गरुड़ पुराण
Garuda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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आशौचमें विहित कृत्य, आशौचकी अवधि, दशगात्रविधि, प्रथमषोडशी, मध्यमषोडशी तथा उत्तमषोडशीका विधान, नौ श्राद्धोंका स्वरूप, वार्षिक कृत्य, जीवका यममार्गनिदान, मार्गमें पड़नेवाले षोडश नगरोंमें जीवकी यातनाका स्वरूप, यमपुरीमें पापात्माओं और पुण्यात्माओंको घोर तथा सौम्यरूपमें यमराजके दर्शन
श्रीकृष्णने कहा— हे गरुड! इस प्रकार मृत पुरुषका दाह-संस्कार करके स्नान और तिलोदक कर्म कर स्त्रियाँ आगे-आगे तथा पुरुष उनके पीछे-पीछे घर आयें। द्वारपर पहुँचकर वे सभी मृत व्यक्तिका नाम लेकर रोते हुए नीमकी पत्तियोंका प्राशन कर पत्थरके ऊपर खड़े होकर आचमन करें। तदनन्तर सभी पुत्र-पौत्र आदि तथा सगोत्री परिजन घरमें जाकर जो दस रात्रियोंका अशौच-कर्म है, उसको पूरा करें। इस कालमें उन सभीको बाहरसे खरीदकर भोजन करना चाहिये। रात्रिमें वे अलग-अलग आसनपर सोयें। क्षार तथा नमकसे रहित भोजन किया जाय। वे सभी तीन दिनतक शोकमें डूबे रहें। ब्रह्मचर्यव्रतका पालन करके अमांसभोजी होकर पृथ्वीपर ही सोयें। उन सभीके बीच परस्पर शरीरका स्पर्श न हो। वे इस अशौचकालके अन्तरालमें दान एवं अध्ययन-कर्मसे दूर रहें। दुःखसे मलिन, उत्साहहीन, अधोमुख-कातर एवं भोग-विलाससे दूर होकर वे अङ्गमर्दन और सिर धोना भी छोड़ दें। इस अशौचकी अवधिमें मिट्टीके बने पात्र या पत्तलोंमें भोजन करना चाहिये। एक या तीन दिनतक उपवास करे।
गरुडने कहा— हे प्रभो! अशौचियोंके अशौचके विषयमें आपने कह दिया, पर वह अशौच कितने समयतक रहेगा? उसके लक्षण क्या हैं? उससे संलिप्त लोगोंको उस कालमें कैसा जीवन व्यतीत करना चाहिये? इन सभी बातोंको भी आप बतानेकी कृपा करें।
श्रीकृष्णने कहा— हे खगेश! यह अशौच तो विधिसम्मत समय और क्रिया आदिके द्वारा शीघ्र ही समाप्त करनेके योग्य होता है, क्योंकि प्राणी इस कालमें पिण्डदान, अध्ययन और अन्य प्रकारके दान-पुण्यादिक सत्कर्मोंसे दूर हो जाता है। सपिण्डियोंमें मरणाशौच दस दिनका माना जाता है। जो लोग भलीभाँति शुद्धि प्राप्त करनेकी इच्छा रखते हैं, उनके लिये पुत्रादिके जन्म लेनेपर भी इसी प्रकार अशौच होता है। समानोदकोंके जननाशौचमें तीन रात्रिमें शुद्धि होती है। जो मृतकको जल देनेवाले हैं, वे मरणाशौचमें भी तीन दिनोंके पश्चात् शुद्ध हो जाते हैं। दाँत निकलनेतक मरणाशौच होनेपर वह सद्यः समाप्त हो जाता है। यदि चूडाकरण-संस्कार हो जानेके बाद बालककी मृत्यु हो जाती है तो एक रात्रिका अशौच होता है। उपनयन (जनेऊ)-संस्कार होनेके पूर्वतक तीन दिन