भारतकोश
गरुड़ पुराण

गरुड़ पुराण

Garuda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished634 पृष्ठ

पृष्ठ 477, कुल 634 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 477

प्रेतकल्प ] आसन्नमृत्यु-व्यक्तिके निमित्त किये जानेवाले प्रायश्चित्त [ ४६७

'हे देव! आप भूतकृत् हैं। हे देव! आप इस संसारके योनिस্বরূপ और सभीके पालनहार हैं। इसलिये आप इस शवका अपनेमें उपसंहार करके अमृतस्वरूप स्वर्गमें ले जाइये'।

इस प्रकार क्रव्याद देवकी विधिवत् पूजा कर शवको चिताकी अग्निमें जलानेका उपक्रम करना चाहिये। जब शवके शरीरका आधा भाग उस अग्निमें जल जाय तो उस समय क्रिया करनेवाले व्यक्तिको निम्नलिखित मन्त्रका उच्चारण करना चाहिये—

अस्मात्त्वमधिजातोऽसि त्वदयं जायतां पुनः॥
'असौ स्वर्गाय लोकाय स्वाहा¹॥'
(४। ६६-६७)

अर्थात् हे देव! आप इसीसे उत्पन्न हुए हैं। यह शरीरी पुनः आपसे उत्पन्न हो। अमुक नामवाला यह प्राणी स्वर्गलोकको प्राप्त करे—ऐसा कहकर तिलमिश्रित आज्याहुति चितामें जल रहे शवके ऊपर छोड़े। उसके बाद भावविह्वल होकर उस आत्मीयजनके लिये रोना चाहिये। इस कृत्यको करनेसे उस मृतकको अत्यधिक सुख प्राप्त होता है।

दाह-क्रिया करनेके पश्चात् अस्थि-संचयन क्रिया करनी चाहिये। हे खगराज! दाहकी पीड़ाकी शान्तिके लिये प्रेत-पिण्ड भी प्रदान करे। तत्पश्चात् वहाँपर गये हुए सभी लोग चिताकी प्रदक्षिणा कर कनिष्ठादि क्रमसे सूक्त जपते हुए स्नानके लिये जलाशय आदिपर जायँ। वहाँ पहुँचकर अपने वस्त्रोंका प्रक्षालनकर पुनः उन्हें ही पहनकर मृत व्यक्तिका ध्यान करते हुए उसे जल-दान देनेकी प्रतिज्ञा करें और मृत व्यक्तिने प्रेतरूपमें जल-दान देनेकी आज्ञा दी है—ऐसी भावना करते हुए पुनः जलमें मौन धारणपूर्वक प्रवेश करें और यथाधिकार एक वस्त्र होकर अपनी शिखा खोलकर तथा अपसव्य होकर स्नान करें। यह स्नान दक्षिणाभिमुख होकर 'अपनः शोशु²चदघम्' इस वेदमन्त्रका उच्चारण करते हुए करना चाहिये। उस समय स्नान करनेवाले लोगोंको जलका आलोडन नहीं करना चाहिये। तत्पश्चात् किनारे आ करके अपनी शिखाको बाँध ले और सीधे कुशको दक्षिणाग्र करके दोनों हाथोंमें रखकर अञ्जलिसे तिलयुक्त जल लेकर पितृतीर्थसे दक्षिण दिशामें एक बार, तीन बार अथवा दस बार भूमिपर या पत्थरपर जल-दान करे। इस समय तिलाञ्जलि देनेवाले परिजनोंको कहना चाहिये कि 'हे अमुक गोत्रमें उत्पन्न अमुक नामवाले प्रेत! तुम मेरे द्वारा दिये जा रहे इस तिलोदकसे संतृप्त हो। मैं तुम्हें तिलाञ्जलि दे रहा हूँ, अतः इसको ग्रहण करनेके लिये तुम यहाँपर उपस्थित होओ³।'

हे कश्यपपुत्र गरुड! तत्पश्चात् जलसे निकलकर वस्त्र पहनकर स्नान-वस्त्रको एक बार निचोड़कर पवित्र भूमिपर बैठ जायँ। शवदाह तथा तिलाञ्जलि देकर मनुष्यको अश्रुपात नहीं करना चाहिये, क्योंकि उस समय रोते हुए अपने बन्धु-बान्धवोंके द्वारा आँख और मुँहसे गिराये आँसू एवं कफको मरा हुआ व्यक्ति विवश होकर पान करता है। अतः रोना नहीं चाहिये, अपितु यथाशक्ति क्रिया करनी चाहिये। तदनन्तर कोई पुराणज्ञ संसारकी अनित्यताको बताता हुआ मृतकके परिजनोंको इस प्रकारका उपदेश देकर शोकनिवारण करनेका प्रयत्न करे—'मनुष्यका यह शरीर केलेके वृक्षके समान बड़ा ही सारहीन एवं जलके बुद्बुदेके समान क्षणभंगुर है। इसमें जो सारतत्त्वको खोजता


१-यजु० ३५।२२।
२-यजु० ३५।६
३-तिलोदककी अञ्जलि इस प्रकार कहकर देनी चाहिये—'अद्येहामुक गोत्रामुकप्रेतचितादाहजनिततापतृषोपशमाय एष तिलकुशतोयाञ्जलिर्मद्दत्तस्तवोपतिष्ठताम्।'