भारतकोश
गरुड़ पुराण

गरुड़ पुराण

Garuda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 508

४९८ | संक्षिप्त गरुडपुराण | [ धर्मकाण्ड-


हुए उस नरशार्दूलने खेल-ही-खेलमें उस वनको विक्षुब्ध कर दिया।

इसके बाद राजाने किसी एक मृगके कुक्षिभागमें बाणका प्रहार किया। आहत होकर भी वह मृग बड़ी तेजीसे दौड़ पड़ा। राजाने भी उस मृगका पीछा किया। अकेला अत्यधिक दूरी तय करनेके कारण थका हुआ भूख-प्याससे पीड़ित वह राजा उस वनको पार कर एक दूसरे घनघोर वनमें जा पहुँचा। अत्यन्त प्याससे क्षुब्ध होकर वह उस वनमें इधर-उधर जल खोजने लगा। हंस और सारस पक्षियोंके शब्दसे सूचित किये गये पूरचक्र नामक सरोवरपर जाकर उसने अश्वके साथ वहाँ स्नान किया। तदनन्तर उस सरोवरके लाल एवं नीले कमलोंके परागसे सुगन्धित शीतल जलको पीकर वह जलसे बाहर आया। मार्गमें अत्यधिक चलनेके कारण थके हुए राजाने उसी सरोवरके किनारे एक छायादार वटवृक्षको देखकर उसमें अपने घोड़ेको बाँध दिया। तत्पश्चात् आस्तरणको बिछाकर तथा ढालकी तकिया लगाकर क्षणभरमें ही शीतल मन्द वायुके सुखकी अनुभूति करता हुआ वह सो गया।

राजाके सोते ही वहाँ सौ प्रेतोंके साथ घूमता हुआ प्रेतवाहन नामक एक प्रेत आ पहुँचा। उसके शरीरमें मात्र अस्थि, चर्म और शिराएँ ही शेष थीं। वह खाने-पीनेको खोजता हुआ धैर्य नहीं धारण कर पा रहा था। आहट पाकर राजाकी नींद खुल गयी। पहले कभी न देखे गये उस दृश्यको देखकर राजाने शीघ्र ही अपने धनुषपर बाण चढ़ा लिया। अपने सामने राजाको देखकर वह प्रेत भी स्थाणुके सदृश खड़ा रहा। उसको अवस्थित देखकर राजाके मनमें कौतूहल हो उठा। उन्होंने प्रेतसे पूछा कि तुम कौन हो ? यहाँ कहाँसे आये हो ? तुम्हें यह विकृत शरीर कैसे प्राप्त हुआ है ?


प्रेतने कहा—हे महाबाहो ! आपके इस संयोगसे मैंने अपना प्रेतभाव त्याग दिया है। मुझे अब परमगति प्राप्त हो गयी है। मेरे समान धन्य अन्य कोई नहीं है।

बभ्रुवाहनने कहा—यह वन सर्वत्र अत्यन्त भयानक है। इसमें मैं यह क्या देख रहा हूँ ? हे पिशाच ! यहाँ यह वन भी आँधीके झोंकोंसे ग्रस्त है। यहाँ पतंग, मशक, मधुमक्खी, कबन्ध, शिरी, मत्स्य, कच्छप, गिरगिट, बिच्छू, भ्रमर, सर्प, अधोमुखी हवाएँ चलती हैं, बिजलीकी आग जलती है, वायुके झोंकोंसे इधर-उधर तिनके हिल-डुल रहे हैं। यहाँ नाना प्रकारके जीव-जन्तु, हाथी तथा टिड्डियोंके बहुत प्रकारके शब्द सुनायी पड़ रहे हैं, किंतु कहींपर भी कोई दिखायी नहीं दे रहा है। यह सब विकृत स्थिति देखकर मेरा हृदय काँप रहा है।

प्रेतने कहा—राजन् ! जिन प्राणियोंका अग्नि-संस्कार, श्राद्ध, तर्पण, षट्पिण्ड, दशगात्र, सपिण्डीकरण नहीं हुआ है, जो विश्वासघाती, मद्यपी और स्वर्णचोर रहे हैं, जो लोग अपमृत्युसे मरे हैं, जो ईर्ष्या करनेवाले हैं, जो अपने पापोंका प्रायश्चित्त नहीं करते हैं, जो गुरु आदिकी पत्नीके साथ गमन करते हैं, वे सभी प्राणी अपने कर्मोंके कारण भटकते हुए प्रेतरूपमें यहाँपर निवास करते हैं। इनको खान-पान बड़ा दुर्लभ है। ये अत्यधिक पीड़ित रहते हैं। हे राजन् ! कृपया आप इनका और्ध्वदैहिक संस्कार करें। जिनके माता-पिता, पुत्र और भाई-बन्धु नहीं हैं, उनका और्ध्वदैहिक संस्कार राजाको स्वयं करना चाहिये। राजा इससे अपने पारलौकिक शुभ कर्मको भी सम्पन्न कर सकता है और वह सभी दुःखोंसे विमुक्त हो जाता है। इस कर्मसे सम्मानित होकर राजा अपनी दुर्गति दूर कर सकता है। इस संसारमें कौन किसका भाई