भारतकोश
गरुड़ पुराण

गरुड़ पुराण

Garuda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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४६६संक्षिप्त गरुडपुराण[ धर्मकाण्ड—

तथा स्वस्तिवाचन—ये तीन वर्जित हैं। हे खगेश! मरणस्थान, द्वार, चत्वर, विश्रामस्थान, काष्ठ-चयन और अस्थि-संचयन—ये छः पिण्डदानके स्थान हैं।

प्राणीकी मृत्यु जिस स्थानपर होती है, वहाँपर दिये जानेवाले पिण्डका नाम 'शव' है, उससे भूमिदेवताकी तृप्ति होती है। द्वारपर जो पिण्ड दिया जाता है उसे 'पान्थ' नामक पिण्ड कहते हैं। इस कर्मको करनेसे वास्तुदेवताको प्रसन्नता होती है। चत्वर अर्थात् चौराहेपर 'खेचर' नामक पिण्डका दान करनेपर भूतादिक, गगनचारी देवतागण प्रसन्न होते हैं। शवके विश्राम भूमिमें 'भूत-संज्ञक' पिण्डका दान करनेसे दसों दिशाओंको संतुष्टि प्राप्त होती है। चितामें 'साधक' नामका और अस्थि-संचयनमें 'प्रेत-संज्ञक' पिण्ड दिया जाता है।

शवयात्राके समय पुत्रादिक परिजन तिल, कुश, घृत और ईंधन लेकर 'यमगाथा' अथवा वेदके 'यमसूक्त' का पाठ करते हुए श्मशानभूमिकी ओर जाते हैं। प्रतिदिन गौ, अश्व, पुरुष और बैल आदि चराचर प्राणियोंको अपनी ओर खींचते हुए यम संतुष्ट नहीं होते हैं, जिस प्रकार कि मद्य पीनेवाला संतुष्ट नहीं होता<sup></sup>

'ॐ अपेतेति०' इस यमसूक्तका<sup></sup> अथवा 'यमगाथा' का पाठ शवयात्राके मार्गमें करना चाहिये। सभी बन्धु-बान्धवोंको दक्षिण दिशामें स्थित श्मशानकी वनभूमिमें शवको ले जाना चाहिये। हे पक्षिन्! पूर्वोक्त विधिसे मार्गमें दो श्राद्ध करना चाहिये। उसके बाद श्मशानभूमिमें पहुँचकर धीरेसे शवको पृथ्वीपर उतारते हुए दक्षिण दिशाकी ओर सिर स्थापित कर चिताभूमिमें पूर्वोक्त विधिके अनुसार श्राद्ध करना चाहिये। शव-दाहकी क्रियाके लिये पुत्रादिक परिजनोंको स्वयं तृण, काष्ठ, तिल और घृत आदि ले जाना चाहिये। शूद्रोंके द्वारा श्मशानमें पहुँचायी गयी वस्तुओंसे वहाँ किया गया सम्पूर्ण कर्म निष्फल हो जाता है। वहाँपर सभी कर्म अपसव्य और दक्षिणाभिमुख होकर करना चाहिये। हे पक्षिराज! शास्त्रसम्मत विधिके अनुसार एक वेदीका निर्माण करना चाहिये। तदनन्तर प्रेतवस्त्र अर्थात् कफनको दो भागोंमें फाड़ कर उसके आधे भागसे उस शवको ढक दे और दूसरे भागको श्मशानमें निवास करनेवाले प्राणीके लिये भूमिपर ही छोड़ दे। उसके बाद पूर्वोक्त विधिके अनुसार मरे हुए व्यक्तिके हाथमें पिण्डदान करे। तदनन्तर शवके सम्पूर्ण शरीरमें घृतका लेप करना चाहिये।

हे खगेश! प्राणीकी मृत्यु और दाह-संस्कारके बीच पिण्डदानकी जो विधि है, अब उसे सुनो।

पहले बताये गये मृतस्थान, द्वार, चौराहे, विश्रामस्थान तथा काष्ठसंचयनस्थानमें प्रदत्त पाँच पिण्डोंका दान करनेसे शवमें की आहुति (अग्निदाह)-की योग्यता आ जाती है, अथवा किसी प्रकारके प्रतिबन्धके कारण उपर्युक्त पिण्ड नहीं दिये गये तो शव राक्षसोंके भक्षण योग्य हो जाता है। अतः स्वच्छ भूमिपर बनी हुई वेदीको भलीभाँति मार्जन, उपलेपनके द्वारा शुद्ध कर उसके ऊपर यथाविधि अग्निको स्थापित करना चाहिये। तदनन्तर पुष्प-अक्षत आदिसे क्रव्याद नामवाले अग्निदेवकी विधिवत् पूजा करके दाह करे। दाहकार्यमें चाण्डालके घरकी अग्नि, चिताकी अग्निऔर पापीके घरकी अग्निका प्रयोग नहीं करना चाहिये और निम्नलिखित मंत्रसे अग्निकी प्रार्थना करनी चाहिये—

त्वं भूतकृज्जगद्योनिस्त्वं लोकपरिपालकः ॥
उपसंहर तस्मात्त्वमेनं स्वर्गं नयामृतम्। (४।६४-६५)


<sup></sup> अहरहर्नीयमानो गामश्वं पुरुषं वृषम्। वैवस्वतो न तृप्येत सुरया त्विव दुर्मतिः ॥ (४।५३) इसीका नाम यमगाथा है।
<sup></sup> यजु०अ० ३५ 'यमसूक्त' कहलाता है।