भारतकोश
गरुड़ पुराण

गरुड़ पुराण

Garuda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished634 पृष्ठ

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पृष्ठ 480
४७०संक्षिप्त गरुडपुराण[ धर्मकाण्ड—

वीतराग, विमत्सर, जितेन्द्रिय, शुचिष्मान् और धर्मतत्पर होकर वहींपर भक्तिपूर्वक एकादश श्राद्ध करे। उसके बाद वह सावधानमनसे विधिवत् जल, अक्षत, यव, गेहूँ और कँगनीका दान दे। उस समय शुभ हविष्यान्न, सुन्दर बनी हुई सोनेकी अंगूठी, छत्र और पगड़ीका दान देना चाहिये। इन वस्तुओंके अतिरिक्त दूध-मधुसे समन्वित सभी प्रकारके अन्न देना चाहिये। वस्त्र और पादुका समन्वित आठ प्रकारका पददान सुपात्रोंको समभावसे दिया जाना चाहिये। पिण्डदान करनेके बाद मन्त्रोच्चारसहित गन्ध, पुष्प और अक्षतसे पूजा करे, तत्पश्चात् ब्राह्मणोंको सम्मानसहित दान दे। शंख, खड्ग अथवा ताम्रपात्रमें पृथक्-पृथक् तर्पण करना चाहिये। उसके बाद ध्यान-धारणासे संयुक्त होकर दोनों घुटनोंके बल पृथ्वीपर अवस्थित होकर मन्त्रोच्चारपूर्वक उद्दिष्ट देवोंके लिये पृथक्-पृथक् अर्घ्य प्रदान करे। पञ्चरत्नसे युक्त पृथक्-पृथक् पाँच कुम्भोंमें ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र, यम और प्रेत—इन पाँचोंको स्थापित करना चाहिये। इसके अतिरिक्त वस्त्र, यज्ञोपवीत, मूँग और पददान पृथक्-पृथक् स्थापित करे। यथाविधि उन देवोंके लिये पाँच श्राद्ध करना चाहिये। शंख या ताम्रपात्र न मिलनेपर मृण्मयपात्रमें सर्वौषधिसे युक्त तिलोदक लेकर प्रत्येक पिण्डपर पृथक्-पृथक् जलधारा देनी चाहिये। तिलसे पूर्ण ताम्रपात्र दक्षिणा और स्वर्णसे युक्त तथा पददान मुख्य ब्राह्मणोंको देना चाहिये। यमके निमित्त दक्षिणासहित तिल और लोहेका दान देना चाहिये। विष्णुदेवके लिये यथाशक्ति विधिपूर्वक बलि प्रदान करनेपर मृत व्यक्तिका नरकलोकसे उद्धार हो जाता है, इसमें तनिक भी संदेह नहीं है।

जो व्यक्ति सर्पदंशसे मर जाता है, उसके विषयमें विशेष बात मुझसे सुनो—

एक भार सोनेकी नागप्रतिमा बनवाकर गौके सहित विधिवत् उसका दान ब्राह्मणको कर देना चाहिये। ऐसा करके पुत्र अपने पिताके ऋणसे मुक्त हो जाता है। इस प्रकार सर्पबलि देकर मनुष्य सर्पदोषके पापसे दूर हो जाता है। हे गरुड ! उसके बाद सर्वौषधिसे समन्वित पुत्तलका निर्माण करना चाहिये। पुत्तलके निर्माणमें पलाश और वृन्तोंका विभाग सुनो—

काले मृगका चर्म बिछाकर उसके ऊपर कुशसे निर्मित एक पुरुषकी आकृति बनानी चाहिये। तीन सौ साठ वृन्तोंसे मनुष्यकी अस्थियोंका निर्माण होता है। उन वृन्तोंका विन्यास इन अङ्गोंमें पृथक्-पृथक् रूपसे करना चाहिये। चालीस वृन्त शिरोभाग, दस वृन्त ग्रीवा, बीस वृन्त वक्षःस्थल, बीस वृन्त उदर, सौ वृन्त दोनों बाहु, बीस वृन्त कटि, सौ वृन्त दोनों उरुभाग, तीस वृन्त दोनों जंघा प्रदेश, चार वृन्त शिश्न, छः वृन्त दोनों अण्डकोश और दस वृन्त पैरकी अंगुली भागमें स्थापित करनेका विधान है। इसके बाद शिरोभागमें नारियल, तालु प्रदेशमें लौकी, मुखमें पञ्चरत्न, जिह्वामें कदलीफल, आँतोंके स्थानमें कमलनाल, नासिका भागमें बालू, वसाके स्थानमें मिट्टी, हरिताल और मनःशिल, वीर्यके स्थानपर पारद, पुरीषके स्थानपर पीतल, शरीरमें मनःशील, संधिभागोंमें तिलका पाक, मांसके स्थानपर पिसा हुआ यव, रक्तके स्थानपर मधु, केशराशिके स्थानपर जटाजूट, त्वचाके स्थानपर मृगचर्म, दोनों कानके स्थानपर तालपत्र, दोनों स्तनोंके स्थानपर गुञ्जाफल, नासिका भागमें शतपत्र, नाभिमण्डलमें कमल, दोनों अण्डकोशोंके स्थानपर बैगन, लिङ्गभागमें बढ़िया सुन्दर गाजर, नाभिमें घी, कौपीनके स्थानपर त्रपु अर्थात् लाह, स्तनोंमें मोती, ललाटपर कुंकुमका लेप, कर्पूर एवं अगुरु धूप, सुगन्धित मालाका अलंकरण, पहननेके लिये