गरुड़ पुराण
Garuda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें| ४० | संक्षिप्त गरुड़पुराण | [ आचार- |
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‘ॐ आदित्याय विद्महे, विश्वभावाय धीमहि, तन्नः सूर्यः प्रचोदयात्।’
साधकको प्रत्येक दिशा-प्रदिशामें निम्नलिखित दिक्पाल देवोंके लिये प्रणाम निवेदन करना चाहिये—
‘ॐ धर्मात्मने नमः’ पूर्वमें, ‘ॐ यमाय नमः’ दक्षिणमें, ‘ॐ दण्डनायकाय नमः’ पश्चिममें, ‘ॐ दैवताय नमः’ उत्तरमें, ‘ॐ श्यामपिंगलाय नमः’ ईशानमें, ‘ॐ दीक्षिताय नमः’ अग्निकोणमें, ‘ॐ वज्रपाणये नमः’ नैर्ऋत्यकोणमें, ‘ॐ भूर्भुवः स्वः नमः’ वायुकोणमें।
हे वृषध्वज! साधकको चाहिये कि वह निम्नाङ्कित मन्त्रोंसे पूर्वादि दिशाओंसे प्रारम्भ करके ईशानकोणतक चन्द्रादि ग्रहोंकी भी पूजा करे—
‘ॐ चन्द्राय नक्षत्राधिपतये नमः।’ ‘ॐ अङ्गारकाय क्षितिसुताय नमः।’ ‘ॐ बुधाय सोमसुताय नमः।’ ‘ॐ वागीश्वराय सर्वविद्याधिपतये नमः।’ ‘ॐ शुक्राय महर्षये भृगुसुताय नमः।’ ‘ॐ शनैश्चराय सूर्यात्मजाय नमः।’ ‘ॐ राहवे नमः।’ ‘ॐ केतवे नमः।’
निम्न तीन मन्त्रोंसे सूर्यदेवको प्रणाम करके उन देवको अर्घ्यादि प्रदान करनेके लिये आवाहित करना चाहिये—
‘ॐ अनूरुकाय नमः।’ ‘ॐ प्रमथनाथाय नमः।’ ‘ॐ बुधाय नमः।’
‘ॐ भगवन्नपरिमितमयूखमालिन् सकलजगत्पते सप्ताश्ववाहन चतुर्भुज परमसिद्धिप्रद विस्फुलिङ्गपिङ्गल तत् एहोहि इदमर्घ्यं मम शिरसि गतं गृह् गृह् तेजोग्ररूपम् अनग्र ज्वल ज्वल ठठ नमः।’
उपर्युक्त मन्त्रसे आवाहित इन अभीष्ट देवका निम्न मन्त्रसे विसर्जन करे—
‘ॐ नमो भगवते आदित्याय सहस्रकिरणाय गच्छ सुखं पुनरागमनाय।’
हे सहस्ररश्मि भगवान् आदित्य! आपके लिये मेरा प्रणाम है। हे कृपालु! आप पुनः आगमनके लिये सुखपूर्वक पधारें।
हरिने कहा—हे रुद्र! मैं पुनः सूर्य-पूजाकी विधिका वर्णन करूँगा, जिसे मैंने पहले कुबेरसे कहा था।
[सूर्यपूजा प्रारम्भ करनेसे पूर्व] एकाग्रचित्त होकर पवित्र स्थानपर कर्णिकायुक्त अष्टदलकमल बनाये। तदनन्तर सूर्यदेवका आवाहन करे। तत्पश्चात् भूमिपर निर्मित कमलदलके मध्यमें यन्त्ररूपी खखोल्क भगवान् सूर्यकी उनके परिकरोंके साथ स्थापना करे तथा उन्हें स्नान कराये।
हे शिव! इसके बाद साधक अग्निकोणमें (अभीष्ट) देवके हृदयकी स्थापना करे। ईशानकोणमें सिरकी स्थापना करके नैर्ऋत्यकोणमें शिखाका विन्यास करे। वह पुनः एकाग्रचित्त होकर पूर्व दिशामें उनके धर्म, वायुकोणमें उनके नेत्र और पश्चिम दिशामें उनके अस्त्रका विन्यास करे।
इसी प्रकार अष्टदलकमलके ईशानकोणमें चन्द्र, पूर्व दिशामें मंगल, अग्निकोणमें बुध, दक्षिण दिशामें बृहस्पति, नैर्ऋत्यकोणमें शुक्र, पश्चिम दिशामें शनि, वायुकोणमें केतु एवं उत्तर दिशामें राहुके पूजनका विधान है। अतः (साधकको इन सभी ग्रहोंकी पूजा करके) द्वितीय कक्षामें साथ ही द्वादश सूर्योंकी पूजा भी करनी चाहिये।
भग, सूर्य, अर्यमा, मित्र, वरुण, सविता, धाता, विवस्वान्, त्वष्टा, पूषा, इन्द्र और विष्णु—ये द्वादश सूर्य कहे गये हैं।
द्वादश सूर्योंकी पूजा करनेके बाद पूर्वादि दिशाओंमें इन्द्रादि देवोंकी अर्चना करे तथा जया-विजया-जयन्ती एवं अपराजिता शक्तियोंकी और शेष, वासुकि आदि नागोंकी पूजा करे।
(अध्याय १६-१७)