भारतकोश
गरुड़ पुराण

गरुड़ पुराण

Garuda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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प्रेतकल्प ] आसन्नमृत्यु-व्यक्तिके निमित्त किये जानेवाले प्रायश्चित्त [ ४७१


हृदयमें पट्टसूत्रका विन्यास करना चाहिये। उसकी दोनों भुजाओंमें ऋद्धि एवं वृद्धि, दोनों नेत्रोंमें कौड़ी, दाँतोंमें अनारके बीज, अँगलियोंके स्थानमें चम्पाके पुष्प और नेत्रोंके कोण भागमें सिन्दूर भरकर ताम्बूल आदि शोभादायक अन्य पदार्थ भी भेंट करना चाहिये।

इस प्रकार सर्वौषधियुक्त उस प्रेतकी विधिवत् पूजा कर यदि मृत व्यक्ति अग्निहोत्री रहा हो तो उसके अङ्गोंमें यथाक्रम यज्ञ-पात्र स्थापित करे। तदनन्तर ‘स्त्रियः पुनन्तु मे शिर०’ तथा ‘इमं मे वरुणेन च०’ इन मन्त्रोंसे अभिमन्त्रित शालग्रामशिलायुक्त जलसे उक्त प्रेतको पवित्र करके भगवान् विष्णुको उद्देश्य कर सुशीला, दूध देनेवाली गौका दान देना चाहिये। तत्पश्चात् तिल, लौह, स्वर्ण, कपास, लवण, सप्तधान्य, पृथ्वी तथा गौ, जो एक-से-एक बढ़कर पवित्र बताये गये हैं, उनका भी दान करना चाहिये। उसके बाद तिल-पात्र तथा पददान भी करना चाहिये। तदनन्तर प्रेतकी मुक्तिके लिये वैष्णव श्राद्ध करे। उसके बाद श्राद्धकर्ता हृदयमें भगवान् विष्णुका ध्यान करके प्रेतमोक्षका कार्य सम्पन्न करे।

उक्त विधिसे बनाये गये पुत्तलका विधिपूर्वक दाह करना चाहिये। तत्पश्चात् उसकी शुद्धिके लिये पुत्रादि संस्कर्ता प्रायश्चित्त करें। जिसमें तीन, छः, बारह तथा पंद्रह कृच्छ्रव्रत करनेका विधान है। प्रायश्चित्त कर्ममें असमर्थ होनेपर गाय, सुवर्णादिका दान अथवा तत्प्रतिनिधिभूत द्रव्यका दान करना चाहिये। विद्वान्‌को इस प्रकार अपनी शुद्धि करनी चाहिये। अशुद्ध दाताके द्वारा अशुद्धको उद्देश्य करके जो कुछ श्राद्ध तथा दानादिक किया जाता है, वह सब कुछ अन्तरिक्षमें ही विनष्ट हो जाता है। अतः विधिवत् शुद्ध होकर मनुष्यको दाहादिक और्ध्वदैहिक कर्म करना चाहिये।

हे गरुड! जो प्राणी बिना प्रायश्चित्त किये ही दाहादिक कर्म ज्ञानपूर्वक या अज्ञानपूर्वक करता है, वह वहन, अग्निदान, जलदान, स्नान, स्पर्श, रज्जुछेदन तथा अश्रुपात करके तप्तकृच्छ्रव्रतसे शुद्ध होता है। जो शवको ले जाता है अथवा दाह-संस्कार करता है, वह कटोदक-क्रिया करके कृच्छ्रसान्तपनव्रत करे। छोटे दोषको दूर करनेके लिये छोटा और बड़े दोषको दूर करनेके लिये बड़ा प्रायश्चित्त करना चाहिये।

गरुडने कहा—हे प्रभो! कृच्छ्र, तप्तकृच्छ्र तथा सान्तपन—ये जो तीन प्रायश्चित्त व्रत आपने बताये हैं; इन तीनोंके लक्षणोंको भी मुझे बतानेकी कृपा करें।

भगवान् श्रीकृष्णने कहा—हे गरुड! तीन दिन प्रातःकाल, तीन दिन सायंकाल, तीन दिन अयाचित हविष्यान्नका आहार और तीन दिनका उपवास क्रमशः जिस व्रतमें किया जाता है, वह ‘कृच्छ्रव्रत’ कहलाता है<sup></sup>। जिस व्रतमें क्रमशः एक दिन गरम दूध, दूसरे दिन गरम घी तथा तीसरे दिन गरम जल पानकर चौथे दिन एक रात्रिका उपवास किया जाता है, उसका नाम ‘तप्तकृच्छ्र’ व्रत है<sup></sup>। जब गोमूत्र, गोमय, गोदधि, गोदुग्ध और कुशोदक—इन पाँच पदार्थोंको क्रमशः एक-एक दिन पान करके पुनः कृच्छ्रव्रतका उपवास किया जाता है तो उसको ‘सान्तपनव्रत’ कहा जाता है<sup></sup>

हे पक्षिन्! पापी व्यक्तिके मरनेपर कौन-सी क्रिया करनी चाहिये, यह मैंने तुम्हें बता दिया है। पुत्तलदाहमें (पुत्तलके हृदयपर रखा) जलता हुआ दीपक जब बुझ जाय तो उस समय उसकी मृत्यु


<sup></sup>त्र्यहं प्रातस्त्र्यहं सायं त्र्यहमद्यादयाचितम्। उपवासस्त्र्यहञ्चैव एष कृच्छ्र उदाहृतः॥ (४।१६३)
<sup></sup>तप्तक्षीरघृताम्बूनामेकैकं प्रत्यहं पिबेत्। एकरात्रोपवासश्च तप्तकृच्छ्र उदाहृतः॥ (४।१६४)
<sup></sup>गोमूत्रं गोमयं क्षीरं दधिसर्पिः कुशोदकम्। जग्ध्वा परेऽह्युपवसेत्कृच्छ्रं सान्तपनं चरन्॥ (४।१६५)

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