भारतकोश
गरुड़ पुराण

गरुड़ पुराण

Garuda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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काण्ड ]मृत्युञ्जय-मन्त्र-जपकी महिमा४१

मृत्युञ्जय-मन्त्र-जपकी महिमा

सूतजीने कहा— अब मैं मृत्युञ्जय-पूजाका वर्णन करूँगा, जिसको गरुडने कश्यप ऋषिसे कहा था। वह साधकका उद्धार करनेवाली, पुण्यप्रदायिनी एवं सर्वदेवमय पूजा है, ऐसा सभीका अभिमत है।

सूतजीने कहा— मृत्युञ्जय-मन्त्र ‘ॐ जुं सः’ तीन अक्षरोंवाला है। पहले ॐकारका उच्चारण करके जुं (हुं)-का उच्चारण करे। तदनन्तर विसर्गके साथ ‘स’ (सः)-का उच्चारण करना चाहिये। यह मन्त्र मृत्यु और दरिद्रताका मर्दन करनेवाला है तथा शिव, विष्णु, सूर्य, आदि सभी देवोंका कारणभूत है। ‘ॐ जुं सः’ यह महामन्त्र अमृतेशके नामसे कहा जाता है। इस मन्त्रका जप करनेसे प्राणी सम्पूर्ण पापोंसे छूट जाता है और मृत्युरहित हो जाता है अर्थात् मृत्युके समान होनेवाले उसके कष्ट दूर हो जाते हैं।

इस मन्त्रका सौ बार जप करनेसे वेदाध्ययनजनित पुण्यफल तथा यज्ञकृत फल एवं तीर्थ-स्नान-दान-पुण्यादिका फल प्राप्त होता है। तीनों संध्याओंमें एक सौ आठ बार इस मन्त्रका जप करनेसे मनुष्य मृत्युको जीत लेता है। कठिन-से-कठिन विघ्न-बाधाओंको पार कर जाता है, शत्रुओंपर विजय प्राप्त कर लेता है।

भगवान् मृत्युञ्जय श्वेत कमलके ऊपर बैठे हुए वरद-हस्त तथा अभय-मुद्रा धारण किये रहते हैं। तात्पर्य यह कि उनके एक हाथमें अभय-मुद्रा है और एक हाथमें वरद-मुद्रा। दो हाथोंमें अमृत-कलश है। इस रूपमें अमृतेश्वरका ध्यान करनेके साथ ही अमृतेश्वरभगवान्‌के वामाङ्गमें रहनेवाली अमृतभाषिणी अमृतादेवीका भी ध्यान करना चाहिये। देवीके दायें हाथमें कलश और बायें हाथमें कमल सुशोभित रहता है।

हे शिव! यदि एक मासतक अमृतादेवीके साथ अमृतेश्वरभगवान्‌का ध्यान करते हुए मानव ‘ॐ जुं सः’ इस मन्त्रका तीनों सन्ध्याओंमें आठ हजार जप करे तो वह जरा, मृत्यु तथा महाव्याधियोंसे मुक्त हो जाता है और शत्रुओंपर विजय प्राप्त कर लेता है। यह मन्त्र महान् शान्ति प्रदान करनेवाला है।

अमृतेश्वरभगवान्‌की पूजामें आवाहन, स्थापन, रोधन (प्रतिष्ठा), संनिधान, निवेशन करनेके बाद पाद्य, आचमन, स्नान, अर्घ्य, माला, अनुलेपन, दीप, वस्त्र, आभूषण, नैवेद्य, पान, आचमन, वीजन (पंखेसे हवन करना), मुद्रा-प्रदर्शन, मन्त्र-जप, ध्यान, दक्षिणा, आहुति, स्तुति, वाद्य और गीत तथा नृत्य, न्यासयोग और प्रदक्षिणा, साष्टाङ्ग प्रणति, मन्त्रशय्या, वन्दन आदि उपचारोंको निवेदित करके उनका विसर्जन करना चाहिये।

षडङ्ग प्रकारका पूजन जिसे परमेश परमात्माने अपने मुखसे स्वयं कहा है, वह क्रमसे बतलाया गया है, उसे जो जानता है वही पूजक है। षडङ्ग-पूजा इस प्रकार है—

साधकको प्रारम्भमें अर्घ्य प्रदान करनेके लिये प्रयुक्त पात्रकी पूजा करके अस्त्र अर्थात् फट् मन्त्रसे हस्तताडन (दाहिने हाथके द्वारा बायें हाथपर ध्वनि) करना चाहिये। उसके बाद कवच (हुं) मन्त्रसे शोधनकर अमृतकरणकी क्रियाको पूर्ण करे। तत्पश्चात् आधारशक्ति आदिकी पूजा, प्राणायाम, आसनोपवेशन तथा देहशुद्धि करके भगवान् अमृतेशका ध्यान करना चाहिये। तदनन्तर अपनी आत्माको देवस्वरूपमें स्वीकारकर अङ्गन्यास, करन्यास करके साधक हृदयकमलमें स्थित ज्योतिर्मय आत्मदेवका पूजन करे।

उसके बाद मूर्तिपर अथवा यज्ञके लिये बनी

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