गरुड़ पुराण
Garuda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें| ४७२ | संक्षिप्त गरुडपुराण | [ धर्मकाण्ड- |
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समझनी चाहिये। तदनन्तर अग्निदाह करे और तीन दिनका सूतक करे। दशाह और गर्तपिण्ड करना चाहिये। इस विधिका सम्यक् पालन करनेसे प्रेत मुक्ति प्राप्त करता है। यदि किसीके मरणका भ्रम होनेसे उसकी प्रतिकृतिका दाह-संस्कार हो जाय और वह मनुष्य उसके बाद आ जाय तो उसे ले जाकर घृतकुण्डमें स्नान कराना चाहिये। तदनन्तर जातकर्मादि संस्कार पुनः किये जायँ। ऐसे पुरुषको अपनी विवाहिता पत्नीसे विधिवत् पुनर्विवाह कर लेना चाहिये। हे खग! यदि विदेशमें गये किसी व्यक्तिको पंद्रह अथवा बारह वर्ष बीत गये हों और उसका इस अवधिके बीच कोई समाचार नहीं प्राप्त होता है तो उसकी प्रतिकृति बनाकर उसका दाह-संस्कार कर डालना चाहिये।
हे गरुड! रजस्वला और सूतिका स्त्रीके मरनेपर कौन-सा विशेष कर्म करना धर्मसम्मत है, अब उसको तुम सुनो—सूतिका स्त्रीकी मृत्यु होनेपर याज्ञिकजन कुम्भमें जल और पञ्चगव्य लाकर पुण्यजनित मन्त्रोंसे अभिमन्त्रित करके उससे स्वयंको शुद्ध करे। उसके बाद सौ शूपजलसे विधिपूर्वक शवको स्नान कराके पुनः उसको पञ्चगव्यसे स्नान कराये। फिर कपड़ेसे बनायी गयी आकृतिके साथ यथाविधि जला देना चाहिये।
पञ्चककालमें मृत्यु होनेपर दाह-संस्कारकी विधि क्या है? उसको मैं कहता हूँ, तुम सुनो—
हे खगेश! मासके प्रारम्भमें धनिष्ठा नक्षत्रके अर्धभागसे लेकर रेवती नक्षत्रतक पञ्चककाल होता है। इसको सदैव दोषपूर्ण एवं अशुभ मानना चाहिये। इस कालमें मरे हुए व्यक्तिका दाह-संस्कार करना उचित नहीं है। यह काल सभी प्राणियोंमें दुःख उत्पन्न करनेवाला है। ऐसे दिनोंमें मृत्युको प्राप्त होनेवाले लोगोंको जलतक नहीं देना चाहिये, क्योंकि ऐसा करनेसे सर्वदा अशुभ होता है। अतः पञ्चककालके समाप्त होनेपर ही मृतकके सभी कर्म करने चाहिये अन्यथा पुत्र और सगोत्रके लिये कष्ट ही होता है। इन नक्षत्रोंमें मृतकका दाह-संस्कार करनेपर घरमें किसी-न-किसी प्रकारकी हानि होती है।
हे गरुड! इन नक्षत्रोंके मध्यमें मनुष्योंका दाह-संस्कार आहुति प्रदान करके विधिपूर्वक किया जा सकता है। सुयोग्य ब्राह्मणोंको वैदिक मन्त्रोंके द्वारा विधिपूर्वक उसका संस्कार करना चाहिये। अतः शवस्थानके समीपमें कुशसे चार पुत्तलक बनाकर नक्षत्र मन्त्रोंसे उनको अभिमन्त्रित करके रख दे। तदनन्तर उन्हीं पुत्तलकोंके साथ मृतकका दाह-संस्कार करे। अशौचके समाप्त हो जानेपर मृतकके पुत्रोंद्वारा शान्ति एवं पौष्टिक कर्म भी होना चाहिये।
जो मनुष्य इन पञ्चक नक्षत्रोंमें मर जाता है, उसको सद्गतिकी प्राप्ति नहीं होती। अतएव मृतकके पुत्रोंको उसके कल्याणहेतु तिल, गौ, सुवर्ण और घीका दान देना चाहिये। समस्त विघ्नोंका विनाश करनेके लिये ब्राह्मणोंको भोजन, पादुका, छत्र, सुवर्णमुद्रा तथा वस्त्र देना चाहिये। यह दान मृतकके समस्त पापोंका विनाशक है और ब्राह्मणोंको दक्षिणा देनी चाहिये, इससे समस्त पापोंका विनाश होता है। (अध्याय ४)