गरुड़ पुराण
Garuda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंकाण्ड ] कुलामृतस्तोत्र ४२७
कुलामृतस्तोत्र
सूतजीने कहा—हे शौनक! अब मैं उस कुलामृत नामक स्तोत्रका वर्णन करूँगा, जिसका वर्णन देवर्षि नारदके पूछनेपर शिवने किया था। उसे आप सुनें।
नारदजीने कहा—हे त्रिपुरान्तक भगवन्! जो दुर्मतिपूर्ण मनुष्य संसारमें काम-क्रोध और शुभाशुभ द्वन्द्वोंसे तथा शब्दादि विषयोंसे बँधकर सदासे पीड़ित हो रहे हैं, उनकी जन्म-मृत्युरूपी संसार-सागरसे जिस उपायद्वारा क्षणमात्रमें विमुक्ति हो जाय, उसको हम आपसे सुनना चाहते हैं।
इसपर भगवान् शंकर बोले—हे ऋषिश्रेष्ठ! भव-बन्धनको नष्ट करनेवाले और दुःखका विनाश करनेवाले परम गोपनीय रहस्यको मैं कहता हूँ, सुनो—तिनकेसे लेकर ब्रह्मातक चार प्रकारकी चराचर सृष्टि इस जगत्में जिन प्रभुकी मायासे अज्ञानके वशीभूत होकर सदैव सोती रहती है, उन विष्णुकी कृपासे यदि कोई जग जाता है तो वही संसारसे पार होता है। यह संसार देवताओंके लिये भी अत्यन्त दुस्तर है। भोग और ऐश्वर्यके मदमें उन्मत्त तथा तत्त्वज्ञानसे पराङ्मुख, स्त्री, पुत्र और कुटुम्बियोंके व्यामोहमें भ्रमित होकर सभी प्राणी नाना प्रकारके दुःख झेलते हैं। इस व्यामोहमें फँसे हुए सभी जीवोंकी वैसी ही गति होती है, जैसी गति समुद्रमें स्नान करनेके लिये आये हुए वृद्ध जंगली हाथियोंकी होती है। जो मनुष्य हरिकीर्तन करनेके समय अपने मुखको बंद रखता है अर्थात् हरिकीर्तनसे पराङ्मुख रहता है, वह कोशमें स्थित कीड़ेके समान होता है। उसकी मुक्ति तो करोड़ों जन्म लेनेपर भी सम्भव नहीं है। अतः हे नारद! प्रसन्न-चित्त होकर सदैव देवदेवेश अव्यय भगवान् विष्णुकी प्रसन्नतापूर्वक सम्यक् आराधना करनी चाहिये।
जो विश्वरूप, अनादि, अनन्त, अजन्मा तथा हृदयमें स्थित, अविचल, सर्वज्ञ भगवान् विष्णुका सदा ध्यान करता है, वह मुक्त हो जाता है। शरीररहित, विधाता, सर्वज्ञानसम्पन्न, मनके रमणके अनन्य आश्रय, अचल, सर्वत्र व्याप्त भगवान् विष्णुका सदा ध्यान करनेवाला मुक्त हो जाता है। निर्विकल्प (निर्विशेष), निराभास, निष्प्रपञ्च तथा निर्दोष, वासुदेव, परम गुरु भगवान् विष्णुका ध्यान करनेसे मनुष्य मुक्तिको प्राप्त कर लेता है। सर्वात्मक एवं प्राणिमात्रके ज्ञानके एकमात्र प्रतिनिधि, शुभ, एकाक्षर (एक अक्षर 'अ' मात्रसे बोध्य) विष्णुका ध्यान करनेसे मुक्ति हो जाती है। वाक्यातीत (किसी भी वाक्यसे अवर्णनीय), तीनों कालोंको जाननेवाले, लोकसाक्षी, विश्वेश्वर तथा सभीसे श्रेष्ठ विष्णुका सदा ध्यान करनेसे मुक्ति हो जाती है। ब्रह्मा आदि देव, गन्धर्व, मुनि, सिद्ध, चारण एवं योगियोंके द्वारा सदा सेवित श्रीविष्णुका ध्यान करनेसे मुक्ति प्राप्त होती है। संसार-बन्धनसे मुक्ति चाहनेवाले सभी लोगोंको वरद श्रीविष्णुकी इसी प्रकार सदा स्तुति करनी चाहिये। यदि कोई भी संसार-बन्धनसे मुक्ति चाहता है तो उसे समाहितचित्त होकर अनन्त, अव्यय, देवाधिदेव, अनन्त ब्रह्माण्डमें सर्वोच्च देवके रूपमें सुप्रतिष्ठित, समस्त जगत्के नियन्ता, अज श्रीविष्णुका सदा ध्यान करना चाहिये।*
* यस्तु विश्वमनाद्यन्तमजमात्मनि संस्थितम्। सर्वज्ञमचलं विष्णुं सदा ध्यायेत् स मुच्यते॥
देवं गर्भोचितं विष्णुं सदा ध्यायन् विमुच्यते। अशरीरं विधातारं सर्वज्ञानमनोरतिम्।
अचलं सर्वगं विष्णुं सदा ध्यायन् विमुच्यते ॥
निर्विकल्पं निराभासं निष्प्रपञ्चं निरामयम्। वासुदेवं गुरुं विष्णुं सदा ध्यायन् विमुच्यते ॥
सर्वात्मकं च वै यावदात्मचैतन्यरूपकम्। शुभमेकाक्षरं विष्णुं सदा ध्यायन् विमुच्यते॥