भारतकोश
संग्रह पर लौटें

गरुड़ पुराण

Garuda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished634 पृष्ठ
४७४संक्षिप्त गरुडपुराण[ धर्मकाण्ड-

और उसके बाद दस दिनका अशौच होता है—
आ दन्तजननात्सद्य आ चौलान्नैशिकी स्मृता।
त्रिरात्रमाव्रताद्देशाद्दशरात्रमतः परम्॥
(५।१२)

हे पक्षिन्! तुम्हें मैंने अशौच बता दिया। अब मैं संक्षेपमें प्रसंगप्राप्त अशौचके विषयमें तुम्हें बताता हूँ। हे काश्यप! सूत्रसे बँधे हुए तीन काष्ठोंकी तिगोड़ियाको रात्रिमें आकाशके नीचे स्थापित करके चौराहेपर खड़ा कर दे और 'अत्र स्नाहि०' एवं 'पिबात्र०'<sup></sup> इस मन्त्रोच्चारके साथ उसके ऊपर मिट्टीके पात्रमें जल और दूध रख दे। संस्कर्ता अपने सगोत्रियोंके साथ पहले, तीसरे, सातवें अथवा नवें दिन अस्थि-संचयन करे। जो सगोत्री हैं, वे मृतकके ऊर्ध्वभागकी अस्थियोंका ही स्पर्श कर सकते हैं। समानोदकी भी सभी क्रियाओंके योग्य हैं। प्रेतको पिण्डदान बाहर ही करे। इस क्रियाको करनेके लिये सबसे पहले स्नान करके संयतमना होकर उत्तर दिशामें चरुका निर्माण कर असंस्कृत प्राणीके लिये भूमिपर तथा संस्कार-सम्पन्नके लिये कुशपर नौ दिनोंमें नौ पिण्ड देना चाहिये। उसके बाद दसवें दिन दसवाँ पिण्डदान करे। तदनन्तर चाहे सगोत्री हो अथवा असगोत्री, चाहे स्त्री हो या पुरुष वह रात्रि बीतनेके पश्चात् पवित्र हो जाता है। पहले दिन जो पिण्डदानकी क्रिया करता है, उसे ही दसवें दिनतक प्रेतकी अन्य समस्त क्रियाएँ करनी चाहिये। चाहे चावल हो, चाहे सत्तू हो, चाहे शाक हो, पहले दिन जिससे पिण्डदान करे, उससे ही दस दिनतक पिण्डदान करना चाहिये।

हे गरुड.! जबतक यह प्रेतजन्य अशौच रहता है तबतक प्रेतको प्रतिदिन एक-एक अञ्जलि बढ़ाते हुए जल-दान देनेका विधान है अथवा जिस दिन यह देना हो उस दिनकी संख्याके अनुसार वर्धमानक्रमसे उतनी अञ्जलि जल-दान करे। इस प्रकार दसवें दिन पचपन अञ्जलि पूर्ण करे। यदि अशौच दो दिन बढ़ जाता है तो पुनः उसी क्रमके अनुसार सौ अञ्जलि जल और देना चाहिये। यदि वह अशौच तीन दिनका ही है तो दस अञ्जलि ही जल देना चाहिये। हे पक्षिन्! इस जलदानका क्रम यह है कि अशौचके पहले दिन तीन, दूसरे दिन चार और तीसरे दिन तीन अञ्जलि जल देना चाहिये। हे गरुड! जब शताञ्जलि जल-दानकी क्रिया सम्पन्न की जाती है तो उस विधानके अनुसार पहले दिन तीस, दूसरे दिन चालीस तथा तीसरे दिन तीस अञ्जलि जल दिया जाता है।

इस प्रकार दोनों पक्षोंमें जलाञ्जलियोंकी संख्याका निर्धारण करना चाहिये। इन सभी पितृक्रियाओंको सम्पन्न करनेका मुख्य अधिकारी पुत्र ही होता है। इस प्रेतश्राद्धमें दूध या जलसे पिण्डका सेचन तथा पुष्प-धूपादिक पदार्थसे पिण्डका पूजन बिना मन्त्रोच्चार किये ही करना चाहिये। दसवें दिन केश, श्मश्रु, नख और वस्त्रका परित्याग करके गाँवके बाहर स्नान करना चाहिये। ब्राह्मण जल, क्षत्रिय वाहन, वैश्य प्रतोद (चाबुक) अथवा रश्मि तथा शूद्र छड़ीका स्पर्श करके पवित्र होता है। मृतसे अल्प वयवाले सपिण्डोंको मुण्डन कराना चाहिये।<sup></sup>

छः और दस इस प्रकार सोलह पिण्डदान करके षोडशी कर्म सम्पन्न करनेका विधान है। यह मलिनषोडशी मृत दिनसे दस दिनमें पूर्ण होती है।


१-श्मशानानलदग्धोऽसि परित्यक्तोऽसि बान्धवैः। इदं नीरं इदं क्षीरं अत्र स्नाहि इदं पिब॥
२-अन्त्यकर्मदीपक पृष्ठ ४० की टिप्पणीके अनुसार मृत व्यक्तिसे अवस्थामें जो लोग कनिष्ठ हैं, उन्हें मुण्डन कराना चाहिये—यह कुछ लोगोंका मत है। कुछ लोगोंका यह भी मत है कि जितने लोग मरणके दुःखका अनुभव करनेवाले हैं, उन सभीको मुण्डन कराना चाहिये। इन दोनों मतोंको अपनी-अपनी परम्पराके अनुसार स्वीकार किया जा सकता है।

२२१- वृषोत्सर्गकी महिमामें राजा वीरवाहनकी कथा, देवर्षि नारदके पूर्वजन्मके इतिहासवर्णनमें सत्संगति और भगवद्भक्तिका माहात्म्य, वृषोत्सर्गके प्रभावसे राजा वीरवाहनको पुण्यलोककी प्राप्ति

प्रेतकल्प ] आशौचमें विहित कृत्य, आशौचकी अवधि तथा दशगात्रविधि ४७५

हे पक्षिश्रेष्ठ! पुत्रादि दस दिनोंतक जो पिण्डदान करते हैं, वे प्रतिदिन चार भागोंमें विभाजित हो जाते हैं। उसमें प्रथम दो भागसे आतिवाहिक शरीर, तीसरे भागसे यमदूत और चौथे भागसे वह मृतक स्वयं तृप्त होता है।

नौ दिन और रात्रिमें वह शरीर अपने अंगोंसे युक्त हो जाता है। प्रथम पिण्डदानसे प्रेतके शिरोभागका निर्माण होता है। दूसरे पिण्डदानसे उसके कान-नेत्र और नाककी सृष्टि होती है। तीसरे पिण्डदानसे क्रमशः—कण्ठ, स्कन्ध, बाहु एवं वक्षःस्थल, चौथे पिण्डदानसे नाभि, लिंग और गुदाभाग तथा पाँचवें पिण्डदानसे जानु, जंघा और पैर बनते हैं। इसी प्रकार छठें पिण्डदानसे सभी मर्मस्थल, सातवें पिण्डदानसे नाड़ीसमूह, आठवें पिण्डदानसे दाँत और लोम तथा नवें पिण्डदानसे वीर्य एवं दसवें पिण्डदानसे उस शरीरमें पूर्णता, तृप्ति और भूख-प्यासका उदय होता है—

अहोरात्रैस्तु नवभिर्देहो निष्पत्तिमाप्नुयात् ।
शिरस्त्वाद्येन पिण्डेन प्रेतस्य क्रियते तथा ॥
द्वितीयेन तु कर्णाक्षिनासिकं तु समासतः ।
गलांसभुजवक्षश्च तृतीयेन तथा क्रमात् ॥
चतुर्थेन च पिण्डेन नाभिलिङ्गगुदं तथा ।
जानुजंघं तथा पादौ पञ्चमेन तु सर्वदा ॥
सर्वमर्माणि षष्ठेन सप्तमेन तु नाडयः ।
दन्तलोमान्यष्टमेन वीर्यन्तु नवमेन च ॥
दशमेन तु पूर्णत्वं तृप्तता क्षुद्विपर्ययः ।
(५।३३—३७)

हे वैनतेय! अब मैं मध्यमषोडशी विधिका वर्णन करता हूँ। उसको सुनो।

विष्णुसे आरम्भ करके विष्णुपर्यन्त एकादश श्राद्ध तथा पाँच देवश्राद्ध इस प्रकार षोडश श्राद्ध किये जाते हैं। इन्हींका नाम मध्यमषोडशी है। यदि प्रेतकल्याणके निमित्त ‘नारायणबलि’ की जाय तो उसको एकादशाहके दिन करना चाहिये और उसी दिन वहींपर वृषोत्सर्ग भी करना चाहिये। जिस जीवका ग्यारहवें दिन वृषोत्सर्ग नहीं होता, सैकड़ों श्राद्ध करनेपर भी उस जीवकी प्रेतत्वसे मुक्ति नहीं होती है। वृषोत्सर्ग बिना किये ही जो पिण्डदान किया जाता है, वह पूर्णतया निष्फल होता है। उससे प्रेतका कोई उपकार नहीं होता।* इस पृथ्वीपर वृषोत्सर्गके बिना कोई अन्य उपाय नहीं है, जो प्रेतका कल्याण करनेमें समर्थ हो। अतः पुत्र, पत्नी, दौहित्र (नाती), पिता अथवा पुत्रीको स्वजनकी मृत्युके पश्चात् निश्चित ही वृषोत्सर्ग करना चाहिये। चार बछियोंसे युक्त, विधानपूर्वक अलंकृत वृष, जिसके निमित्त छोड़ा जाता है उसको प्रेतत्वकी प्राप्ति नहीं होती। यदि एकादशाहके दिन यथाविधान साँड़ उत्सर्ग करनेके लिये उपलब्ध नहीं है तो विद्वान् ब्राह्मण कुश या चावलके चूर्णसे साँड़का निर्माण करके उसका उत्सर्ग कर सकता है। यदि बादमें भी वृषोत्सर्गके समय किसी प्रकार साँड़ नहीं मिल रहा है तो मिट्टी या कुशसे ही साँड़का निर्माण करके उसका उत्सर्ग करना चाहिये। जीवनकालमें प्राणीको जो भी पदार्थ प्रिय रहा हो उसका भी दान इसी एकादशाह श्राद्धके दिन करना उचित है। इसी दिन मरे हुए स्वजनको उद्देश्य बनाकर शय्या, गौ आदिका दान भी करना चाहिये। इतना ही नहीं उस प्रेतकी क्षुधा-शान्तिके लिये बहुतसे ब्राह्मणोंको भोजन भी कराना चाहिये।

हे विनतापुत्र गरुड! अब मैं तृतीय षोडशी (उत्तम-षोडशी)-श्राद्धका वर्णन कर रहा हूँ, उसे सुनो।


* एकादशाहे प्रेतस्य यस्योत्सृज्येत नो वृषः। प्रेतत्वं सुस्थिरं तस्य दत्तैः श्राद्धशतैरपि॥
अकृत्वा यद्वृषोत्सर्गं कृतं वै पिण्डपातनम्। निष्फलं सकलं विद्यात्प्रमीताय न तद्भवेत्॥ (५।४०-४१)

४७६संक्षिप्त गरुडपुराण[ धर्मकाण्ड—

प्रत्येक बारह मासके बारह पिण्ड, ऊनमासिक (आद्य) त्रैपाक्षिक, ऊनषाण्मासिक एवं ऊनाब्दिक—इन्हें मतभेदसे तृतीय अथवा उत्तमषोडशी भी कहा जाता है।

बारहवें दिन, तीन पक्षमें, छः महीनेमें अथवा वर्षके अन्तमें सपिण्डीकरण करना चाहिये। जिस मृतकके निमित्त इन षोडश श्राद्धोंको सम्पन्न करके ब्राह्मणोंको दान नहीं दिया जाता है, उस प्रेतके लिये अन्य सौ श्राद्ध करनेपर भी मुक्ति प्राप्त नहीं होती। हे खगेश! मृतक व्यक्तिके एकादशाह अथवा द्वादशाह तिथिमें आद्यश्राद्ध करनेका विधान माना गया है। प्रतिमासका श्राद्ध मासके आद्यतिथिमें मृत-तिथिपर होना चाहिये। ऊनश्राद्ध (ऊनमासिक, ऊनषाण्मासिक तथा ऊनाब्दिक)—मास, छठें मास और वर्षमें एक, दो अथवा तीन दिन कम रहनेपर करना चाहिये<sup></sup>। सपिण्डीकरण वर्ष पूर्ण होनेके बाद अथवा छः महीने बाद करना चाहिये अथवा आभ्युदयिक (विवाहादि मङ्गल-कार्य अनिवार्य रूपसे उपस्थित होनेपर) कार्य आनेपर तीन पक्ष अथवा बारह दिनके बाद करना चाहिये। मनुष्योंके कुलधर्म असंख्य हैं, उनकी आयु भी क्षरणशील है और शरीर अस्थिर है। अतः बारहवें दिन सपिण्डीकरण करना उत्तम है।

हे पक्षिराज! सपिण्डीकरण श्राद्धोंके सम्पादकीय विधि भी मुझसे सुनो।

हे काश्यप! एकोद्दिष्ट विधानके अनुसार यह कार्य करना चाहिये<sup></sup>। तिल, गन्ध और जलसे परिपूर्ण चार पात्रोंकी व्यवस्था करके एक पात्र प्रेतके निमित्त और शेष तीन पात्र पितृगणोंके लिये निश्चित करना चाहिये। तदनन्तर उन तीन पात्रोंमें प्रेतपात्रके जलका सेचन करे। चार पिण्ड बनाये और प्रेत-पिण्डका उन तीन पिण्डोंमें मेलन कर दे। तबसे वह प्रेत पितरके रूपमें हो जाता है। हे खगेश्वर! उस प्रेतमें पितृत्वभावके आ जानेके बाद उस प्रेत तथा अन्य उसके पितृ-पितामह आदि पितरोंका समस्त श्राद्धकृत्य श्राद्धकी सामान्य विधिके अनुसार ही करना चाहिये। मृत पतिके साथ एक ही चितामें प्रवेश और एक ही दिन दोनोंकी मृत्यु होनेपर स्त्रीका सपिण्डीकरण नहीं होता है। उसके पतिके सपिण्डीकरण श्राद्धसे ही स्त्रीका सपिण्डीकरण श्राद्ध सम्पन्न हो जाता है। हे खगेश! पतिके मरनेके बाद स्त्रीकी मृत्यु होनेपर स्त्रीका सपिण्डन पतिके साथ होगा और सहमृत्युकी दशामें दोनोंके श्राद्धके लिये एक पाक, एक समय तथा एक कर्ता होगा। किंतु श्राद्ध पति-पत्नीका पृथक्-पृथक् ही किया जाना चाहिये। यदि स्त्री पतिके साथ चितामें


१-(क) एकद्वित्रिदिनैरूने त्रिभागेनोने एव वा। श्राद्धान्यूनाब्दिकादीनि कुर्यादित्याह गौतमः॥
नन्दायां भार्गवदिने चतुर्दश्यां त्रिपुष्करे। ऊनश्राद्धं न कुर्वीत गृही पुत्रधनक्षयात्॥ (गार्ग्य)
द्विपुष्करे च नन्दायां सिनीवाल्यां भृगोर्दिने। चतुर्दश्यां च नो तानि कृतिकासु त्रिपुष्करे॥
एक, दो, तीन अथवा दस दिन कम रहनेपर, नन्दा तिथिको, शुक्रवारको, चतुर्दशी तिथि, त्रिपुष्कर और द्विपुष्कर योग, अमावास्या तिथि, कृत्तिका, रोहिणी तथा मृगशिरा तिथियोंमें ऊनश्राद्ध (ऊनमासिक, ऊनषाण्मासिक, ऊनाब्दिक) नहीं करना चाहिये।
(ख) 'सपिण्डीकरणं चैव' इस वाक्यसे तृतीय षोडशीके अन्तर्गत सपिण्डीमें किये जानेवाले प्रेतश्राद्धकी गणना करनेपर 'शताद्धेन तु मेलयेत्' इस वाक्यसे विरोध होता है। सपिण्डीकरणमें किये जानेवाले प्रेतश्राद्धको तृतीय षोडशीके अन्तर्गत कात्यायनने माना है। इसका 'शतार्धेन तु मेलयेत्' से विरोध है।
श्राद्धकल्पलतामें तथा आचार्य गोभिल, लौगाक्षि पैठिनसिके मतमें सपिण्डन श्राद्ध तृतीय षोडशीके बाहर है।
(ग) 'द्वादशप्रतिमास्यानि' इस पदसे प्रथम मासिका बोध हो जानेके कारण आद्य पदके अर्थमें ऊनमासिक उपलक्षण है। इसी प्रकार 'षाण्मासिक' पदका ऊनषाण्मासिक और ऊनाब्दिक अर्थमें लाक्षणिक प्रयोग है।
२-सपिण्डीकरणके अन्तर्गत किये जानेवाले केवल प्रेतश्राद्धके उद्देश्यसे एकोद्दिष्ट विधिका उल्लेख है। इस श्राद्धके अन्तर्गत किया जानेवाला प्रेतके पिता आदिका श्राद्ध सदैव पार्वण-विधिसे किया जाना चाहिये।

प्रेतकल्प ] आशौचमें विहित कृत्य, आशौचकी अवधि तथा दशगात्रविधि ४७७


सती न होकर अन्य किसी दिन सती होती है तो उस स्त्रीकी मृत तिथिके आनेपर उसके लिये पृथक् रूपसे पिण्डदान करना चाहिये।

हे गरुड! सहमृत्युकी दशामें प्रत्येक वर्ष नवश्राद्ध एक साथ करना चाहिये। जिस मृतकका वार्षिक श्राद्धसे पूर्व सपिण्डीकरण हो जाता है, उसके लिये भी वर्षभर मासिक श्राद्ध और जलकुम्भ दान करना चाहिये<sup></sup>। धनका बँटवारा हो जानेपर भी नवश्राद्ध, सपिण्डन श्राद्ध और षोडश श्राद्ध करनेका अधिकार एक ही व्यक्तिको है।

हे कश्यपपुत्र! अब मैं तुम्हें नवश्राद्ध करनेका काल बताऊँगा। उसको सुनो।

हे पक्षिन्! मृत्युके दिन मृतस्थानपर पहला श्राद्ध करना चाहिये। उसके बाद दूसरा श्राद्ध मार्गमें उस स्थानपर करना चाहिये जहाँपर शव रखा गया था। तदनन्तर तीसरा श्राद्ध अस्थिसंचयनके स्थानपर होता है। इसके बाद पाँचवें, सातवें, आठवें, नवें, दसवें और ग्यारहवें दिन श्राद्ध होता है। इसलिये इन्हें नवश्राद्ध कहा जाता है। ये नवश्राद्ध तृतीया षोडशी कहे जाते हैं। इनको एकोद्दिष्ट विधानके अनुसार ही करना चाहिये। पहले, तीसरे, पाँचवें, सातवें, नवें और ग्यारहवें दिन होनेवाले श्राद्धोंको नवश्राद्ध कहा जाता है। दिनकी संख्या छः ही है पर छः दिनमें ही नवश्राद्ध हो जाते हैं। इस विषयमें ऋषियोंके बीच मतभेद हैं, इसी कारण मैंने उनको भी तुम्हें बता दिया।

श्राद्धोंका जो योग रूढिगत रूपसे है, वही मुझे भी अभीष्ट है। किसीको नव शब्दका यौगिक अर्थ अभीष्ट है। आद्य और द्वितीय श्राद्धमें एक ही पवित्रक देना चाहिये। जब ब्राह्मण भोजन कर चुके हों तो उसके बाद प्रेतको पिण्डदान देना उचित होता है<sup></sup>। वहाँपर यजमान और ब्राह्मणके बीच प्रश्नोत्तर भी होना चाहिये। जिसमें यजमान ब्राह्मणसे यह प्रश्न करे कि आप मेरी सेवासे प्रसन्न हैं? उसका उत्तर ब्राह्मण दे कि हाँ हम आपपर प्रसन्न हैं। आपके उस मृत स्वजनको अक्षय लोककी प्राप्ति हो।

हे पक्षिराज! अब तुम मुझसे एकोद्दिष्ट श्राद्धके विषयमें भी सुनो, जिसको वर्षपर्यन्त करना चाहिये।

सपिण्डीकरणके बादमें किये जानेवाले षोडश श्राद्धोंका सम्पादन एकोद्दिष्ट विधानके अनुसार ही होना चाहिये, किंतु पार्वण-श्राद्धमें उक्त नियमका प्रयोग नहीं होता है। जिस प्रकारसे प्रत्येक वर्षमें होनेवाला प्रत्यब्द श्राद्ध<sup></sup> होता है, उसी प्रकार उन षोडश श्राद्धोंको भी करना चाहिये। एकादशाह और द्वादशाहमें जो श्राद्ध किया जाता है उन दिनोंमें स्वयं प्रेत भी भोजन करता है। अतः स्त्री और पुरुषके लिये जो पिण्डदान इन दिनोंमें दिया जाय उसको अमुक प्रेतके निमित्त दिया जा रहा है, ऐसा कहकर पिण्डदान देना चाहिये। सपिण्डीकरण श्राद्ध होनेके पश्चात् प्रेत शब्दका प्रयोग नहीं होता है। एक वर्षतक घरके बाहर प्रतिदिन दीपक जलाना चाहिये। अन्न, दीप, जल, वस्त्र और अन्य जो कुछ भी वस्तुएँ दानमें दी जाती हैं, वे सभी सपिण्डीकरणतक प्रेत शब्दके सम्बोधनसे संकल्पित होनेपर ही प्रेतको तृप्ति प्रदान करती हैं।

हे वैनतेय! संक्षिप्त रूपमें मैंने वार्षिक कृत्य कह दिया। अब तुम विवस्वान् पुत्र यमराजके घर जिस प्रकार जीवका गमन होता है, उसका वर्णन सुनो।

हे अरुणानुज! त्रयोदशाह अर्थात् तेरहवें दिन


१-यस्य संवत्सरादर्वाक् सपिण्डीकरणं भवेत्। मासिकञ्चोदकुम्भञ्च देयं तस्यापि वत्सरम्॥ (५।६४)
२-यह प्रायः सपाक्षिकश्राद्धकी विधि है।
३-वार्षिक तिथिपर होनेवाला श्राद्ध।

४७८संक्षिप्त गरुडपुराण[ धर्मकाण्ड—

श्राद्धकृत्य एवं गरुडपुराणके श्रवणके अनन्तर वह जीव, तुम्हारे द्वारा पकड़े गये सर्पके समान यमदूतोंके द्वारा पकड़ लिया जाता है और पकड़े गये बन्दरके समान अकेला ही उस यमलोकके मार्गमें चलता जाता है। उसके बाद वायुके द्वारा अग्रसारित वह जीव दूसरे शरीरमें प्रविष्ट होता है, दूसरे शरीरमें जानेके पूर्वका जो शरीर है वह पिण्डज (दिये गये पिण्डोंसे निर्मित) है। दूसरी योनियोंका शरीर तो पितृसम्भव (माता-पिताके रज-वीर्यसे उत्पन्न होनेवाला) होता है। इन शरीरोंके प्रमाण, वय, अवस्था एवं संस्थान (आकृतिविशेष) आदि श्राद्ध करनेवालेकी श्रद्धा एवं देह प्राप्त करनेवालेके कर्मानुसार होते हैं। प्रमाणतः यम और मर्त्यलोकके बीच छियासी हजार योजनका अन्तराल है। वह जीव प्रतिदिन अधिक-से-अधिक दो सौ सैंतालीस योजन और आधा कोसका मार्ग तय करता है। इस प्रकार उस जीवकी यात्रा तीन सौ अड़तालीस दिनोंमें पूरी होती है। इस यमलोककी यात्रामें जीवको यमदूत खींचते हुए ले जाते हैं। जो प्राणी अपने जीवनभर पापमें अनुरक्त थे, उनको इस मार्गमें जो कष्ट भोगना पड़ता है, उसको विस्तारपूर्वक सुनो—

मृत्युके तेरहवें दिन वह पापी यमदूतोंके कठोर पाशोंमें बाँध लिया जाता है। हाथमें अंकुश लिये हुए क्रोधावेशमें तनी हुई भौंहोंसे युक्त दण्डप्रहार करते हुए यमदूत उसको खींचते हुए दक्षिण दिशामें स्थित अपने लोकको ले जाते हैं। यह मार्ग कुश, काँटों, बाँबियों, कीलों और कठोर पत्थरोंसे परिव्याप्त रहता है। कहीं-कहीं उस मार्गमें अग्नि जलती रहती है और कहीं-कहीं सैकड़ों दरारोंसे दुर्गम भूमि होती है। प्रचंड सूर्यकी गर्मी और मच्छरोंसे परिव्याप्त उस मार्गमें प्राणी सियारोंके समान वीभत्स चीत्कार करते हुए यमदूतोंके द्वारा खींचे जाते हैं। यमलोकके दारुण मार्गमें पापी जाता है और शरीरके जलनेके कारण अत्यन्त क्षीणताको प्राप्त होता है। अपने कर्मानुसार विभिन्न जंतुओंके द्वारा अङ्गोंके खाये जाने, भेदन एवं छेदन किये जानेके कारण जीव अत्यधिक दारुण दुःख प्राप्त करता है।

हे तार्क्ष्य! जीव अपने कर्मानुसार दूसरे शरीरको प्राप्त करके यमलोकमें नाना प्रकारका कष्ट भोगता है। यमलोकके इस मार्गमें सोलह पुर पड़ते हैं। उनके विषयमें भी सुनो—याम्य, सौरिपुर, नगेन्द्रभवन, गन्धर्वपुर, शैलागम, क्रौंच, क्रूरपुर, विचित्रभवन, बह्वापद, दुःखद, नानाक्रन्दपुर, सुतप्तभवन, रौद्र, पयोवर्षण, शीताढ्य और बहुभीति—ये सोलह पुर हैं, भयंकर होनेसे ये दुर्दर्शन हैं। याम्यपुरके मार्गमें प्रविष्ट होकर जीव 'हे पुत्र! हे पुत्र! मेरी रक्षा करो' ऐसा करुणक्रन्दन करता हुआ अपने द्वारा किये गये पापोंका स्मरण करता है और अठारहवें दिन वह यमराजके उस नगरमें पहुँच जाता है। वहाँ पुष्पभद्रा नामक नदी प्रवाहित होती है। वहाँ देखनेमें अत्यन्त सुन्दर वटवृक्ष है जहाँपर जीव विश्राम करना चाहता है, किंतु यमदूत उसको वहाँ विश्राम

प्रेतकल्प ]
आशौचमें विहित कृत्य, आशौचकी अवधि तथा दशगात्रविधि
४७९


नहीं करने देते। उसके पुत्रोंके द्वारा स्नेहपूर्वक अथवा अन्य किसीके द्वारा कृपापूर्वक पृथ्वीपर जो मासिक पिण्डदान दिया जाता है, उसीको वह वहाँपर खाता है।

तदनन्तर वहाँसे उसकी यात्रा सौरिपुरके लिये होती है। चलता हुआ वह मार्गमें यमदूतोंके द्वारा मुद्गरोंसे पीटा जाता है। उस दुःखसे अत्यधिक पीड़ित होकर वह इस प्रकार विलाप करता है—

जलाशयो नैव कृतो मया तदा
मनुष्यतृप्त्यै पशुपक्षितृप्तये।
गोतृप्तिहेतोर्न च गोचरः कृतः
शरीर हे निस्तर यत् त्वया कृतम्॥
(५।१००)

उस जन्ममें मनुष्य और पशु-पक्षियोंकी संतुष्टिके लिये मैंने जलाशय नहीं खुदवाया। गौओंकी क्षुधा-शान्तिके लिये गोचरभूमिका दान भी मैंने नहीं दिया। अतः हे शरीर! जैसा तुमने किया है, उसीके अनुसार अब तुम अपना निस्तार करो।

उस सौरिपुरमें कामरूपधारी इच्छानुसार स्थितिशील एवं गतिशील राजा राज्य करता है। उसका दर्शनमात्र करनेसे जीव भयसे काँप उठता है और अपने अनिष्टकी शंकासे ग्रस्त होकर त्रिपक्षमें पुत्रादिक स्वजनोंके द्वारा पृथ्वीपर दिये गये जलयुक्त पिण्डको खाकर आगे बढ़ता है। वहाँसे वह आगे बढ़ता हुआ मार्गमें यमदूतोंके खड्गप्रहारसे अत्यन्त पीड़ित होकर इस प्रकार प्रलाप करता है—

न नित्यदानं न गवाह्निकं कृतं
पुस्तं च दत्तं न हि वेदशास्त्रयोः।
पुराणदृष्टो न हि सेवितोऽध्वा
शरीर हे निस्तर यत् त्वया कृतम्॥
(५।१०३)

हे शरीर! मैंने जलादिका सदा दान नहीं दिया है, न तो नियमसे प्रतिदिन गायके लिये अपेक्षित गोग्रास आदि कृत्य किया है और न तो वेदशास्त्रकी पुस्तकका ही दान किया है। पुराणमें देखे हुए मार्ग (तीर्थयात्रा आदि)-का मैंने सेवन नहीं किया है, इसलिये जैसा तुमने किया है, उसीमें अपना निस्तार करो।

इसके बाद जीव 'नगेन्द्रनगर'में जाता है। वहाँपर वह अपने बन्धु-बान्धवोंके द्वारा दूसरे महीनेमें दिये गये अन्नको खाकर आगेकी ओर प्रस्थान करता है। चलते हुए उसके ऊपर यमदूतोंद्वारा कृपाणकी मुठियोंसे प्रहार किये जानेपर वह इस प्रकार प्रलाप करता है—

पराधीनमभूत् सर्वं मम मूर्खशिरोमणेः॥
महता पुण्ययोगेन मानुष्यं लब्धवानहम्।
(५।१०५-१०६)

बहुत बड़े पुण्योंको करनेके पश्चात् मुझे मनुष्य-योनि प्राप्त हुई थी, किंतु मुझ मूर्खाधिराजका सब कुछ पराधीन हो गया अर्थात् मनुष्ययोनि प्राप्त करके भी मैं कुछ सत्कर्म न कर सका।

इस प्रकार विलाप करता हुआ जीव तीसरे मासके पूरा होते ही गन्धर्वनगरमें पहुँच जाता है। तदनन्तर समर्पित किये गये तृतीय मासिक पिण्डको वहाँ खाकर वह पुनः आगेकी ओर चल देता है। मार्गमें यमदूत उसको कृपाणके अग्रभागसे मारते हैं, जिससे आहत होकर वह पुनः इस प्रकार विलाप करता है—

मया न दत्तं न हुतं हुताशने
तपो न तप्तं हिमशैलगाह्वरे।
न सेवितं गाङ्गमहो महाजलं
शरीर हे निस्तर यत् त्वया कृतम्॥
(५।१०८)

मैंने कोई दान नहीं दिया, अग्निमें आहुति नहीं डाली और न तो हिमालयकी गुफामें जाकर तप

४८०संक्षिप्त गरुडपुराण[ धर्मकाण्ड-

[बायाँ स्तम्भ]

ही किया है। अरे! मैं तो इतना नीच हूँ कि गङ्गाके परम पवित्र जलका भी सेवन नहीं किया, इसलिये हे शरीर! जैसा तुमने कर्म किया है, उसीके अनुसार अपना निस्तार करो।

हे पक्षिन्! चौथे मासमें जीव शैलागमपुर पहुँच जाता है। वहाँ उसके ऊपर निरन्तर पत्थरोंकी वर्षा होती है। पुत्रके द्वारा दिये गये चतुर्थ मासिक श्राद्धको प्राप्तकर वह जीव सरकते हुए चलता है किंतु पत्थरोंके प्रहारसे अत्यन्त पीड़ित होकर वह गिर पड़ता है और रोते हुए यह कहता है—

न ज्ञानमार्गो न च योगमार्गो
न कर्ममार्गो न च भक्तिमार्गः।
न साधुसङ्गात् किमपि श्रुतं मया
शरीर हे निस्तर यत् त्वया कृतम्॥
(५।१११)

मैंने न तो ज्ञानमार्गका सेवन किया न योगमार्गका, न कर्ममार्ग और न ही भक्तिमार्गको अपनाया और न साधु-सन्तोंका साथ करके उनसे कुछ हितैषी बातें ही सुनी हैं। अतः हे शरीर! तब जैसा तुमने किया है, उसीके अनुसार अपना निस्तार करो।

मृत्युके पाँचवें मासमें कुछ कम दिनोंमें वह 'क्रौंचपुर' पहुँच जाता है, उस समय पुत्रादिके द्वारा दिये गये ऊनषाण्मासिक श्राद्धके पिण्ड और जलका सेवन करके वहाँ एक घड़ी विश्राम करता है।

हे कश्यपपुत्र! इसके बाद छठे मासमें जीव 'क्रूरपुर'की ओर चल देता है। मार्गमें वह पृथ्वीपर दिये गये पञ्चम मासिक पिण्डको खाकर जलपान करता है। तत्पश्चात् वह क्रूरपुरकी ओर फिर बढ़ता है, किंतु यमदूत मार्गमें उसको पट्टिशों (अस्त्रविशेष)-द्वारा मारते हैं, जिससे वह गिर पड़ता है और इस प्रकार विलाप करता है—

हा मातर्हा पितर्भ्रातः
सुता हा हा मम स्त्रियः॥


[दायाँ स्तम्भ]

युष्माभिर्नोपदिष्टोऽह-
मवस्थां प्राप्त ईदृशीम्।
(५।११३-११४)

हे मेरे माता-पिता और भाई-बन्धु! हे मेरे पुत्र! हे मेरी स्त्रियो! आप लोगोंने मुझे कोई ऐसा उपदेश नहीं दिया, जिससे मैं उन दुष्कृत्योंसे बच सकता, जिनके कारण मेरी इस प्रकारकी अवस्था हो गयी।

इस प्रकारका विलाप करते हुए उस जीवसे यमदूत कहते हैं—अरे मूर्ख! तेरी कहाँ माता है, कहाँ पिता है, कहाँ स्त्री है, कहाँ पुत्र है और कहाँ मित्र है? तू अकेला ही चलते हुए इस मार्गमें अपने द्वारा किये गये दुष्कृत्योंके फलका उपभोग कर। हे मूर्ख! तू जान ले इस मार्गमें चलनेवाले लोगोंको दूसरेकी शक्तिका आश्रय करना व्यर्थ है। परलोकमें जानेके लिये पराये आश्रयकी आवश्यकता नहीं होती है। वहाँ (स्वकर्मार्जित) पुण्य ही साथ देता है। तुम्हारा तो उसी मार्गसे गमन निश्चित है, जिस मार्गमें किसी क्रय-विक्रयके द्वारा भी अपेक्षित सुख-साधनका संग्रह नहीं किया जा सकता।

इसके बाद वह जीव 'विचित्रनगर'के लिये चल देता है। रास्तेमें यमदूत उसको शूलके प्रहारसे आहत कर देते हैं, जिसके कारण वह दुखित होकर इस प्रकारका विलाप करता है—

कुत्र यामि न हि गामि जीवितं हा मृतस्य मरणं पुनर्न वै।
(५।११९)

हाय! मैं कहाँ चल रहा हूँ, मैं तो निश्चित ही अब जीवित नहीं रहना चाहता, फिर भी जीवित हूँ। मरे हुए प्राणीकी मृत्यु पुनः नहीं होती।

इस प्रकारका विलाप करता हुआ वह जीव यातना-शरीरको धारण करके 'विचित्रनगर'में जाता है। जहाँपर विचित्र नामका राजा राज्य करता है। वहाँपर वह षाण्मासिक पिण्डसे अपनी क्षुधाको

प्रेतकल्प ] आशौचमें विहित कृत्य, आशौचकी अवधि तथा दशगात्रविधि ४८१


शान्त कर आगे आनेवाले नगरकी ओर चल देता है। मार्गमें यमदूत भालेसे प्रहार करते हैं, जिससे संत्रस्त होकर वह इस प्रकार विलाप करता है—

माता भ्राता पिता पुत्रः कोऽपि मे वर्तते न वा।
यो मामुद्धरते पापं पतन्तं दुःखसागरे॥

<p align="right">(५। १२२)</p>

मेरे माता-पिता, भाई, पुत्र कोई है अथवा नहीं है, जो इस दुःखके सागरमें गिरे हुए मुझ पापीका उद्धार कर सके।

ऐसा विलाप करता हुआ वह जीव मार्गमें चलता रहता है। उसी मार्गमें ‘वैतरणी’ नामकी एक नदी पड़ती है, जो सौ योजन चौड़ी है और रक्त तथा पीबसे भरी हुई है। जैसे ही मृतक उस नदीके तटपर पहुँचता है, वैसे ही वहाँपर नाववाले—मल्लाह आदि उसको देखकर यह कहते हैं कि यदि तुमने वैतरणी गौका दान दिया है तो इस नावपर सवार हो जाओ और सुखपूर्वक इस नदीको पार कर लो। जिसने वैतरणी नामक गौका दान दिया है, वही सुखपूर्वक इस नदीको पार कर सकता है। जिस व्यक्तिने वैतरणी गौका दान नहीं दिया है, उसको नाविक हाथ पकड़कर घसीटते हुए ले जाते हैं। तेज और नुकीली चोंचसे कौआ, बगुला तथा उलूक नामक पक्षी अपने प्रहारसे उसे अत्यन्त व्यथित करते हैं। हे पक्षिन्! अन्त समय आनेपर मनुष्योंके लिये वैतरणीका दान ही हितकारी है। यदि प्राणी अपने जीवनकालमें वैतरणी नामक गौका दान देता है तो वह गौ समस्त पापोंको विनष्ट कर देती है और उसको यमलोक न ले जाकर विष्णुलोकको पहुँचा देती है*।

सातवाँ मास आ जानेपर मृतक ‘बहापद’ नामक पुरमें आ जाता है। वहाँपर सप्तमासिक सोदक पिण्डका सेवन करके आगे बढ़ते हुए परिघके आघातसे पीड़ित होकर वह इस प्रकार विलाप करता है—

न दत्तं न हुतं तप्तं न स्नातं न कृतं हितम्।
यादृशं चरितं कर्म मूढात्मन् भुंक्ष्व तादृशम्॥

<p align="right">(५। १२९)</p>

हे शरीर! मैंने दान, आहुति, तप, तीर्थस्नान तथा परोपकार आदि सत्कृत्य जीवनपर्यन्त नहीं किया है। हे मूर्ख! अब जैसा तुमने कर्म किया है, वैसा ही भोग करो।

हे तार्क्ष्य! इसके बाद वह जीव आठवें मासमें ‘दुःखदपुर’ पहुँचता है। वहाँ स्वजनोंके द्वारा दिये गये अष्टमासिक पिण्ड और जलका सेवन करके ‘नानाक्रन्द’ नामक पुरकी ओर प्रस्थान कर देता है। मार्गमें चलते हुए मुसलाघातसे पीड़ित होकर वह इस प्रकार विलाप करता है—

क्व जायाचटुलैश्चाटुपटुभिर्वचनैर्मम॥
भोजनं भल्लभाल्लीभिर्मुसलैश्च क्व मारणम्।

<p align="right">(५। १३१-१३२)</p>

हाय! कहाँ चंचल नेत्रोंवाली पत्नीके चापलूसी भरे वचनोंके द्वारा किये गये मनोविनोदोंके बीच मेरा भोजन होता था और कहाँ भाला-बछियों तथा मुसलोंके द्वारा मुझे मारा जा रहा है!

इस प्रकार विलाप करता हुआ वह जीव नवें मासमें ‘नानाक्रन्दपुर’ पहुँच जाता है। तदनन्तर नवें मासमें पुत्रद्वारा दिये गये पिण्डका भोजन करके वह नाना प्रकारका विलाप करता है। तत्पश्चात् यमदूत दसवें मासमें उसको ‘सुतप्तभवन’ ले जाते हैं। मार्गमें वे उसको हलसे मारते-पीटते हैं, जिससे आहत होकर वह इस प्रकार विलाप करता है—

क्व सूनुपेशलकरैः पादसंवाहनं मम॥
क्व दूतवज्रप्रतिमकरैर्मत्यदकर्षणम्।

<p align="right">(५। १३४-१३५)</p>

हाय! कहाँ पुत्रोंके कोमल-कोमल हाथोंसे मेरे


* मनुजानां हितं दानमन्ते वैतरणी खग। दत्ता पापं दहेत् सर्वं मम लोकं तु सा नयेत्॥ (५। १२६-१२७)

२२२- संतसक ब्राह्मण तथा पाँच प्रेतोंकी कथा, सत्संगति तथा भगवत्कृपासे पाँच प्रेतों तथा ब्राह्मणका उद्धार ..

४८२संक्षिप्त गरुडपुराण[ धर्मकाण्ड—

पैर दाबे जाते थे और कहाँ आज इन यमदूतोंके वज्रसदृश कठोर हाथोंसे पैर पकड़कर मुझे निर्दयतापूर्वक घसीटा जा रहा है!

दसवें मासमें वहींपर पिण्ड और जलका उपभोग करके वह (जीव) पुनः आगेकी ओर सरकने लगता है। ग्यारहवाँ मास पूर्ण होते ही वह ‘रौद्रपुर’ पहुँच जाता है। मार्गमें यमदूत जैसे ही उसकी पीठपर प्रहार करते हैं, वह चिल्लाते हुए इस प्रकार विलाप करता है—

क्वाहं सतूलीशयने परिवर्तनं क्षणे क्षणे।
भटहस्तभ्रष्टयष्टिकृष्टपृष्ठः क्व वा पुनः॥

<div style="text-align: right;">(५।१३७)</div>

कहाँ मैं रूईसे बने हुए अत्यन्त कोमल गद्देपर लेटकर प्रतिक्षण करवटें बदलता था और कहाँ आज यमदूतोंके हाथोंसे निर्दयतापूर्वक मारी जा रही लाठियोंके प्रहारसे कटी पीठसे करवट बदल रहा हूँ!

हे द्विज! इसके पश्चात् वह जीव पृथ्वीपर दिये गये जलसहित पिण्डको खाकर ‘पयोवर्षण’ नामक नगरकी ओर प्रस्थान करता है। रास्तेमें यमदूत कुल्हाड़ीसे उसके सिरपर प्रहार करते हैं। हताहत होकर वह इस प्रकारका विलाप करता है—

क्व भृत्यकोमलकरैर्गन्धतैलावसेचनम्॥
क्व कीनाशनुगैः क्रोधात्कुठारैः शिरसि व्यथा।

<div style="text-align: right;">(५।१३९-१४०)</div>

हाय! कहाँ भृत्योंके कोमल-कोमल हाथोंसे मेरे सिरपर सुवासित तेलकी मालिश होती थी और कहाँ आज क्रोधसे परिपूर्ण यमदूतोंके हाथोंसे मेरे इस सिरपर कुल्हाड़ियोंका प्रहार हो रहा है!

इस पयोवर्षण नामक नगरमें वह मृतक ऊनाब्दिक श्राद्धका दुःखपूर्वक उपभोग करता है। तदनन्तर वर्ष बीतते ही वह ‘शीताढ्य’ नगरकी ओर चल देता है। मार्गमें बढ़ते हुए उस मृतककी जिह्वाको यमदूत छूरीसे काट डालते हैं, जिससे दुःखित होकर वह इस प्रकार विलाप करता है—

प्रियालापैः क्व च रसमाधुर्यस्य वर्णनम्।
उक्तमात्रेऽसिपत्रादिजिह्वाच्छेदः क्व चैव हि॥

<div style="text-align: right;">(५।१४२)</div>

अरे! कहाँ परस्पर प्रिय वार्तालापोंके द्वारा इस जिह्वाके रसमाधुर्यकी प्रशंसा की जाती थी, कहाँ आज मुँह खोलनेमात्रपर ही तलवारके समान तीक्ष्ण छूरी आदिके द्वारा मेरी उसी जिह्वाको काट दिया जा रहा है!

तदनन्तर उसी नगरमें वह मृतक वार्षिक पिण्डोदक तथा श्राद्धमें दिये गये अन्य पदार्थोंका सेवन कर आगेकी ओर बढ़ता है। पिण्डज शरीरमें प्रविष्ट होकर वह ‘बहुभीति’ नामक नगरमें जाता है। वह मार्गमें अपने पापका प्रकाशन और स्वयंकी निन्दा करता है। यमपुरीके इस मार्गमें स्त्री भी इसी-इसी प्रकारका विलाप करती है।

इसके बाद वह मृतक अत्यन्त निकट ही स्थित यमपुरीमें जाता है। वह याम्यलोक चौवालीस योजनमें विस्तृत है। उसमें श्रवण नामक तेरह प्रतीहार हैं। उन प्रतीहारोंको श्रवणकर्म करनेसे प्रसन्नता होती है। अन्यथा वे क्रुद्ध होते हैं। ऐसे लोकमें पहुँचनेके पश्चात् प्राणी मृत्युकाल तथा अन्तक आदिके मध्यमें

प्रेतकल्प ] वृषोत्सर्गकी महिमामें राजा वीरवाहनकी कथा ४८३


स्थित क्रोधसे लाल-लाल नेत्रोंवाले काले पहाड़के समान भयंकर आकृतिसे युक्त यमराजको देखता है। विशाल दाँतोंसे उनका मुखमण्डल बड़ा ही भयानक लगता है। उनकी भ्रू-भंगिमाएँ तनी रहती हैं, जिससे उनकी आकृति भयानक प्रतीत होती है। अत्यन्त विकृत मुखाकृतियोंसे युक्त सैकड़ों व्याधियाँ उनको चारों ओरसे घेरे रहती हैं। उनके एक हाथमें दण्ड और दूसरे हाथमें भैरव-पाश रहता है।

यमलोकमें पहुँचा हुआ जीव यमके द्वारा बतायी गयी शुभाशुभ गतिको प्राप्त करता है। जैसा मैंने तुमसे पहले कहा है, उसी प्रकारकी पापात्मक गति पापी जीवको प्राप्त होती है। जो लोग छत्र, पादुका और घरका दान देते हैं, जो लोग पुण्यकर्म करते हैं, वे वहाँपर पहुँचकर सौम्य स्वरूपवाले, कानोंमें कुण्डल और सिरपर मुकुट धारण किये हुए शोभासम्पन्न यमराजका दर्शन करते हैं।

चूँकि वहाँ जीवको बहुत भूख लगती है, इसलिये एकादशाह, द्वादशाह, षण्मास तथा वार्षिक तिथिपर बहुत-से ब्राह्मणोंको भोजन कराना चाहिये। हे खगश्रेष्ठ ! जो व्यक्ति पुत्र, स्त्री तथा अन्य सगे-सम्बन्धियोंके द्वारा कहे गये उनके स्वार्थको ही जीवनपर्यन्त सिद्ध करता है और अपने परलोकको बनानेके लिये पुण्यकर्म नहीं करता, वही अन्तमें कष्ट प्राप्त करता है।

हे गरुड ! मृत्युके पश्चात् संयमनीपुरको जानेवाले प्राणीकी जो गति होती है और वर्षपर्यन्त जो कृत्य किये जाते हैं, उसको मैंने कहा। अब और क्या सुनना चाहते हो ? (अध्याय ५)

वृषोत्सर्गकी महिमामें राजा वीरवाहनकी कथा, देवर्षि नारदके पूर्वजन्मके इतिहासवर्णनमें सत्संगति और भगवद्भक्तिका माहात्म्य, वृषोत्सर्गके प्रभावसे राजा वीरवाहनको पुण्यलोककी प्राप्ति

गरुडने कहा— हे प्रभो! जो तीर्थ-सेवन और दानमें निरन्तर लगा है तथा अन्य साधनोंसे भी सम्पन्न है, उसे भी वृषोत्सर्ग किये बिना परलोकमें सद्गति नहीं प्राप्त होती। इसलिये मनुष्यको वृषोत्सर्ग अवश्य करना चाहिये। ऐसा मैंने आपसे सुन लिया। इस वृषोत्सर्गका फल क्या है? प्राचीन समयमें इस यज्ञको किसने किया? इसमें किस प्रकारका वृष होना चाहिये? विशेष रूपसे इस कार्यको किस समय करना चाहिये और इसको करनेकी कौन-सी विधि बतायी गयी है? यह सब बतानेकी कृपा करें।

श्रीकृष्णने कहा— हे खगेश्वर! मैं उस महापुण्यशाली इतिहासका वर्णन कर रहा हूँ, जिसका वर्णन ब्रह्माके पुत्र महर्षि वसिष्ठने राजा वीरवाहनसे किया था।

प्राचीन समयकी बात है, विराधनगरमें वीरवाहन नामक एक धर्मात्मा, सत्यवादी, दानशील और विप्रोंको संतुष्ट करनेवाले राजा रहते थे। किसी समय वे शिकार खेलनेके लिये वनमें गये। कुछ पूछनेकी जिज्ञासासे वे वसिष्ठमुनिके आश्रममें जा पहुँचे। वहाँ आसन ग्रहण कर विनम्रतासे झुके हुए राजाने ऋषियोंकी संसदमें मुनिको नमस्कार करके पूछा।

राजाने कहा— हे मुने! मैंने यथाशक्ति प्रयत्नपूर्वक अनेक धार्मिक कृत्य किये हैं, फिर भी यमराजके कठोर शासनको सुनकर मैं हृदयमें बहुत ही भयभीत

४८४संक्षिप्त गरुडपुराण[ धर्मकाण्ड—

हूँ। हे कृपानिधान! महाभाग! ऋषिवर! मुझे यम, यमदूत और देखनेमें अतिशय भयंकर लगनेवाले नरकलोकोंको न देखना पड़े, ऐसा कोई उपाय बतानेकी कृपा करें।

वसिष्ठने कहा— हे राजन्! शास्त्रवेत्ता अनेक प्रकारके धर्मोंका वर्णन करते हैं, किंतु कर्ममार्गसे विमोहित जन सूक्ष्मतया उनको नहीं जानते। दान, तीर्थ, तपस्या, यज्ञ, संन्यास तथा पितृक्रिया आदि सभी धर्म हैं, उन धर्मोंमें भी वृषोत्सर्गका विशेष महत्त्व है। मनुष्यको बहुत-से पुत्रोंकी अभिलाषा करनी चाहिये। यदि उनमेंसे एक भी पुत्र गया-तीर्थमें जाय, अश्वमेधयज्ञ करे अथवा नील वृषभ यथाविधि छोड़े तो जाने-अनजाने किये गये ब्रह्महत्या आदि पाप भी विनष्ट हो जाते हैं। यह शुद्धि नील वर्णके वृषभका उत्सर्ग अथवा समुद्रमें स्नान करनेसे भी हो सकती है। हे राजेन्द्र! जिसके एकादशाहमें वृषोत्सर्ग नहीं होता, उसका प्रेतत्व स्थिर ही रहता है। मात्र श्राद्ध करनेसे क्या लाभ होगा ? जिस-किसी भाँति नगर अथवा तीर्थमें वृषोत्सर्ग अवश्य करना चाहिये।

हे खगेश! वृष-यज्ञके द्वारा प्रेतत्वसे मुक्ति प्राप्त होती है, अन्य साधनोंसे नहीं। जो वृषभ शुभ लक्षणोंसे समन्वित युवा तथा कृष्ण गल-कम्बलवाला हो और सदैव जो गायोंके झुंडमें घूमनेवाला हो, उस वृषभको विधि-विधानसे चार अथवा दो या एक बछियाके साथ पहले उसका विवाह करना चाहिये। तदनन्तर माङ्गलिक द्रव्यों एवं मन्त्रोंके साथ उन सबका उत्सर्ग किया जाय। 'इहरतीति०* इन छः मन्त्रोंसे अग्निदेवको आहुति देनी चाहिये। कार्तिक, माघ और वैशाखकी पूर्णिमा, संक्रान्ति, अन्य पुण्यकाल, व्यतिपात तथा तीर्थमें और पिताकी क्षयतिथि वृषोत्सर्गके लिये विशेष रूपसे प्रशस्त मानी जाती है। 'जो वृषभ लाल वर्णका हो और उसका मुँह-पूँछ पाण्डु (श्वेत-पीतमिश्रित) हो, खुर और सींगोंका वर्ण पीत हो, वह नीलवृषभ कहा जाता है'—

लोहितो यस्तु वर्णेन मुखे पुच्छे च पाण्डुरः॥
पीतः खुरविषाणेषु स नीलो वृष उच्यते।

<p align="right">(६। १९-२०)</p>

जो वृषभ श्वेत वर्णका होता है वह ब्राह्मण है, जो लोहित वर्णका है वह क्षत्रिय है, जो पीत वर्णका है वह वैश्य है और जो कृष्ण वर्णका है वह शूद्र है। अतः ब्राह्मण, क्षत्रिय एवं वैश्य वर्णको अपने वर्णके अनुसार वृषोत्सर्ग करना चाहिये अथवा रक्तवर्णका ही वृषभ सबके लिये कल्याणप्रद है।

पिता, पितामह तथा प्रपितामह पुत्रके उत्पन्न होनेपर यही आशा करते हैं कि यह मेरे लिये वृषोत्सर्ग करेगा। वृषोत्सर्गके समय इस प्रकार प्रार्थना करनी चाहिये—

धर्मस्त्वं वृषरूपेण जगदानन्ददायकः॥
अष्टमूर्तेरधिष्ठानमतः शान्तिं प्रयच्छ मे।
गङ्गायमुनयोः पेयमन्तर्वेदि तृणं चर॥
धर्मराजस्य पुरतो वाच्यं मे सुकृतं वृष।

<p align="right">(६। २३—२५)</p>

हे धर्म! आप इस वृषभरूपमें संसारको आनन्द प्रदान करनेवाले देव हैं। आप ही अष्टमूर्ति शिवके अधिष्ठान हैं। अतः मुझे शान्ति प्रदान करें। आप गङ्गा-यमुनाका जल पियें। अन्तर्वेदीमें घास चरें और हे वृष! धर्मराजके सामने मेरे पुण्यकर्मकी चर्चा करें।

इस प्रकारका निवेदन करते हुए संस्कार्ताको चाहिये कि वृषभके दाहिने कन्धेपर त्रिशूल और


* ॐ इह रतिः स्वाहा इदमग्नये। ॐ इह रमध्वं स्वाहा इदमग्नये। ॐ इह धृतिः स्वाहा इदमग्नये। ॐ इह स्वधृतिः स्वाहा इदमग्नये। ॐ उपसृजन् धरुणं मात्रे धरुणो मातरं धयन् स्वाहा इदमग्नये। ॐ रायस्पोषमस्मासु दीधरत् स्वाहा इदमग्नये। (यजु० ८। ५१)

प्रेतकल्प ] वृषोत्सर्गकी महिमामें राजा वीरवाहनकी कथा ४८५


बायें ऊरुभागमें चक्रका चिह्न अंकित करके गन्ध, पुष्प तथा अक्षत आदिसे बछियाके सहित उस वृषभकी पूजा करके विधिवत् बन्धनमुक्त कर दे।

वसिष्ठजीने कहा—हे राजन्! आप भी विधिवत् वृषोत्सर्ग करें, अन्यथा सभी साधनोंसे सम्पन्न होनेपर भी आपको सद्गति नहीं प्राप्त हो सकती है। राजन्! पहले त्रेतायुगमें विदेहनगरमें धर्मवत्स नामका एक ब्राह्मण था, जो अपने वर्णानुसार कर्ममें अहर्निश निरत, विद्वान्, विष्णुभक्त, अत्यन्त तेजस्वी और यथालाभसे संतुष्ट रहता था। एक बार पितृपर्वके आनेपर वह कुश लेनेके लिये वनमें गया। वहाँ इधर-उधर घूमता हुआ वह कुश और पलाशके पत्तोंको एकत्र करने लगा। एकाएक वहाँपर देखनेमें अत्यन्त सुन्दर चार पुरुष आये और उस ब्राह्मणको पकड़कर आकाशमार्गसे लेकर चले गये। वे चारों पुरुष उस दीन, व्यथित ब्राह्मणको पकड़कर बहुत-से वृक्षोंवाले घनघोर वन, पर्वतोंके दुर्गोंको पार कराते हुए एक वनसे दूसरे वनके मध्य ले गये। हे राजन्! वहाँपर उस ब्राह्मणने एक बहुत बड़ा नगर देखा। वह नगर मुख्यद्वारसे समन्वित तथा अनेक प्रासादोंसे सुशोभित हो रहा था। चबूतरा, बाजार, खरीदी-बेची जानेवाली वस्तुओं और नर-नारीसे युक्त उस नगरमें तुरहियोंकी ध्वनि हो रही थी। वीणा और नगाड़े बज रहे थे। वहाँ कुछ भूखसे पीड़ित, दीन-हीन, पुरुषार्थसे रहित लोगोंको भी उसने देखा। उसके बाद अत्यन्त मैले-कुचैले, फटे-पुराने वस्त्रोंको पहने हुए लोग दिखायी पड़े। आगे हृष्ट-पुष्ट स्वर्णाभूषणसे अलंकृत सुन्दर-सुन्दर वस्त्र धारण किये हुए कुछ ऐसे लोग थे, जो देवताओंके समान शोभासम्पन्न थे; जिनको देखकर वह विस्मयाभिभूत हो उठा। वह सोचने लगा कि क्या मैं स्वप्न देख रहा हूँ? अथवा यह कोई माया है? या मेरे मनका यह विभ्रम है? वह ब्राह्मण इस प्रकारकी शंका कर ही रहा था कि वे चारों पुरुष उसको लेकर राजाके पास गये। स्वर्णजटित उस राजप्रासादके बीच स्थित राजाको वह ब्राह्मण एकटक देखता ही रह गया। वहाँपर एक महादिव्य सिंहासन था, जहाँ छत्र और चँवर डुलाये जा रहे थे। उसके ऊपर स्वर्णनिर्मित मुकुट धारण किया हुआ महान् शोभा-सम्पन्न राजा बैठा हुआ था। वन्दीजन उसका गुणगान कर रहे थे।

राजा उस ब्राह्मणको देखकर खड़ा हो गया और उसने मधुपर्क तथा आसनादि प्रदान कर उनकी विधिवत् पूजा की। तत्पश्चात् अत्यन्त प्रसन्नचित्त होकर वह राजा उन विप्रदेवसे इस प्रकार कहने लगा—हे प्रभो! आज आप-जैसे धर्मपरायण विष्णुभक्तका दर्शन हुआ है, इससे मेरा जन्म सफल हो गया। मेरा यह कुल भी पवित्र हो उठा। तदनन्तर राजाने उस ब्राह्मणको प्रणाम किया और बहुत प्रकारसे उनको संतुष्ट करके अपने दूतोंसे कहा—हे दूतो! ये ब्राह्मणदेव जहाँसे आये हुए हैं, पुनः तुम सब इन्हें वहीं ले जाकर पहुँचा आओ। ऐसा सुनकर उन ब्राह्मणश्रेष्ठने राजासे पूछा—

हे राजन्! यह कौन-सा देश है? यहाँपर ये उत्तम, मध्यम और अधम चरित्रवाले लोग कहाँसे आये हुए हैं? आप किस पुण्यके प्रभावसे यहाँ इन सबके बीच प्रधान पदपर विराजमान हैं? मुझको यहाँ किसलिये लाया गया और फिर क्यों वापस भेजा जा रहा है? यह सब स्वप्नके समान मुझे अनोखा दिखायी दे रहा है!

इसपर राजाने कहा—हे विप्रदेव! अपने धर्मका पालन करते हुए जो मनुष्य सदैव भगवान् हरिकी भक्तिमें अनुरक्त और इन्द्रियोंके विषयसे परे रहता है, वह मेरे लिये निश्चित ही पूज्य है। नित्य जो

४८६संक्षिप्त गरुडपुराण[ धर्मकाण्ड -

प्राणी तीर्थोंकी यात्रा करनेमें ही लगा रहता है, जो वृषोत्सर्गके माहात्म्यको भलीभाँति जानता है और जो सत्य एवं दान-धर्मका पालक है, वह व्यक्ति देवताओंके लिये भी प्रणम्य है। हे परंतप ! हे पूजार्ह ! आपका दर्शन हम सभी प्राप्त कर सकें, इसलिये आपको यहाँ लाया गया था। हे देव ! आप मुझपर प्रसन्न हों और मुझे इस साहसके लिये क्षमा करें। मैं स्वयं अपने सम्पूर्ण चरित्रका वर्णन करनेमें समर्थ नहीं हूँ। इस वृत्तान्तका वर्णन मेरा यह विपश्चित् नामवाला मन्त्री करेगा। राजाका वह मन्त्री सब वेदोंको जाननेवाला विद्वान् व्यक्ति था। अतः अपने स्वामीकी हार्दिक इच्छाको जानकर वह कहने लगा—

हे विप्र ! यह राजा पूर्वजन्ममें द्विज और देवताओंसे सुशोभित विराधनगरमें विश्वम्भर नामका एक वैश्य था। ऐसा मैंने सुना है। वैश्य-वृत्तिसे जीवनयापन करते हुए वह अपने परिवारका पालन करता था। नित्य गायोंकी सेवा तथा ब्राह्मणोंकी पूजा भी करता था। सत्पात्रको दान, अतिथिसेवा तथा अग्निहोत्र करना उसका नित्य धर्म था। सत्यमेधा नामकी पत्नीके साथ उसने विधिवत् गृहस्थाश्रमका संचालन किया। उसने स्मार्त कर्मके अनुष्ठानसे सभी लोकों तथा श्रौत कर्मोंसे देवताओंको जीत लिया था।

किसी समय जब वह वैश्य अपने भाइयोंके साथ बहुत-से तीर्थोंकी यात्रा कर अपने घर लौट रहा था, तब मार्गमें ही उसे लोमश ऋषिका दर्शन हो गया। उसने महर्षिके चरणोंमें दण्डवत् प्रणाम किया। हाथ जोड़कर विनयावनत खड़े उस वैश्यसे करुणाके सागर महर्षि लोमशने पूछा—

हे भद्रपुरुष ! ब्राह्मणों और अपने भाई-बन्धुओंके साथ आप कहाँसे आ रहे हैं? धर्मप्राण ! आपको देखकर मेरा मन आर्द्र हो उठा है।

इसपर विश्वम्भर वैश्यने उत्तर दिया— मुनिवर ! यह शरीर नश्वर है। मृत्यु प्राणीके सामने ही खड़ी रहती है—ऐसा जानकर अपनी धर्मपरायणा पत्नीके साथ मैं तीर्थयात्रामें गया था। तीर्थोंका विधिवत् दर्शन एवं प्रचुर धन-दान कर मैं अपने घरकी ओर वापस जा रहा था कि सौभाग्यवश आपका दर्शन हो गया।

लोमशने कहा—इस भारतवर्षकी पावन भूमिमें बहुत-से तीर्थ हैं। आपने जिन तीर्थोंकी यात्रा की है, उनका वर्णन मुझसे करें।

वैश्यने कहा—हे ऋषिवर ! जहाँ गङ्गा, यमुना और सरस्वती नामक पवित्रतम नदियाँ एक साथ मिलकर प्रवाहित होती हैं, जहाँ ब्रह्मा तथा देवराज इन्द्रने दशाश्वमेध-यज्ञ किया था उस तीर्थराज प्रयाग; जहाँ करुणानिधान देवदेवेश्वर शिव प्राणियोंके कानमें 'तारकमन्त्र' का उपदेश देते हैं उस मोक्षदायिनी काशी; पुलहाश्रम, फल्गुतीर्थ, गण्डकी, चक्रतीर्थ, नैमिषारण्य, शिवतीर्थ, अनन्तक, गोप्रतारक, नागेश्वर, विन्दुसरोवर, मोक्षदायक राजीवलोचन भगवान् रामसे सुशोभित अयोध्या; अग्नितीर्थ, वायुतीर्थ, कुबेरतीर्थ, कुमारतीर्थ, सूकरक्षेत्र, भगवान् कृष्णसे अलंकृत मथुरा; पुष्कर, सत्यतीर्थ, ज्वालातीर्थ, दिनेश्वरतीर्थ, इन्द्रतीर्थ, पश्चिमवाहिनी सरस्वती तथा कुरुक्षेत्र जाकर मैंने दर्शन किया। उसके बाद मैं ताप्ती, पयोष्णी, निर्विन्ध्या, मलय, कृष्णवेणी, गोदावरी, दण्डकवन, ताम्रचूड, सदोदक और द्यावाभूमीश्वर तीर्थको देखकर पर्वतराज श्रीशैल पहुँचा। तदनन्तर महातेजस्वी भगवान् हरि स्वयं जहाँ श्रीरङ्ग नामसे निवास करते हैं, जहाँ महिषासुरमर्दिनी दुर्गा वेंकटी नामसे पुकारी जाती हैं, उस वेंकटाचलकी यात्रा मेरे द्वारा की गयी। तत्पश्चात् चन्द्रतीर्थ, भद्रवट, कावेरी, कुटिलाचल, अवटोदा, ताम्रपर्णी, त्रिकूट, कोल्लकगिरि, वसिष्ठतीर्थ,

२२३- और्ध्वदेहिक क्रियाके अधिकारी तथा जीवित-श्राद्धकी संक्षिप्त विधि

प्रेतकल्प ] वृषोत्सर्गकी महिमामें राजा वीरवाहनकी कथा ४८७


ब्रह्मतीर्थ, ज्ञानतीर्थ, महोदधि, हृषीकेश, विराज, विशाल और नीलाद्रि (जगन्नाथपुरी), भीमकूट, श्वेतगिरि, रुद्रतीर्थ तथा जहाँ तपस्या करके पार्वतीने भगवान् शिवका पतिरूपमें वरण किया था, उस उमावन तीर्थकी मैंने यात्रा की। साथ ही वरुणतीर्थ, सूर्यतीर्थ, हंसतीर्थ तथा महोदधि तीर्थकी यात्रा हुई, जहाँ स्नान करके काकोला (पहाड़ी कौआ) भी राजहंस बन जाता है, जहाँ स्नान मात्र करके एक राक्षसने देवत्व पद प्राप्त कर लिया था। उसके बाद विश्वरूप, वन्दितीर्थ, रत्नेश तथा कुहकाचल तीर्थ गया, जहाँ नरनारायणका दर्शन करके मनुष्य करोड़ों पापसे मुक्त हो जाता है। सरस्वती, दृषद्वती और नर्मदा नामक मनुष्योंके लिये कल्याणकारिणी नदियोंकी मैंने यात्रा की। भगवान् नीलकण्ठ, महाकाल, अमरकण्टक, चन्द्रभागा, वेत्रवती, वीरभद्र, गणेश्वर, गोकर्ण, बिल्वतीर्थ, कर्मकुण्ड और सतारक तीर्थोंमें जाकर आपकी कृपासे मैं अन्य तीर्थोंमें भी गया जहाँ मात्र स्नान करके मनुष्य कर्मबन्धनसे मुक्त हो जाता है।

हे मुने ! साधुजनोंकी जो कृपा है, वह प्राणियोंमें कल्याणकारिणी बुद्धिको जन्म देती है। एक ओर तो सभी तीर्थ हैं और दूसरी ओर करुणापूर्ण साधुजन प्राणियोंके कल्याणका उनपर कृपा करनेका व्रत धारण कर वे इतस्ततः परिभ्रमण करते रहते हैं—

उत्पद्यते शुभा बुद्धिः साधूनां यदनुग्रहः।
एकतः सर्वतीर्थानि करुणाः साधवोऽन्यतः॥
अनुग्रहाय भूतानां चरन्ति चरितव्रताः।
(६।७७-७८)

हे प्रभो ! आप सभी वर्णोंके गुरु हैं तथा विद्या एवं वयमें श्रेष्ठ हैं। अतः मैं आपसे उस आधिभौतिक स्वरूपके विषयमें पूछ रहा हूँ, जो चिरंतन कालसे चला आ रहा है। मैं क्या करूँ? किससे पूछूँ? मेरा मन अत्यन्त चञ्चल हो उठा है। यह ब्रह्मके विषयमें तो निस्पृह रहता है, पर विषयोंमें अति लालायित है। यह रंचमात्र भी उस अज्ञानरूपी अन्धकारका विछोह सहन नहीं कर सकता है। हे विप्रदेव ! कर्मोंका जो श्रेष्ठतम क्षेत्र है, वह अनेक प्रकारके भावोंसे व्यामोहित है। ज्ञानसम्पन्न व्यक्तिके पास जिस प्रकारसे शान्ति आ जाती है, विवेकवान् श्रेष्ठ मनुष्य जिस प्रकार अन्तर्बाह्य दोनों स्थितियोंमें शुद्धताको प्राप्त कर लेता है वह सब मुझे बतानेकी कृपा करें।

ऋषिने कहा—हे वैश्यवर्य ! यह मन अत्यन्त बलवान् है। यह नित्य ही विकारयुक्त स्वभाववाला है। तथापि जैसे पीलवान मतवाले हाथीको भी वशमें कर लेता है वैसे ही सत्संगतिसे, आलस्यरहित होकर साधन करके, तीव्र भक्तियोगसे तथा सद्धिचारके द्वारा अपने मनको वशमें कर लेना चाहिये। इस सम्बन्धमें तुम्हें विश्वास हो जाय, इसलिये मैं एक इतिहास बता रहा हूँ, जो नारदके पूर्वजन्मके जीवनवृत्तसे जुड़ा हुआ है, जिसको स्वयं उन्होंने ही मुझसे कहा था।

नारदजीने मुझसे कहा—हे मुने ! मैं प्राचीनकालमें किसी श्रेष्ठ ब्राह्मणका दासीपुत्र था। वहींपर मुझे महान् पुण्यात्माओंकी सत्संगति प्राप्त करनेका सुअवसर भी मिला। एक बार वर्षाकालमें भाग्यवश मेरे घर साधुजन ठहरे हुए थे। मेरे द्वारा विनम्रतापूर्वक बराबर की गयी सेवासे अत्यन्त संतुष्ट होकर उन लोगोंने मुझे उपदेश दिया था, जिसके प्रभावसे मेरी बुद्धि निर्मल और हितैषिणी बन गयी, जिससे अब मैं अपनेमें ही सबको विष्णुमय देखता हूँ।

मुनियोंने नारदजीसे कहा—हे वत्स ! तुम सुनो। हम सब तुम्हारे हितमें कह रहे हैं, जिसको स्वीकार कर तदनुसार जीवनयापन करनेवाला प्राणी इस लोक और परलोक दोनोंमें सुख प्राप्त

४८८संक्षिप्त गरुडपुराण[ धर्मकाण्ड-

करता है। इस संसारमें अनेक प्रकारके देवता, पक्षी तथा मनुष्यादिकी योनियाँ हैं, जो कर्मपाशमें बँधी हुई हैं। वे सदैव पृथक्-पृथक् रूपसे कर्मफलोंका भोग करते हुए सत्त्वगुणसे देवत्व, रजोगुणसे मनुष्यत्व और तमोगुणसे तिर्यक् योनि प्राप्त करते हैं। वासनामें आबद्ध बुद्धिहीन प्राणी माताके गर्भसे बार-बार जन्म लेकर मृत्युका वरण करता है। इस प्रकार उन असंख्य योनियोंमें जाकर वह कभी दैवयोगसे ही मनुष्यकी दुर्लभ योनिको प्राप्त कर, महात्माओंकी कृपासे भगवान् हरिको जानकर तथा अपार भवसागरको रोगरूपी ग्राह और मोहरूपी पाशसे युक्त समझकर मुक्त हो जाता है। इस भवसागरको पार करनेके इच्छुक प्राणीके लिये राम-नाम-स्मरणके अतिरिक्त अन्य कोई साधन हमें दिखायी नहीं देता है। जैसे दहीका मन्थन करनेसे नवनीत और काष्ठका मन्थन करनेसे अग्नि प्राप्त होती है, वैसे ही आत्ममन्थन कर उस परमात्माको जो प्राणी जान लेता है, वह सुखी हो जाता है।

यह आत्मा नित्य, अव्यय, सत्य, सर्वगामी, सभी प्राणियोंमें अवस्थित और महान् है। यह अप्रमेय है। यह स्वयंमें ज्योतिस्वरूप एवं मनसे भी अग्राह्य है। यह वह तत्त्व है, जो सच्चिदानन्दरूप है और सभी प्राणियोंके हृदयमें विराजमान रहता है। भावोंके विनष्ट हो जानेपर भी कभी विनष्ट नहीं होता है। जिस प्रकार आकाश सभी प्राणियोंमें, तेज जलमें तथा वायु सभी पार्थिव पदार्थोंमें स्थित है, उसी प्रकार आत्मा सर्वत्र व्याप्त और निर्लेप है। भक्तोंपर कृपादृष्टि रखनेवाले भगवान् हरि साधुओंकी रक्षा करनेके लिये अवतरित होते हैं। यद्यपि वे निर्गुण हैं, फिर भी अज्ञानियोंको गुणवान् प्रतीत होते हैं। जो व्यक्ति इस प्रकारकी ज्ञानवती बुद्धिसे अपने हृदयमें उस परमात्माका चिन्तन करता है, उसके भक्तियोगसे संतुष्ट होकर वे अजन्मा पुरुष परमात्मा उसको अपना दर्शन देते हैं। तत्पश्चात् वह भक्त कृतार्थ हो जाता है और सर्वदा सर्वत्र निष्कामभावसे बना रहता है। अतः बन्धनयुक्त इस शरीरमें अहंकारका परित्याग करके स्वप्नप्राय संसारमें ममता और आसक्तिसे रहित होकर संचरण करे। स्वप्नमें धैर्य कहाँ स्थिर रहता है? इन्द्रजालमें कहाँ सत्यता होती है? शरत्कालके मेघमें कहाँ नित्यता रहती है? वैसे ही शरीरमें सत्यता कहाँ रहती है? यह दृश्यमान समस्त चराचर जगत् अविद्या-कर्मजनित है। ऐसा जानकर तुम्हें आचारवान् योगी बनना चाहिये। उससे तुम सिद्धि प्राप्त कर सकते हो।

इस प्रकारका उपदेश देकर वे सभी दीन-हीन प्राणियोंपर वात्सल्य-भाव रखनेवाले साधु वहाँसे चले गये। तदनन्तर मैं (नारद) उनके द्वारा बताये गये मार्गसे उसी प्रकारका आचरण प्रतिदिन करता रहा। कुछ ही समयके पश्चात् मैंने अपने अन्तःकरणमें यह एक आश्चर्यजनक दृश्य देखा कि शरत्कालीन चन्द्रमाके समान निर्मल, प्रतिक्षण आनन्द प्रदान करनेवाला अद्भुत प्रकाशपुञ्ज प्रज्वलित हो रहा है। वह महातेज मुझे प्रचुर सुखसे सींचकर (अपने प्रति) अधिक स्पृहायुक्त बनाकर आकाशमें विद्युत्की भाँति अन्तर्हित हो गया। भक्तिपूर्वक मैं उस अनोखे ज्योतिपुञ्जका ध्यान करता हुआ समय आनेपर अपना शरीर छोड़कर विष्णुलोक चला गया।

हे ब्रह्मन्! उन्हीं प्रभुकी इच्छासे पुनः मेरा जन्म ब्रह्मासे हुआ। उन भगवान्की कृपासे ही मैं आज अनासक्त रहकर तीनों लोकोंमें बार-बार वीणा बजाते और गीत गाते हुए घूमता रहता हूँ।

अपना ऐसा अनुभव बताकर मुनि नारद मेरे पाससे मनोनुकूल दिशामें चले गये। उनकी उस बातसे मुझको बड़ा ही आश्चर्य हुआ और बहुत संतोष भी मिला।

२२४- राजा बभ्रुवाहनकी कथा, राजाद्वारा प्रेतके निमित्त की गयी और्ध्वदेहिक क्रिया एवं वृषोत्सर्गसे प्रेतका उद्धार

प्रेतकल्प ] वृषोत्सर्गकी महिमामें राजा वीरवाहनकी कथा ४८९


अतः सत्संगति तथा भगवद्भक्तिसे तुम्हारा विशुद्ध, निर्मल और शान्त स्वभाववाला मन सुखी हो जायगा। हे धर्मज्ञ! साधुसंगति होनेपर अनेक जन्मोंमें किया गया पाप शीघ्र ही उसी प्रकार विनष्ट हो जाता है, जैसे शरत्कालके आनेपर बरसात समाप्त हो जाती है—
अतस्ते साधुसङ्गत्या भक्त्या च परमात्मनः॥
विशुद्धं निर्मलं शान्तं मनो निर्वृतिमेष्यति।
अनेकजन्मजनितं पातकं साधुसङ्गमे॥
क्षिप्रं नश्यति धर्मज्ञ जलानां शरदो यथा।
(६।१११-११३)

वैश्यने कहा—हे ऋषिराज! आपके इस वाक्यामृत-रसपानसे मेरे अन्तःकरणको शान्ति मिल गयी। आज आपके इस दर्शनसे मेरी समस्त तीर्थयात्राका फल प्रकट हो उठा है।

यह सुनकर लोमशजीने कहा—हे राजेन्द्र! धर्म, अर्थ और काम—इस त्रिवर्गके फलकी इच्छा करनेवाले तुम्हारे हितमें यह मानता हूँ कि वृषोत्सर्गके बिना जो बहुत-से सत्कर्म तुमने किये हैं, वे सब ओसकणोंके रूपमें पृथ्वीपर गिरे हुए जलके समान कुछ भी कल्याण करनेकी सामर्थ्य नहीं रखते हैं। इस पृथ्वीतलपर वृषोत्सर्गके सदृश हितकारी कोई साधन नहीं है। इस श्रेष्ठकर्मको करनेवाले लोग अनायास पुण्यात्माओंकी सद्गति प्राप्त कर लेते हैं। वृषोत्सर्ग-कर्म जिसने किया है वह व्यक्ति और जो अश्वमेधयज्ञका कर्ता है, मेरी दृष्टिमें दोनों समान हैं। वे दोनों दिव्य शरीर प्राप्त करके इन्द्रदेवका सांनिध्य ग्रहण करते हैं। अतः तुम पुष्करतीर्थमें जाकर वृषोत्सर्ग-कर्मको सम्पन्न करो। हे साधु! उसके बाद ही तुम अपने घर जाओ, जिससे कि इस तीर्थ-यात्राका समस्त कृत्य भलीभाँति पूर्ण हो जाय।

विपश्चित्ने कहा—इसके बाद वह वैश्य यज्ञको पूर्ण करनेवाले वराहरूपी भगवान् जहाँ विद्यमान हैं, उस श्रेष्ठ पुष्करतीर्थमें गया और उसने कार्तिक पूर्णिमाके दिन ऋषिश्रेष्ठने जैसा कहा था, उस वृषोत्सर्ग-कर्मको विधिवत् सम्पन्न किया। इसके बाद लोमश ऋषिकी संगतिसे वह बहुत-से तीर्थोंमें गया। अधिक पुण्य नील (वृष)-विवाहसे उसको प्राप्त हुआ था। श्रेष्ठ विमानपर चढ़कर दिव्य विषयोंको भोगनेके बाद उसका वीरसेनके राजकुलमें जन्म हुआ। इस जन्ममें उसको वीरपञ्चानन नामकी ख्याति प्राप्त हुई। वह धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष—इस पुरुषार्थ चतुष्टयका एक अद्वितीय साधक था। वृषोत्सर्ग करते समय वहाँ जो नौकर-चाकर उपस्थित थे, वे भी गायकी पूँछके तर्पणके छींटोंका स्पर्श करके दिव्य रूप हो गये। जो दूरसे ही इस कार्यको देख रहे थे, वे लोग हृष्ट-पुष्ट हो गये और उनका स्वरूप कान्तिसे चमक उठा। इसके अतिरिक्त जो लोग इस सत्कर्मके भू-भागसे बहुत दूर थे, वे मलिन दिखायी दे रहे थे। वृषोत्सर्ग न देखते हुए जो लोग उसकी निन्दा करनेवाले थे, वे अभागे, दीन-हीन और व्यवहार आदिमें रूक्ष, कृश और वस्त्रविहीन हो गये। हे द्विज! मैंने भगवान् पराशरसे पूर्वजन्मसे सम्बद्ध इस राजाका अद्भुत और धार्मिक जो वृत्तान्त सुना था, उसका वर्णन आपसे कर दिया। इसलिये आप मेरे ऊपर कृपा करके अब अपने घर लौट जायें। मन्त्रीके ऐसे वाक्योंको सुनकर वे ब्राह्मण अत्यधिक आश्चर्यचकित हो उठे। तदनन्तर राजसेवकोंके द्वारा उन्हें घरपर पहुँचा दिया गया।

वसिष्ठने कहा—हे राजन्! सभी कर्मोंमें वृषोत्सर्ग-कर्म श्रेष्ठतम है। अतः आप यदि यमराजसे भयभीत हैं तो यथाविधि वृषोत्सर्ग-कर्म ही करें।

हे राजश्रेष्ठ! वृषोत्सर्गके अतिरिक्त अन्य कोई भी ऐसा साधन नहीं है जो मनुष्यको

४९०संक्षिप्त गरुडपुराण[ धर्मकाण्ड—

स्वर्ग-प्राप्तिकी सिद्धि प्रदान कर सके—
वृषोत्सर्गसमं किञ्चित् साधनं न दिवः परम्।
(६।१३०)
आपको मैंने धर्मका रहस्य बता दिया है। यदि पति-पुत्रसे युक्त नारी पतिके आगे मर जाती है तो उसके निमित्त वृषोत्सर्ग नहीं करना चाहिये, अपितु दूध देनेवाली गायका दान देना चाहिये*।
श्रीकृष्णने कहा— हे खगेश! महर्षि वसिष्ठके उक्त वचनोंको सुनकर राजा वीरवाहनने मथुरामें जाकर विधिवत् वृषोत्सर्गका अनुष्ठान किया। तदनन्तर अपने घर पहुँचकर उसने अपनेको कृतार्थ माना। समय आनेपर जब उसकी मृत्यु हुई तब यमराजके दूत उसको लेकर कालपुरीकी ओर चले, किंतु उस नगरको पार करके मार्गमें जब वह अधिक दूर निकल गया तो उसने दूतोंसे पूछा कि श्राद्धदेवका नगर कहाँ है? तब दूतोंने उसको बताया कि जहाँ पापी लोग पापशुद्धिके लिये यमदूतोंके द्वारा नरकमें ढकेले जाते हैं, जहाँ धर्माधर्मकी विवेचना करनेवाले धर्मराज विराजमान रहते हैं, वहीं वह श्राद्धदेवपुर है। आप-जैसे पुण्यात्माओंके द्वारा वह नहीं देखा जाता है। उसी समय देव-गन्धर्वोंके सहित दिव्य रूपवाले धर्मराजने उस राजाके समक्ष अपनेको प्रकट किया। अपने सामने उपस्थित धर्मराजको देखकर राजाने बड़े ही आदरके साथ हाथ जोड़कर उन्हें प्रणाम किया और प्रसन्नचित्त होकर उसने अनेक प्रकारसे गुण-कीर्तन करते हुए उन्हें संतुष्ट किया। धर्मराजने भी राजाकी प्रशंसा करके यही कहा—हे दूतो! तुम सब, इन्हें उस देवलोकमें ले जाओ, जहाँ प्रचुर भोगके साधन सुलभ हैं। राजा वीरवाहनने उस आदेशको सुनकर सामने ही स्थित धर्मराजसे पूछा—हे देव! मैं यह नहीं जानता हूँ कि आप मुझे किस पुण्यके प्रभावसे स्वर्गलोक ले जा रहे हैं।
धर्मराजने कहा— हे राजन्! तुमने दान-यज्ञादि अनेक पुण्यकार्योंको विधिवत् सम्पन्न किया है। वसिष्ठकी आज्ञा मान करके तुमने मथुरामें वृषोत्सर्ग भी किया है।
हे नरेश! यदि मनुष्य थोड़े भी धर्मका सम्यक्रूपसे पालन करता है तो वह ब्राह्मण और देवताओंकी कृपासे अधिकाधिक हो जाता है—
धर्मः स्वल्पोऽपि नृपते यदि सम्यगुपासितः।
द्विजदेवप्रसादेन स याति बहुविस्तरम्॥
(६।१४२)
ऐसा कहकर यमुनाके भ्राता उसी क्षण अन्तर्धान हो गये। तत्पश्चात् वीरवाहन स्वर्गमें जाकर देवताओंके साथ सुखपूर्वक रहने लगा।
श्रीकृष्णने कहा— हे पक्षिराज! मैंने वृषोत्सर्ग नामक यज्ञका माहात्म्य विस्तारपूर्वक तुम्हें सुना दिया है। प्राणियोंके पापकर्मको समाप्त करनेवाले इस आख्यानको सुननेवाला व्यक्ति पापमुक्त हो जाता है।
(अध्याय ६)


संतप्तक ब्राह्मण तथा पाँच प्रेतोंकी कथा, सत्संगति तथा भगवत्कृपासे पाँच प्रेतों तथा ब्राह्मणका उद्धार

गरुडने कहा— हे प्रभो! आपने वृषोत्सर्ग नामक यज्ञसे प्राप्त होनेवाले फलसे सम्बन्धित जो आख्यान कहा, उसको मैंने सुन लिया है। अब आप पुनः किसी अन्य कथाका वर्णन करें, जिसमें आपकी अद्भुत महिमा निहित हो।
श्रीकृष्णने कहा— हे गरुड! अब मैं संतप्तक


* पतिपुत्रवती नारी भर्तुरग्रे मृता यदि। वृषोत्सर्गं न कुर्वीत गां दद्याच्च पयस्विनीम्॥ (६।१३१)

प्रेतकल्प ]
संतप्तक ब्राह्मण तथा पाँच प्रेतोंकी कथा
४९१


नामक ब्राह्मण तथा पाँच प्रेतोंकी कथाको बताता हूँ।

हे पक्षिन्! पूर्वकालमें संतप्तक नामक एक ब्राह्मण था, जिसने तपस्याके बलपर अपनेको पापरहित कर लिया था। यह संसार असार है, ऐसा जानकर वह वनोंमें वैखानस मुनियोंके द्वारा आचरित वृत्तिका पालन करते हुए अरण्यमें ही विचरण करता था। किसी समय उस ब्राह्मणने तीर्थ-यात्राको लक्ष्य बनाकर अपनी यात्रा प्रारम्भ की। संसारके प्रति इन्द्रियाँ स्वतः आकृष्ट हो जाती हैं, इस कारणसे उसने अपनी बाह्य चित्तवृत्तियोंको भी रोक लिया था, किंतु पूर्व संस्कारोंके प्रभावसे वह मार्ग भूल गया और चलते-चलते मध्याह्नकाल हो गया, स्नानके लिये जलकी अभिलाषासे वह चारों ओर देखने लगा। उसे उस समय सैकड़ों गुल्म-लता और बाँसके वृक्षोंसे घिरा हुआ, वृक्षोंकी शाखाओंसे व्याप्त, घनघोर एक वन दिखायी पड़ा। वहाँ ताल, तमाल, प्रियाल, कटहल, श्रीपर्णी, शाल, शाखोट (सिहोरका वृक्ष), चन्दन, तिन्दुक, राल, अर्जुन, आमड़ा, लसोड़ा, बहेड़ा, नीम, इमली, बैर और कनैल तथा अन्य बहुत-से वृक्षोंकी सघनताके कारण पक्षियोंके लिये भी मार्ग नहीं दीखता था। फिर मनुष्यके लिये उस वनमें कहाँ मार्ग मिल सकता था? वह वन तो सिंह, व्याघ्र, तरक्षु (एक छोटी जातिका बाघ), नीलगाय, रीछ, महिष, हाथी, कृष्णमृग, नाग और बंदर तथा अन्यान्य प्रकारके हिंसक जीव-जन्तु, राक्षस एवं पिशाचोंसे परिव्याप्त था।

संतप्तक उस प्रकारके घनघोर भयावह वनको देखकर भयाक्रान्त हो उठा। भयभीत वह अब किस दिशामें जाय, इसका निर्णय नहीं कर सका। फिर जो होगा, देखा जायगा—यह सोचकर वह वहाँसे पुनः चल पड़ा। झींगुरोंकी झंकार तथा उल्लुओंकी धूत्कार ध्वनियोंपर कान लगाये वह पाँच ही डग चला था कि सामने बरगदके वृक्षमें बँधा एक शव लटका हुआ उसे दिखायी दिया, जिसे पाँच महाभयंकर प्रेत खा रहे थे। हे खगेश! उन प्रेतोंके शरीरमें मात्र शिराओंसे युक्त हड्डी और चमड़ा ही शेष था। उनका पेट पीठमें धँसा हुआ था। नेत्ररूपी कुओंमें गिरनेके भयसे नासिकाने उनका साथ छोड़ दिया था। वसासे भरे हुए ताजे शवके मस्तिष्क-भागका स्वाद लेकर जो नित्य अपना महोत्सव मनाते थे और हड्डीकी गाँठोंको तोड़नेमें लगे हुए जिनके बड़े-बड़े दाँत किटकिटाते थे, ऐसे प्रेतोंको देखकर घबड़ाये हुए हृदयवाला वह ब्राह्मण वहीं ठिठक गया। उस निर्जन वनमें आ रहे ब्राह्मणको उन प्रेतोंने देख लिया था। अतः 'मैं उसके पास पहले जाऊँगा, मैं उसके पास पहले जाऊँगा'—इस प्रकारकी प्रतिस्पर्धा में वे सभी प्रेत दौड़ पड़े। उनमेंसे दो प्रेतोंने इस ब्राह्मणके दोनों हाथ पकड़ लिये, दो प्रेतोंने दोनों पैर पकड़ लिये। एक प्रेत शेष बचा था, उसने इसका सिर पकड़ लिया। तदनन्तर वे सभी कहने लगे कि 'मैं इसे डकारूँगा, मैं इसे खाऊँगा।' ऐसा कहते हुए वे पाँचों प्रेत ब्राह्मणको खींचने लगे। फिर उसे साथ लेकर वे सहसा आकाशमें चले गये। किंतु उस बरगदपर शवका अभी कितना मांस शेष है और कितना नहीं, इस बातको भी वे सोच रहे थे। उसी समय उन लोगोंने देखा कि दाँतोंके द्वारा नोंचे जानेके कारण वह शव तो अभी फटी हुई आँतसे युक्त है। इसलिये वे आकाशसे नीचे उतर आये और शवको अपने पैरोंसे बाँधकर पुनः आकाशमें ही उड़ गये।

आकाशमें ले जाये जा रहे उस प्रेतरूपमें स्वयंको ही समझकर वह भयार्त ब्राह्मण पूर्ण मनसे मेरी शरणमें आ गया। देवाधिदेव, चिन्मय,

४९२ संक्षिप्त गरुडपुराण [ धर्मकाण्ड-

सुदर्शनचक्रधारी मुझ हरिको प्रणाम कर वह इस प्रकार स्तुति करने लगा—

जिन भगवान्‌ने अपने चक्रके प्रहारसे ग्राहके मुखको विदीर्णकर उसके दुःखको नष्ट किया था, जो ग्राहके मुखमें फँसे हुए गजराजको मुक्त करानेवाले हैं, वे श्रीहरि मेरे कर्मपाशको काटकर मुझे मुक्त करें। मगधनरेश जरासन्धने निर्दोष राजाओंको बंदी बनाकर कारागारमें डाल दिया था, जिन मुरारि श्रीकृष्णने राजसूययज्ञके लिये पाण्डुपुत्र भीमसेनके द्वारा उस दुष्टको मल्लयुद्धमें मरवाकर राजाओंको मुक्त किया था। वे इस समय मेरे कर्मपाशको काटकर मेरा दुःख दूर करें।

हे गरुड! उस समय दत्तचित्त होकर जब वह मेरी स्तुतिमें लग गया तो उसे सुनते ही मैं भी उठ खड़ा हुआ और सहसा वहाँ जा पहुँचा, जहाँ प्रेत उसको लेकर जा रहे थे। उन लोगोंके द्वारा ले जाते हुए उस ब्राह्मणको देखकर मुझे आश्चर्य हुआ। कुछ कालतक बिना पूछे मैं भी उनके पीछे-पीछे चलने लगा। मेरी संनिधिमात्रसे उस ब्राह्मणको पालकीमें सोये हुए राजाके समान सुख प्राप्त हुआ। इसके बाद मैंने मार्गमें सुमेरु पर्वतपर जा रहे मणिभद्र नामक यक्षराजको देखा। मैंने नेत्रोंके संकेतसे उन्हें अपने पास बुलाया और कहा—हे यक्षराज! तुम इस समय इन प्रेतोंको विनष्ट करनेके लिये प्रतिद्वन्द्वी योद्धा बन जाओ। युद्धमें इन्हें मारकर इस शवको अपने अधिकारमें करो।

ऐसा सुनते ही उस मणिभद्रने प्रेतोंको दुःख पहुँचानेवाले प्रेतरूपको धारण कर लिया। दोनों भुजाओंको फैलाकर ओठोंको जीभसे चाटते हुए और अपनी लम्बी-लम्बी निःश्वासोंसे उन प्रेतोंको दहलाते हुए वह मणिभद्र उनके सम्मुख जाकर डट गया। उसने दोको अपनी दोनों भुजाओंसे, दोको दोनों पैरोंसे और एकको सिरसे पकड़ लिया। उसके बाद अपने शक्तिशाली मुक्केसे उन प्रेतोंपर ऐसा प्रहार किया कि वे सभी विवर्णमुख हो गये। वे उस ब्राह्मण तथा शवको एक हाथ और एक पैरसे पकड़कर युद्ध करने लगे। उन लोगोंने अपने नख-थप्पड़, लात एवं दाँतोंसे उसपर प्रहार किये, पर मणिभद्रने उनके प्रहारको विफल कर उनसे शवको ले लिया। उस यक्षके द्वारा शवको छीन लिये जानेपर पारियात्र पर्वतपर उस ब्राह्मणको छोड़कर वे सभी प्रेत अत्यन्त उत्साहसे भरे हुए पुनः प्रेतरूप मणिभद्रकी ओर दौड़ पड़े। क्षणमात्रमें ही उन लोगोंने वायुके समान द्रुतगामी मणिभद्रको घेर लिया, किंतु वह अदृश्य हो गया। ऐसी स्थिति देखकर हताश होकर वे प्रेत उस ब्राह्मणके पास जा पहुँचे। उस पर्वतपर पहुँचकर उन लोगोंने ब्राह्मणको ज्यों ही मारना प्रारम्भ किया, त्यों ही मेरी उपस्थिति और ब्राह्मणके प्रभावसे तत्काल उनमें पूर्वजन्मकी स्मृति जाग्रत् हो उठी। इसके बाद ब्राह्मणकी प्रदक्षिणा करके उन प्रेतोंने ब्राह्मणश्रेष्ठसे कहा—हे विप्रदेव! आप हमें क्षमा करें। उनके दीन वचनोंको सुनकर ब्राह्मणने पूछा—आप लोग कौन हैं? यह क्या कोई माया है अथवा यह मैं स्वप्न देख रहा हूँ या यह मेरे चित्तका विभ्रम है?

प्रेतोंने कहा—हम सब प्रेत हैं और पूर्वजन्मके

२२५- श्राद्धान्नका पितरोंके पास पहुँचना, दृष्टान्तरूपमें देवी सीताद्वारा भोजन करते हुए ब्राह्मणके शरीरमें महाराज दशरथ आदिका दर्शन करना, मृत्युके अनन्तर दूसरे शरीरकी प्राप्ति, सत्कर्मकी महिमा तथा पिण्डदानसे शरीरका निर्माण

प्रेतकल्प ] संतप्तक ब्राह्मण तथा पाँच प्रेतोंकी कथा ४९३

दुष्कर्मोंके प्रभावसे इस योनिको प्राप्त हुए हैं। ब्राह्मणने कहा—हे प्रेतो! तुम्हारे क्या नाम हैं? तुम सब क्या करते हो? तुम्हें कैसे इस दशाकी प्राप्ति हुई? पहले मेरे प्रति तुम लोगोंका व्यवहार कैसे अविनयी था और इस समय कैसे विनयी हो गया है। प्रेतोंने कहा—हे द्विजराज! आप यथाक्रम अपने प्रश्नोंका उत्तर सुनें। हे योगिराज! हम आपके दर्शनसे निष्पाप हो गये हैं। हमारे नाम क्रमशः पर्युषित, सूचीमुख, शीघ्रग, रोधक और लेखक हैं। ब्राह्मणने कहा—हे प्रेतो! पूर्वकर्मसे उत्पन्न प्रेतोंका नाम कैसे निरर्थक हो सकता है? तुम सब अपने इन विचित्र नामोंके विषयमें विस्तारसे मुझे बताओ। श्रीकृष्णने कहा—ब्राह्मणके द्वारा ऐसा कहे जानेपर पृथक्-पृथक् रूपसे प्रेतोंने कहा— पर्युषितने कहा—किसी समय मैंने श्राद्धके सुअवसरपर ब्राह्मणको निमन्त्रित किया था, वह वृद्ध ब्राह्मण मेरे घर विलम्बसे पहुँचा। बिना श्राद्ध किये ही भूखके कारण मैंने उस पाकको खा लिया। कुछ पर्युषित (बासी) अन्न लाकर मैंने उस ब्राह्मणको दे दिया। मरनेपर मुझे उसी पापके कारण इस दुष्टयोनिकी प्राप्ति हुई। मैंने ब्राह्मणको जो बासी भोजन दिया था, उसीसे मेरा नाम पर्युषित हो गया। सूचीमुखने कहा—किसी समय कोई ब्राह्मणी तीर्थस्नानके लिये भद्रवट तीर्थमें गयी। उसके साथ उसका पाँच वर्षीय पुत्र भी था, जिसके सहारे वह जीवित थी। मैं उस समय क्षत्रिय था। मैं उसके मार्गका अवरोधक बन गया और निर्जन वनमें मैंने राहजनी की। हे विप्र! उस लड़केके सिरपर मुष्टि-प्रहार कर मैंने दोनोंके वस्त्र और राहमें खाने योग्य सामान छीन लिया। वह लड़का प्याससे व्याकुल हो उठा था। अतः वह माताके पास स्थित जल लेकर पीने लगा। उस पात्रमें उतना ही जल था। मैंने उसको डाँटकर जल पीनेसे रोक दिया और स्वयं उस पात्रका सारा जल पी गया। भयसंत्रस्त, प्याससे व्याकुल उस बालककी वहींपर मृत्यु हो गयी। पुत्रशोकसे व्यथित उसकी माँने भी कुएँमें कूदकर अपना प्राण त्याग दिया। इसी पापसे मुझको यह प्रेतयोनि प्राप्त हुई है। पर्वताकार शरीर होनेपर भी इस समय मैं सुईकी नोंकके समान मुखवाला हूँ। यद्यपि खाने योग्य पदार्थ मैं प्राप्त कर लेता हूँ, फिर भी यह मेरा सुईके छिद्रके समान मुख उसको खानेमें असमर्थ है। मैंने क्षुधाग्निसे जलते हुए ब्राह्मणीके बालकका मुँह बंद किया था, उसी पापसे मेरे मुँहका छिद्र भी सुईकी नोंकके समान हो गया है। इसी कारण मैं आज सूचीमुख नामसे प्रसिद्ध हूँ। शीघ्रगने कहा—हे विप्रवर! मैं पहले एक धनवान् वैश्य था। उस जन्ममें अपने मित्रके साथ व्यापार करनेके लिये मैं एक दूसरे देशमें जा पहुँचा। मेरे मित्रके पास बहुत धन था। अतः उस धनके प्रति मेरे मनमें लोभ आ गया। अदृष्टके विपरीत होनेसे वहाँ मेरा मूल धन समाप्त हो चुका था। हम दोनोंने वहाँसे निकलकर मार्गमें स्थित नदीको नावसे पार करना प्रारम्भ किया। उस समय आकाशमें सूर्य लाल हो गया था। राहकी थकानसे व्याकुल मेरा वह मित्र मेरी गोदमें अपना सिर रखकर सो गया। उस समय लोभवश मेरी बुद्धि अत्यन्त क्रूर हो उठी। अतः सूर्यास्त हो जानेपर गोदमें सोये हुए अपने मित्रको मैंने जल-प्रवाहमें फेंक दिया। मेरे द्वारा नावमें किये गये उस कृत्यको अन्य लोग भी न जान सके। उस व्यक्तिके पास जो कुछ बहुमूल्य हीरे-जवाहरात, मोती तथा सोनेकी वस्तुएँ थीं, वह सब लेकर मैं शीघ्र ही उस