्थ हूँ। पहले इनकी सृष्टि की, अब कैसे इनका विनाश करूँ ? यह मुझे अच्छा नहीं लग रहा है।
रुद्रके ऐसा कहनेपर नृसिंहरूपधारी भगवान् हरिने उसी समय अपनी जिह्वाके अग्रभागसे हजारों देवियोंको उत्पन्न करके उन्हींके द्वारा देवता, असुर और मनुष्य आदिका संहार करनेवाली क्रुद्ध मातृकाओंका विनाश कर संसारका कल्याण किया। तदनन्तर वे हरि अन्तर्धान हो गये।
जो मनुष्य नियमपूर्वक इस नारसिंहस्तोत्रका जितेन्द्रिय होकर पाठ करता है, निश्चित ही भगवान् हरि उसके समस्त मनोरथको वैसे ही पूर्ण करते हैं जैसे उन्होंने शिवके मनोरथको पूर्ण किया था।
मध्याह्नकालीन प्रचण्ड सूर्यके समान तेजस्वी नेत्रोंवाले, श्वेत वर्णके कमलमें स्थित, प्रज्वलित अग्निके सदृश भयंकर, अनादि, मध्य और अन्तसे रहित पुराणपुरुष, परात्पर, जगदाधार भगवान् नृसिंहका ध्यान करना चाहिये—
ध्यायेन्नृसिंहं तरुणार्कनेत्रं
सिताम्बुजातं ज्वलिताग्निवक्त्रम्।
अनादिमध्यान्तमजं पुराणं
परात्परेशं जगतां निधानम्॥
(२३१। २३)
जो मनुष्य इस स्तोत्रका निरन्तर जप करता है, उसके दुःखसमूहको श्रीनृसिंह उसी प्रकार नष्ट कर देते हैं जिस प्रकार अंशुमाली सूर्य कुहरेकी राशिको अपने सामनेसे हटा देते हैं। जब साधक कल्याणकारी मातृवर्गसे युक्त नृसिंहदेवकी मूर्तिका निर्माण करके उनकी पूजा करता है, तब वह सदैव उन परात्परदेवके समीपमें ही रहता है। त्रिपुरारि शिवने भी तो उन्हीं देवदेवेश्वर नृसिंहमूर्ति भगवान् हरिकी पूजा की थी। उन्हीं देवको प्रसन्न करके श्रीशिवजीने वर प्राप्त किया और मातृकाओंसे संसारकी रक्षा की। (अध्याय २३१)