गरुड़ पुराण
Garuda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें| काण्ड ] | भगवान् विष्णुका ध्यान एवं सूर्यार्चन-निरूपण | ३९ |
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अग्राह्यश्चैव गौरश्च सर्वः शुचिरभीष्टुतः।
वषट्कारो वषड् वौषट् स्वधा स्वाहा रतिस्तथा॥
पक्ता नन्दयिता भोक्ता बोद्धा भावयिता तथा।
ज्ञानात्मा चैव देहात्मा भू (उ) मा सर्वेश्वरेश्वरः॥
नदी नन्दी च नन्दीशो भारतस्तरुनाशनः।
चक्रपः श्रीपतिश्चैव नृपाणां चक्रवर्तिनाम्॥
ईशश्च सर्वदेवानां द्वारकासंस्थितस्तथा।
पुष्करः पुष्कराध्यक्षः पुष्करद्वीप एव च॥
भरतो जनको जन्यः सर्वाकारविवर्जितः।
निराकारो निर्निमित्तो निरांतंको निराश्रयः॥
इति नामसहस्रं ते वृषभध्वज कीर्तितम्।
देवस्य विष्णोरीशस्य सर्वपापविनाशनम्॥
पठन् द्विजश्च विष्णुत्वं क्षत्रियो जयमाप्नुयात्।
वैश्यो धनं सुखं शूद्रो विष्णुभक्तिसमन्वितः॥
हे वृषभध्वज! मैंने सर्वपापविनाशक, जगदीश्वर, देवाधिदेव विष्णुके इस सहस्रनामका जो कीर्तन किया है, इसका पाठ करनेसे ब्राह्मण विष्णुत्व अर्थात् विष्णुस्वरूप, क्षत्रिय विजय, वैश्य धन तथा सुख और शूद्र विष्णुकी भक्ति प्राप्त करता है।
(अध्याय १५)
भगवान् विष्णुका ध्यान एवं सूर्यार्चन-निरूपण
रुद्रने कहा— हे शंख-चक्र और गदाको धारण करनेवाले भगवान् हरि! आप पुनः देवदेवेश्वर शुद्धरूप परमात्मा विष्णुके ध्यानका वर्णन करें।
हरिने कहा— हे रुद्र! संसाररूपी वृक्षका विनाश करनेवाले वे हरि ज्ञानरूप, अनन्त, सर्वव्यास, अजन्मा और अव्यय हैं। वे अविनाशी, सर्वत्रगामी, नित्य, महान्, अद्वितीय ब्रह्म हैं। सम्पूर्ण संसारके मूल कारण तथा समस्त चराचरमें गतिमान् परमेश्वर हैं। वे समस्त प्राणियोंके हृदयमें निवास करनेवाले तथा सभीके ईश्वर हैं, सम्पूर्ण जगत्का आधार होते हुए भी वे स्वयं निराधार हैं। सभी कारणोंके कारण हैं।
सांसारिक विषयोंकी आसक्तिसे परे उनकी स्थिति है, वे निर्मुक्त हैं। मुक्त योगियोंके ध्येय हैं। वे स्थूल शरीरसे रहित नेत्र, पाणि, पाद, पायु, उपस्थादि समस्त इन्द्रियोंसे विहीन हैं। वे हरि मन एवं मनके धर्म सङ्कल्प-विकल्प आदिसे रहित हैं। वे बुद्धि (भौतिक इन्द्रियविशेष)-से रहित, बुद्धि-धर्म-विवर्जित, अहंकारसे शून्य, चित्तसे अग्राह्य, प्राण-अपान-व्यानादि वायुसे रहित हैं।
हरिने कहा— अब मैं सूर्यकी पूजाका पुनः वर्णन करता हूँ, जो प्राचीन कालमें भृगु ऋषिको सुनायी गयी थी।
'ॐ खखोल्काय नमः'— यह भगवान् सूर्यदेवका मूल मन्त्र है, जो साधकको भोग और मोक्ष प्रदान करता है। (निम्न मन्त्रसे अङ्गन्यास करके साधकको सूर्यदेवकी पूजा करनी चाहिये।) यथा—
'ॐ खखोल्काय त्रिदशाय नमः।' 'ॐ विचि ठठ शिरसे नमः।' 'ॐ ज्ञानिने ठठ शिखायै नमः।' 'ॐ सहस्ररश्मये ठठ कवचाय नमः।' 'ॐ सर्वतेजोऽधिपतये ठठ अस्त्राय नमः।' 'ॐ ज्वल ज्वल प्रज्वल प्रज्वल ठठ नमः।'
सूर्यका यह मन्त्र साधकके समस्त पापोंका विनाश करनेवाला है। इसे अग्नि-प्राकार मन्त्र भी कहते हैं।
भगवान् सूर्यको प्रसन्न करनेवाला मन्त्र इस प्रकार है, यह सूर्य-गायत्री-मन्त्र कहलाता है—इस मन्त्र-जपके पश्चात् साधकको सूर्य एवं गायत्रीका सकलीकरण करना चाहिये—