भारतकोश
गरुड़ पुराण

गरुड़ पुराण

Garuda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished634 पृष्ठ

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पृष्ठ 479

प्रेतकल्प ] आसन्नमृत्यु-व्यक्तिके निमित्त किये जानेवाले प्रायश्चित्त [ ४६९

इसपर गरुडने कहा—हे संसारके स्वामिन्! यदि प्रवासकालमें पतिकी मृत्यु हो जाती है और उसकी अस्थियाँ भी स्त्रीको नहीं प्राप्त होती हैं तो उसका दाह किस प्रकारसे करना चाहिये, यह बतानेकी कृपा करें।

श्रीकृष्णने कहा—हे गरुड! यदि प्रवासी पतिकी अस्थियाँ नहीं प्राप्त होती हैं तो मैं उसकी भी सद्गतिका विधान तुम्हें सुनाता हूँ। उस परम गोपनीय तत्त्वको तुम सुनो। जो प्राणी भूखसे पीड़ित होनेके कारण मृत्युको प्राप्त होते हैं, जो व्याघ्रादि हिंसक प्राणियोंके द्वारा मारे जाते हैं, जिनकी मृत्यु गलेमें फाँसीका फन्दा लगानेसे हो जाती है, शरीरकी क्षीणताके कारण जिनकी मृत्यु होती है, जो हाथीके द्वारा मारे जाते हैं, जो विष, अग्नि, बैल और ब्राह्मण-शापसे मृत्युको प्राप्त होते हैं, जिनकी मृत्यु हैजासे होती है, जो आत्मघाती हैं, जो गिरकर या रस्सी आदिके द्वारा किये गये बन्धन अथवा जलमें डूबनेसे मर जाते हैं, उनकी स्थितिको तुम सुनो।

जो सर्प, व्याघ्र, श्रृंगधारी पशु, उपसर्ग (चेचक), पत्थर, जल, ब्राह्मण, जंगली हिंसक पशु, वृक्षपात और विद्युत्पातसे और लोहेसे, पर्वतपरसे गिरनेसे अथवा दीवालके गिरनेसे, पहाड़के खड़े कगारसे, खाट या मध्य कक्षमें मृत्युको प्राप्त होते हैं, ऋतुमती, चाण्डाली, शूद्रा तथा धोबिन आदि त्याज्य स्त्रियोंका संसर्ग, शारीरिक स्पर्श या अधरोंका पान करते हुए जो लोग मृत्युको प्राप्त होते हैं, जो शस्त्राघातसे मरते हैं, विषैले कुत्तेके मुखका स्पर्श करनेसे जिनकी मृत्यु हो जाती है, विधि-विहीन-रूपमें* जो मृत्यु हो जाती है, उसको दुर्मरण समझना चाहिये। उसी पापसे नरकोंको भोगकर वे पुनः प्रेतत्वको प्राप्त होते हैं। ऐसे व्यक्तिका दाह, उदकक्रिया और मरणनिमित्तक अन्य कृत्य तथा और्ध्वदैहिक कर्म नहीं करना चाहिये। इस प्रकारसे अपमृत्यु होनेपर पिण्डदानका कर्म भी वर्जित है। यदि प्रमादवश कोई पिण्डदान करता है तो वह उसे प्राप्त नहीं होता और अन्तरिक्षमें विनष्ट हो जाता है। अतः लोकगर्हासे डरकर उसके शुभेच्छु पुत्र-पौत्र और सगोत्री जनोंको मृतकके लिये 'नारायणबलि' करनी चाहिये। ऐसा करनेपर ही उन्हें शुचिता प्राप्त होती है अन्यथा नहीं; यह यमराजका वचन है।

नारायणबलि किये जानेपर और्ध्वदैहिक कर्मकी योग्यता आ जाती है। अपमृत्यु होनेपर ऐसे प्राणीका शुद्धिकरण इसी कर्म (नारायणबलि)-से सम्भव है अन्यथा नहीं।

नारायणबलि सम्यक् रूपसे तीर्थमें करना चाहिये। ब्राह्मणोंके द्वारा भगवान् कृष्णके समक्ष नारायणबलि करानेसे मनुष्य पवित्र हो जाता है। पुराण, वेदके ज्ञाता ब्राह्मण सबसे पहले तर्पण करें। सभी प्रकारकी औषधियोंको और अक्षतको जलमें मिलाकर 'पुरुषसूक्त' या 'वैष्णवसूक्त' का उच्चारण करते हुए विष्णुके उद्देश्यसे सम्पन्न करना चाहिये। उसके बाद दक्षिणाभिमुख होकर प्रेत और विष्णुका इस प्रकार स्मरण करे—

अनादिनिधनो देवः शङ्खचक्रगदाधरः॥
अक्षयः पुण्डरीकाक्ष प्रेतमोक्षप्रदो भव।
(४।११८-११९)

'हे देव! आप अनादि, अजर और अमर हैं। हे देव! आप शंख, चक्र एवं गदासे सुशोभित विष्णु हैं। आप कभी न विनष्ट होनेवाले परमात्मा हैं। हे पुण्डरीकाक्ष! आप इस प्रेतको मोक्ष प्रदान करनेकी कृपा करें।'


* अकस्मात् किसी ऐसी स्थितिमें मरण हो रहा है जब मरणासन्न व्यक्तिके लिये शास्त्रोक्त विधियाँ सम्पन्न नहीं हो पाती हैं, तब ऐसा मरण विधि-विहीन मरण माना जाता है।

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