गरुड़ पुराण
Garuda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंकाण्ड ] ब्रह्मज्ञाननिरूपण तथा षडङ्गयोग ४३५
जीवका अन्तिम लक्ष्य मुक्ति है। यह मुक्ति जीवको तभी प्राप्त होती है, जब वह पुर्यष्टक एवं त्रिगुणात्मिका प्रकृतिका परित्याग कर देता है। यह पुर्यष्टक एक 'कमल' के रूपमें माना गया है। संसारावस्थामें जीव इसी कमलरूपी पुर्यष्टक की कर्णिकामें स्थित रहता है। तीनों गुणों (सत्त्व, रज एवं तम)-की साम्यावस्थारूप प्रकृति ही पुर्यष्टकरूपी कमलकी कर्णिका है। इस पुर्यष्टकरूप कमलके आठ पत्र (दल) हैं। ये हैं—शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गन्ध, सत्व, रज तथा तम। इस प्रतीकात्मक वर्णनका निष्कर्ष यह है कि जीवको मुक्ति प्राप्त करनेके लिये प्रकृतिसे स्वयंको अलग करना अनिवार्य है इस हेतु शब्द आदि विषयोंके प्रति अनासक्त होना होगा।
प्राणायाम, जप, प्रत्याहार, धारणा, समाधि और ध्यान—ये छः योगके साधन हैं।
इन्द्रियसंयमसे पापक्षय और पापक्षयसे देवप्रीति सुलभ होती है। देवप्रीति मुक्ति एवं मुक्तिसाधनकी ओर उन्मुख होनेके लिये भी प्रथम एवं अनिवार्य साधन है। योगका मुख्यतम साधन है प्राणायाम। यह दो प्रकारका है—गर्भ और अगर्भ। जप एवं ध्यानयुक्त जो प्राणायाम है, वही गर्भ प्राणायाम है और इससे अतिरिक्त होनेपर अगर्भ प्राणायाम कहा जाता है। जो प्राणायाम छत्तीस मात्रासे युक्त रहता है वही श्रेष्ठ है, जो चौबीस मात्रासे युक्त रहता है वह मध्यम है और जो प्राणायाम बारह* मात्रासे युक्त रहता है वह निम्न है। सदा ॐकारका जप कर प्राणायाम करे। ॐकार परब्रह्मका वाचक है। इस ब्रह्मवाचक ॐकारका परिज्ञान होनेपर वाच्य ब्रह्म प्रसन्न हो जाता है।
'ॐ नमो विष्णवे'—इस षडक्षर और द्वादशाक्षर गायत्रीका जप करना चाहिये। सभी इन्द्रियोंकी प्रवृत्ति सांसारिक विषयोंकी ओर रहती है। मनके द्वारा इन प्रवृत्तियोंकी निवृत्तिको ही प्रत्याहार कहा गया है। इन्द्रियोंको अपने विषयोंसे समाहरण कर मनको बुद्धिके साथ प्रत्याहारमें स्थित रखते हुए बारह बार प्राणायाम करनेमें जितना समय लगता है, उतने समयतक ब्रह्ममें मनको निविष्ट करना ही द्वादशधारणात्मक ध्यान है—ऐसा ब्रह्माने कहा है। नियतरूपसे ब्रह्माकारवृत्तिमें जो संतुष्टिका अनुभव होता है, उसीको समाधि कहा जाता है। ध्यान करते-करते यदि मन चञ्चल नहीं होता है, सदा ध्यानमें ही प्रवृत्ति रहती है अर्थात् अभीष्ट प्राप्तितक ध्यानसे निवृत्ति नहीं होती तो इसीका नाम धारणा है। मन यदि ध्येयतत्त्वमें ही आसक्त रहता है अर्थात् ध्येयतत्त्वका ही चिन्तन सदा होता रहता है, अन्य किसी भी पदार्थका भान नहीं होता तो इसीको ध्यान कहा जाता है।
ध्यानपरायण मुनिगण, ध्येय पदार्थका चिन्तन करते-करते जब मन उसी ध्येयमें निश्चल हो जाता है तो इसे ही परम ध्यान कहते हैं। ध्यान करते-करते जब सर्वत्र ध्येयपदार्थ ही दिखायी देने लगे, ध्याता भी ध्येयमय प्रतीत हो और किसी प्रकारका द्वैतज्ञान नहीं रहे तो इस अवस्थाको समाधि कहा जाता है। जिसका मन संकल्परहित होकर इन्द्रियोंके विषयचिन्तनसे विरत हो जाता है तथा ब्रह्ममें लीन हो जाता है, वही समाधिमें स्थित कहा जाता है। जिस योगीका मन आत्मामें अवस्थित परमात्माका ध्यान करते-करते तन्मय हो जाता है, वह योगी समाधिस्थ कहा जाता है। चित्तकी अस्थिरता, भ्रान्ति, दौर्मनस्य और प्रमाद—ये सभी योगियोंके दोष कहे गये हैं, ये योगमें विघ्नकारक हैं।
मनके स्थिर होनेके लिये प्रथम ध्येयके स्थूलस्वरूपका चिन्तन करे, इसके बाद मनके
* मात्राका विवेक योगसूत्रसे प्राणायामकी प्रक्रिया समझनेमें स्पष्ट होगा।