भारतकोश
गरुड़ पुराण

गरुड़ पुराण

Garuda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished634 पृष्ठ

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पृष्ठ 484
४७४संक्षिप्त गरुडपुराण[ धर्मकाण्ड-

और उसके बाद दस दिनका अशौच होता है—
आ दन्तजननात्सद्य आ चौलान्नैशिकी स्मृता।
त्रिरात्रमाव्रताद्देशाद्दशरात्रमतः परम्॥
(५।१२)

हे पक्षिन्! तुम्हें मैंने अशौच बता दिया। अब मैं संक्षेपमें प्रसंगप्राप्त अशौचके विषयमें तुम्हें बताता हूँ। हे काश्यप! सूत्रसे बँधे हुए तीन काष्ठोंकी तिगोड़ियाको रात्रिमें आकाशके नीचे स्थापित करके चौराहेपर खड़ा कर दे और 'अत्र स्नाहि०' एवं 'पिबात्र०'<sup></sup> इस मन्त्रोच्चारके साथ उसके ऊपर मिट्टीके पात्रमें जल और दूध रख दे। संस्कर्ता अपने सगोत्रियोंके साथ पहले, तीसरे, सातवें अथवा नवें दिन अस्थि-संचयन करे। जो सगोत्री हैं, वे मृतकके ऊर्ध्वभागकी अस्थियोंका ही स्पर्श कर सकते हैं। समानोदकी भी सभी क्रियाओंके योग्य हैं। प्रेतको पिण्डदान बाहर ही करे। इस क्रियाको करनेके लिये सबसे पहले स्नान करके संयतमना होकर उत्तर दिशामें चरुका निर्माण कर असंस्कृत प्राणीके लिये भूमिपर तथा संस्कार-सम्पन्नके लिये कुशपर नौ दिनोंमें नौ पिण्ड देना चाहिये। उसके बाद दसवें दिन दसवाँ पिण्डदान करे। तदनन्तर चाहे सगोत्री हो अथवा असगोत्री, चाहे स्त्री हो या पुरुष वह रात्रि बीतनेके पश्चात् पवित्र हो जाता है। पहले दिन जो पिण्डदानकी क्रिया करता है, उसे ही दसवें दिनतक प्रेतकी अन्य समस्त क्रियाएँ करनी चाहिये। चाहे चावल हो, चाहे सत्तू हो, चाहे शाक हो, पहले दिन जिससे पिण्डदान करे, उससे ही दस दिनतक पिण्डदान करना चाहिये।

हे गरुड.! जबतक यह प्रेतजन्य अशौच रहता है तबतक प्रेतको प्रतिदिन एक-एक अञ्जलि बढ़ाते हुए जल-दान देनेका विधान है अथवा जिस दिन यह देना हो उस दिनकी संख्याके अनुसार वर्धमानक्रमसे उतनी अञ्जलि जल-दान करे। इस प्रकार दसवें दिन पचपन अञ्जलि पूर्ण करे। यदि अशौच दो दिन बढ़ जाता है तो पुनः उसी क्रमके अनुसार सौ अञ्जलि जल और देना चाहिये। यदि वह अशौच तीन दिनका ही है तो दस अञ्जलि ही जल देना चाहिये। हे पक्षिन्! इस जलदानका क्रम यह है कि अशौचके पहले दिन तीन, दूसरे दिन चार और तीसरे दिन तीन अञ्जलि जल देना चाहिये। हे गरुड! जब शताञ्जलि जल-दानकी क्रिया सम्पन्न की जाती है तो उस विधानके अनुसार पहले दिन तीस, दूसरे दिन चालीस तथा तीसरे दिन तीस अञ्जलि जल दिया जाता है।

इस प्रकार दोनों पक्षोंमें जलाञ्जलियोंकी संख्याका निर्धारण करना चाहिये। इन सभी पितृक्रियाओंको सम्पन्न करनेका मुख्य अधिकारी पुत्र ही होता है। इस प्रेतश्राद्धमें दूध या जलसे पिण्डका सेचन तथा पुष्प-धूपादिक पदार्थसे पिण्डका पूजन बिना मन्त्रोच्चार किये ही करना चाहिये। दसवें दिन केश, श्मश्रु, नख और वस्त्रका परित्याग करके गाँवके बाहर स्नान करना चाहिये। ब्राह्मण जल, क्षत्रिय वाहन, वैश्य प्रतोद (चाबुक) अथवा रश्मि तथा शूद्र छड़ीका स्पर्श करके पवित्र होता है। मृतसे अल्प वयवाले सपिण्डोंको मुण्डन कराना चाहिये।<sup></sup>

छः और दस इस प्रकार सोलह पिण्डदान करके षोडशी कर्म सम्पन्न करनेका विधान है। यह मलिनषोडशी मृत दिनसे दस दिनमें पूर्ण होती है।


१-श्मशानानलदग्धोऽसि परित्यक्तोऽसि बान्धवैः। इदं नीरं इदं क्षीरं अत्र स्नाहि इदं पिब॥
२-अन्त्यकर्मदीपक पृष्ठ ४० की टिप्पणीके अनुसार मृत व्यक्तिसे अवस्थामें जो लोग कनिष्ठ हैं, उन्हें मुण्डन कराना चाहिये—यह कुछ लोगोंका मत है। कुछ लोगोंका यह भी मत है कि जितने लोग मरणके दुःखका अनुभव करनेवाले हैं, उन सभीको मुण्डन कराना चाहिये। इन दोनों मतोंको अपनी-अपनी परम्पराके अनुसार स्वीकार किया जा सकता है।