गरुड़ पुराण
Garuda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें| ४८२ | संक्षिप्त गरुडपुराण | [ धर्मकाण्ड— |
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पैर दाबे जाते थे और कहाँ आज इन यमदूतोंके वज्रसदृश कठोर हाथोंसे पैर पकड़कर मुझे निर्दयतापूर्वक घसीटा जा रहा है!
दसवें मासमें वहींपर पिण्ड और जलका उपभोग करके वह (जीव) पुनः आगेकी ओर सरकने लगता है। ग्यारहवाँ मास पूर्ण होते ही वह ‘रौद्रपुर’ पहुँच जाता है। मार्गमें यमदूत जैसे ही उसकी पीठपर प्रहार करते हैं, वह चिल्लाते हुए इस प्रकार विलाप करता है—
क्वाहं सतूलीशयने परिवर्तनं क्षणे क्षणे।
<div style="text-align: right;">(५।१३७)</div>
भटहस्तभ्रष्टयष्टिकृष्टपृष्ठः क्व वा पुनः॥
कहाँ मैं रूईसे बने हुए अत्यन्त कोमल गद्देपर लेटकर प्रतिक्षण करवटें बदलता था और कहाँ आज यमदूतोंके हाथोंसे निर्दयतापूर्वक मारी जा रही लाठियोंके प्रहारसे कटी पीठसे करवट बदल रहा हूँ!
हे द्विज! इसके पश्चात् वह जीव पृथ्वीपर दिये गये जलसहित पिण्डको खाकर ‘पयोवर्षण’ नामक नगरकी ओर प्रस्थान करता है। रास्तेमें यमदूत कुल्हाड़ीसे उसके सिरपर प्रहार करते हैं। हताहत होकर वह इस प्रकारका विलाप करता है—
क्व भृत्यकोमलकरैर्गन्धतैलावसेचनम्॥
<div style="text-align: right;">(५।१३९-१४०)</div>
क्व कीनाशनुगैः क्रोधात्कुठारैः शिरसि व्यथा।
हाय! कहाँ भृत्योंके कोमल-कोमल हाथोंसे मेरे सिरपर सुवासित तेलकी मालिश होती थी और कहाँ आज क्रोधसे परिपूर्ण यमदूतोंके हाथोंसे मेरे इस सिरपर कुल्हाड़ियोंका प्रहार हो रहा है!
इस पयोवर्षण नामक नगरमें वह मृतक ऊनाब्दिक श्राद्धका दुःखपूर्वक उपभोग करता है। तदनन्तर वर्ष बीतते ही वह ‘शीताढ्य’ नगरकी ओर चल देता है। मार्गमें बढ़ते हुए उस मृतककी जिह्वाको यमदूत छूरीसे काट डालते हैं, जिससे दुःखित होकर वह इस प्रकार विलाप करता है—
प्रियालापैः क्व च रसमाधुर्यस्य वर्णनम्।
<div style="text-align: right;">(५।१४२)</div>
उक्तमात्रेऽसिपत्रादिजिह्वाच्छेदः क्व चैव हि॥
अरे! कहाँ परस्पर प्रिय वार्तालापोंके द्वारा इस जिह्वाके रसमाधुर्यकी प्रशंसा की जाती थी, कहाँ आज मुँह खोलनेमात्रपर ही तलवारके समान तीक्ष्ण छूरी आदिके द्वारा मेरी उसी जिह्वाको काट दिया जा रहा है!
तदनन्तर उसी नगरमें वह मृतक वार्षिक पिण्डोदक तथा श्राद्धमें दिये गये अन्य पदार्थोंका सेवन कर आगेकी ओर बढ़ता है। पिण्डज शरीरमें प्रविष्ट होकर वह ‘बहुभीति’ नामक नगरमें जाता है। वह मार्गमें अपने पापका प्रकाशन और स्वयंकी निन्दा करता है। यमपुरीके इस मार्गमें स्त्री भी इसी-इसी प्रकारका विलाप करती है।
इसके बाद वह मृतक अत्यन्त निकट ही स्थित यमपुरीमें जाता है। वह याम्यलोक चौवालीस योजनमें विस्तृत है। उसमें श्रवण नामक तेरह प्रतीहार हैं। उन प्रतीहारोंको श्रवणकर्म करनेसे प्रसन्नता होती है। अन्यथा वे क्रुद्ध होते हैं। ऐसे लोकमें पहुँचनेके पश्चात् प्राणी मृत्युकाल तथा अन्तक आदिके मध्यमें