गरुड़ पुराण
Garuda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४३४ संक्षिप्त गरुडपुराण [ आचार-
ब्रह्मज्ञाननिरूपण तथा षडङ्गयोग
सूतजीने कहा— [हे शौनक!] अब मैं वेदान्त और सांख्यसिद्धान्तके अनुसार ब्रह्मज्ञानका वर्णन करता हूँ।
'मैं ही ज्योतिर्मय परब्रह्मस्वरूप विष्णु हूँ'—ऐसा चिन्तन करते हुए 'सूर्य, हृदयाकाश और वह्निमें एक ही ज्योति तीन रूपमें स्थित है', ऐसा निश्चय करना चाहिये। जैसे गायोंके शरीरमें घृत रहनेपर भी घृत गायको बल प्रदान नहीं करता, परंतु उसी घृतको निकालकर विधिके अनुसार गायोंके निमित्त प्रयोग करनेपर वह घृत महाबलप्रद हो जाता है, वैसे ही विष्णु सभी जीवोंके शरीरमें विद्यमान रहनेपर भी बिना आराधनाके कल्याणकारी नहीं हो सकते। जो योगरूप वृक्षपर चढ़नेके इच्छुक हैं, उनके लिये कर्मज्ञान आवश्यक है, किंतु जो योगरूपी वृक्षपर आरूढ़ हो चुके हैं, उनके लिये त्याग (वैराग्य) एवं ज्ञान ही महत्त्वपूर्ण हो जाता है। जो शब्दादि विषयोंको जाननेकी इच्छा करता है, उसमें राग-द्वेषादि प्रादुर्भूत हो जाते हैं, इसी कारण मनुष्य लोभ-मोह तथा क्रोधके वशीभूत होकर पापाचार करता है।
जिसके हाथ, उपस्थ<sup>१</sup>, उदर और वाक्य—ये चार सुसंयत रहते हैं, वही बुद्धिमानोंके द्वारा विप्र कहा जाता है। जो दूसरेके द्रव्यको ग्रहण नहीं करते, हिंसा नहीं करते, जुएमें अनुरक्त नहीं रहते, वास्तवमें उन्हींके दोनों हाथ सुसंयत रहते हैं। जो दूसरेकी स्त्रीके प्रति कामका भाव नहीं रखता, उसीकी उपस्थेन्द्रिय सुसंयत है। जो लोभरहित होकर परिमित भोजन करते हैं, उन्हींके उदरको संयत कहा जाता है। जो हित-परिमित और सत्य वाक्य बोलता है, उसीकी वाणी संयत कही जाती है। जिसके हाथ आदि संयत रहते हैं, उसके लिये तपस्या या यज्ञादिका कोई प्रयोजन नहीं है अर्थात् तपस्या, यज्ञ आदि तभी सफल होते हैं, जब हाथ, उपस्थ, उदर एवं वाक्य संयत हों।
मन, बुद्धि और इन्द्रियोंका आत्यन्तिक ऐक्य अर्थात् सदा ध्येयतत्त्वमें लगा रहना ध्यान कहलाता है। वह ध्यान दो प्रकारका होता है—सबीज<sup>२</sup> तथा निर्बीज<sup>३</sup>।
चिन्तनकी मूल आधार-शक्ति 'बुद्धि' भौंहोंके मध्यमें रहती है। इसे यदि जीव विषयोंमें लगाये रहता है तो यही जाग्रत्-अवस्था होती है। जब जीवकी इन्द्रियाँ शान्त हों, केवल मन चञ्चल हो और इसी कारण बाहरी एवं भीतरी विषयोंको केवल स्वप्नमें जीव देखता रहे तो यही स्वप्नावस्था है। जब मन हृदयमें स्थित हो तथा तमोगुणसे मोहित होनेके कारण कुछ भी स्मरण न कर सके, तब सुषुप्ति-अवस्था समझनी चाहिये।
जो जितेन्द्रिय होता है उसको जाग्रत्-अवस्था में तन्द्रा, मोह और भ्रम नहीं उत्पन्न होते। वह शब्दादि विषयोंमें आसक्त नहीं होता।
ज्ञानी इन्द्रियों और मनको विषयोंसे खींचकर बुद्धिके द्वारा अहंकारको एवं प्रकृतिके द्वारा बुद्धिको संयत कर और चित्-शक्तिके द्वारा प्रकृतिको भी संयत कर केवल आत्मरूपमें अवस्थित रहता है। इस स्थितिमें ज्ञानी मनसे स्वप्रकाश आत्मा (परमात्मा)-को देख सकता है। आत्मा स्वप्रकाश है, ज्ञेय है, ज्ञाता है और ज्ञानाधिकरण है। चिद्रूप अमृत शुद्ध निष्क्रिय सर्वव्यापी शिवप्रद आत्माको जानकर मनुष्य तुरीय<sup>४</sup>-अवस्था में आ जाता है, इसमें संशय नहीं है।
<sup>१</sup> मूत्रेन्द्रिय।
<sup>२</sup> अविद्या आदि क्लेश ही बीज हैं। इनका अनुभव होते रहनेपर सबीज ध्यान कहा जाता है।
<sup>३</sup> क्लेशरूप बीजका अनुभव न हो तो निर्बीज ध्यान कहा जाता है।
<sup>४</sup> परम शान्त, शिवस्वरूप अद्वैतावस्था।