गरुड़ पुराण
Garuda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रेतकल्प ] आशौचमें विहित कृत्य, आशौचकी अवधि तथा दशगात्रविधि ४८१
शान्त कर आगे आनेवाले नगरकी ओर चल देता है। मार्गमें यमदूत भालेसे प्रहार करते हैं, जिससे संत्रस्त होकर वह इस प्रकार विलाप करता है—
माता भ्राता पिता पुत्रः कोऽपि मे वर्तते न वा।
<p align="right">(५। १२२)</p>
यो मामुद्धरते पापं पतन्तं दुःखसागरे॥
मेरे माता-पिता, भाई, पुत्र कोई है अथवा नहीं है, जो इस दुःखके सागरमें गिरे हुए मुझ पापीका उद्धार कर सके।
ऐसा विलाप करता हुआ वह जीव मार्गमें चलता रहता है। उसी मार्गमें ‘वैतरणी’ नामकी एक नदी पड़ती है, जो सौ योजन चौड़ी है और रक्त तथा पीबसे भरी हुई है। जैसे ही मृतक उस नदीके तटपर पहुँचता है, वैसे ही वहाँपर नाववाले—मल्लाह आदि उसको देखकर यह कहते हैं कि यदि तुमने वैतरणी गौका दान दिया है तो इस नावपर सवार हो जाओ और सुखपूर्वक इस नदीको पार कर लो। जिसने वैतरणी नामक गौका दान दिया है, वही सुखपूर्वक इस नदीको पार कर सकता है। जिस व्यक्तिने वैतरणी गौका दान नहीं दिया है, उसको नाविक हाथ पकड़कर घसीटते हुए ले जाते हैं। तेज और नुकीली चोंचसे कौआ, बगुला तथा उलूक नामक पक्षी अपने प्रहारसे उसे अत्यन्त व्यथित करते हैं। हे पक्षिन्! अन्त समय आनेपर मनुष्योंके लिये वैतरणीका दान ही हितकारी है। यदि प्राणी अपने जीवनकालमें वैतरणी नामक गौका दान देता है तो वह गौ समस्त पापोंको विनष्ट कर देती है और उसको यमलोक न ले जाकर विष्णुलोकको पहुँचा देती है*।
सातवाँ मास आ जानेपर मृतक ‘बहापद’ नामक पुरमें आ जाता है। वहाँपर सप्तमासिक सोदक पिण्डका सेवन करके आगे बढ़ते हुए परिघके आघातसे पीड़ित होकर वह इस प्रकार विलाप करता है—
न दत्तं न हुतं तप्तं न स्नातं न कृतं हितम्।
<p align="right">(५। १२९)</p>
यादृशं चरितं कर्म मूढात्मन् भुंक्ष्व तादृशम्॥
हे शरीर! मैंने दान, आहुति, तप, तीर्थस्नान तथा परोपकार आदि सत्कृत्य जीवनपर्यन्त नहीं किया है। हे मूर्ख! अब जैसा तुमने कर्म किया है, वैसा ही भोग करो।
हे तार्क्ष्य! इसके बाद वह जीव आठवें मासमें ‘दुःखदपुर’ पहुँचता है। वहाँ स्वजनोंके द्वारा दिये गये अष्टमासिक पिण्ड और जलका सेवन करके ‘नानाक्रन्द’ नामक पुरकी ओर प्रस्थान कर देता है। मार्गमें चलते हुए मुसलाघातसे पीड़ित होकर वह इस प्रकार विलाप करता है—
क्व जायाचटुलैश्चाटुपटुभिर्वचनैर्मम॥
<p align="right">(५। १३१-१३२)</p>
भोजनं भल्लभाल्लीभिर्मुसलैश्च क्व मारणम्।
हाय! कहाँ चंचल नेत्रोंवाली पत्नीके चापलूसी भरे वचनोंके द्वारा किये गये मनोविनोदोंके बीच मेरा भोजन होता था और कहाँ भाला-बछियों तथा मुसलोंके द्वारा मुझे मारा जा रहा है!
इस प्रकार विलाप करता हुआ वह जीव नवें मासमें ‘नानाक्रन्दपुर’ पहुँच जाता है। तदनन्तर नवें मासमें पुत्रद्वारा दिये गये पिण्डका भोजन करके वह नाना प्रकारका विलाप करता है। तत्पश्चात् यमदूत दसवें मासमें उसको ‘सुतप्तभवन’ ले जाते हैं। मार्गमें वे उसको हलसे मारते-पीटते हैं, जिससे आहत होकर वह इस प्रकार विलाप करता है—
क्व सूनुपेशलकरैः पादसंवाहनं मम॥
<p align="right">(५। १३४-१३५)</p>
क्व दूतवज्रप्रतिमकरैर्मत्यदकर्षणम्।
हाय! कहाँ पुत्रोंके कोमल-कोमल हाथोंसे मेरे
* मनुजानां हितं दानमन्ते वैतरणी खग। दत्ता पापं दहेत् सर्वं मम लोकं तु सा नयेत्॥ (५। १२६-१२७)