गरुड़ पुराण
Garuda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें| ४६८ | संक्षिप्त गरुडपुराण | [ धर्मकाण्ड- |
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[बायाँ स्तम्भ]
है, वह महामूर्ख है। यदि पृथ्वी, जल, अग्नि, आकाश और वायुतत्त्व—इन पाँच तत्त्वोंसे बना हुआ यह शरीर पुनः अपने किये हुए कर्मोंके अनुसार उन्हीं पञ्चतत्त्वोंमें जाकर विलीन हो जाता है तो उसके लिये रोना क्या? जब पृथ्वी, समुद्र तथा देवलोक विनष्ट हो जाते हैं तो फेनके समान प्रसिद्ध यह मर्त्यलोक नष्ट नहीं होगा?' इस उपदेशको सुनकर वे सभी परिवारके सदस्य अपने घरको जायें। पहलेसे घरके द्वारपर रखी हुई नीमकी पत्तियोंको चबाकर आचमन करें। तदनन्तर अग्नि, जल, गोबर, श्वेत सरसों, दूर्वा, प्रवाल, वृषभ तथा अन्य माङ्गलिक वस्तुओंका हाथसे स्पर्श करके पैरसे पत्थरका भी स्पर्श करें और धीरे-धीरे घरमें प्रवेश करें।
जो व्यक्ति विद्वान् है, वह अपने अग्निहोत्री परिजनकी मृत्यु होनेपर उसका दाह-संस्कार श्रौतकी अग्निके द्वारा ही यथाविधि करे। दो वर्षसे कम आयुवाले छोटे बालककी मृत्यु होनेपर उसको श्मशानभूमिमें गड्डा खोदकर मिट्टीसे ढक देना चाहिये। उसके लिये उदक-क्रियाका विधान नहीं है। जो स्त्री पतिव्रता है, यदि वह मरे हुए पतिका अनुगमन करना चाहती है तो धर्मविहित नियमोंके अनुसार पतिको प्रणाम करके चितामें प्रवेश करे। जो स्त्री जीवनके व्यामोहसे चितापर चढ़कर पुनः बाहर आ जाती है, उसे 'प्राजापत्यव्रत' करना चाहिये।
मनुष्यके शरीरमें साढ़े तीन करोड़ रोएँ होते हैं, जो स्त्री पतिका अनुगमन करती है, उतने कालतक वह स्वर्गमें वास करती है। जिस प्रकार सर्पको पकड़नेवाला सपेरा बिलसे सर्पको बलात् बाहर निकाल लेता है, उसी प्रकार पतिका अनुगमन करनेवाली सती नारी अपने पतिका उद्धार कर उसके साथ स्वर्गमें सुखपूर्वक निवास
[दायाँ स्तम्भ]
करती है। अप्सराएँ उसका सम्मान करती हैं तथा वह पतिव्रता नारी तबतक पतिके साथ सुखोपभोग करती है, जबतक चौदह इन्द्रोंकी अवधि पूर्ण नहीं हो जाती है। यदि पति ब्रह्महत्यारा, कृतघ्न या मित्रघाती हो, फिर भी सधवा स्त्री मृत्यु होनेपर पतिके साथ सती होकर उसे पवित्र कर देती है। पतिके मर जानेपर जो स्त्री उसीके साथ अग्निमें अपने शरीरको भेंट कर देती है, वह अरुन्धतीके समान आचरण करती हुई स्वर्गलोकमें जाकर सम्मान प्राप्त करती है।
पतिकी मृत्यु होनेपर जबतक स्त्री अपनेको चिताकी भेंट नहीं चढ़ा देती है, तबतक वह स्त्रीके शरीरसे किसी प्रकार मुक्त नहीं हो सकती है। जो स्त्री अपने पतिके साथ सती हो जाती है, वह पितृकुल, मातृकुल और पतिकुल—इन तीनों कुलोंको पवित्र कर देती है। जो स्त्री पतिके दुःखमें दुःखी, सुखमें सुखी, विदेशगमनमें मलिनवसना, कृशकाय तथा मृत्यु होनेपर चितामें उसीके साथ जलकर मृत्युका संवरण करती है, उस स्त्रीको पतिव्रता मानना चाहिये। पातिव्रतधर्मका पालन करनेवाली स्त्री पतिकी मृत्यु हो जानेपर पृथक् चितामें समारूढ होकर परलोकगमनके योग्य नहीं होती। क्षत्रियादि सभी सवर्णा स्त्रियोंको अपने पतिके साथ ही चितामें आरोहणकर परलोकसुख प्राप्त करना चाहिये। ब्राह्मणवर्णकी स्त्रीसे लेकर चाण्डालवर्णकी स्त्रीके लिये पतिके साथ चितामें जलकर सती होनेका विधान एक समान ही है। पतिकी मृत्युके समय जो स्त्रियाँ गर्भसे रहित हैं और जिनके छोटे-छोटे बच्चे नहीं हैं, उन सभीको सतीधर्मका पालन करना चाहिये।
हे पक्षिन्! मनुष्यके दाह-संस्कारकी जो विधि है, उसको सामान्य रूपसे मैंने तुम्हें सुना दिया है। अब और क्या सुनना चाहते हो?