गरुड़ पुराण
Garuda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रेतकल्प ] राजा बभ्रुवाहनकी कथा ४९९
है, कौन किसका पुत्र है और कौन किसकी स्त्री है, सभी स्वार्थके वशीभूत हैं। उनमें मनुष्यको विश्वास नहीं करना चाहिये; क्योंकि वह अपने कर्मोंका स्वयं ही भोग करता है। धन घरमें छूट जाता है, भाई-बन्धु श्मशानमें छूट जाते हैं, शरीर काष्ठको सौंप दिया जाता है। जीवके साथ पाप-पुण्य ही जाता है—
गृहेष्वर्था निवर्तन्ते श्मशाने चैव बान्धवाः॥
<div style="text-align: right;">(९।३६-३७)</div>
शरीरं काष्ठमादत्ते पापं पुण्यं सह व्रजेत्।
अतः राजन्! अपने कल्याणकी इच्छासे आप इस नश्वर शरीरसे अविलम्ब प्रेतोंका और्ध्वदैहिक कर्म सम्पन्न करें।
राजाने कहा—हे प्रेतराज! कृशकाय भयंकर नेत्रवाले तुम प्रेतके समान दिखायी देते हो। तुम प्रसन्न होकर अपना जैसा वृत्तान्त हो, वैसा सब कुछ मुझसे कहो। इस प्रकार पूछे जानेपर प्रेतने अपना सारा वृत्तान्त राजासे कहा।
प्रेतने कहा—हे नृपश्रेष्ठ! मैं प्रारम्भसे लेकर आजतकका सम्पूर्ण वृत्तान्त आपसे कह रहा हूँ। हे राजन्! सभी सम्पदाओंको सुखपूर्वक वहन करनेवाला, विभिन्न जनपदोंमें उत्पन्न नाना प्रकारके रत्नोंसे परिव्याप्त, अनेकानेक पुष्पोंसे सुशोभित वनप्रान्तवाला तथा विभिन्न पुण्यजनोंसे आवृत विदिशा नामक एक नगर था। सदैव देवाराधनमें अनुरक्त रहता हुआ मैं उसी नगरमें निवास करता था। मैं वैश्यजातिमें उत्पन्न हुआ था, उस जन्ममें सुदेव मेरा नाम था। मेरे द्वारा दिये गये 'हव्य'से देवता और 'कव्य'से पितृगण संतुष्ट रहते थे। मैंने नाना प्रकारके दान देकर ब्राह्मणोंको संतृप्त किया था। मेरा आहार-विहार सुनिश्चित था। दीन-हीन, अनाथ और विशिष्ट सत्पात्रोंको मैंने अनेक प्रकारसे सहायता पहुँचायी थी; किंतु दैवयोगसे वह सब निष्फल हो गया। मेरे न तो कोई संतान हुई, न कोई सगे बन्धु-बान्धव हैं और न वैसा कोई मित्र ही है, जो मेरा और्ध्वदैहिक कर्म कर सके। हे श्रेष्ठ राजन्! उसीसे मेरा यह प्रेतत्व स्थिर हो गया है।
हे भूपते! एकादशाह, त्रैपाक्षिक, षाण्मासिक, वार्षिक तथा जो मासिक श्राद्ध होते हैं, इन सभी श्राद्धोंकी कुल संख्या सोलह है। जिस मृतकके लिये इन श्राद्धोंका अनुष्ठान नहीं किया जाता है, उसका प्रेतत्व अन्य सैकड़ों श्राद्ध करनेपर भी स्थिर ही रहता है। हे महाराज! ऐसा जानकर आप मुझे इस प्रेतत्वसे मुक्ति प्रदान करायें। इस संसारमें राजा सभी वर्णोंका बन्धु कहा गया है। इसलिये आप मेरा निस्तार करें। हे राजेन्द्र! मैं आपको यह मणिरत्न दे रहा हूँ। जिस प्रकार मेरा कल्याण हो, मुझपर कृपा करके आप वैसा ही कार्य करें। मेरे निष्ठुर सपिण्डों और सगोत्रियोंने मेरे लिये वृषोत्सर्ग नहीं किया है, उसीसे मैं इस प्रेतयोनिको प्राप्त हुआ हूँ। भूख-प्याससे आक्रान्त मैं खाने-पीनेके लिये कुछ नहीं पा रहा हूँ। उसीसे मेरे शरीरमें यह विकृति आ गयी है। शरीर कृश हो गया है। इसमें मांसतक नहीं रह गया है। भूख-प्याससे उत्पन्न इस महान् दुःखको मैं बार-बार भोग रहा हूँ। वृषोत्सर्ग न करनेके कारण यह कष्टकारी प्रेतत्व मुझे प्राप्त हुआ है। हे राजन्! हे दयासिन्धो! इसीलिये मैं प्रेतत्वनिवृत्तिके निमित्त आपसे प्रार्थना कर रहा हूँ। आप मेरा कल्याण करें।
राजाने कहा—हे प्रेत! मेरे कुलका कोई प्रेत हुआ है, यह मनुष्य कैसे जान सकता है। प्राणी इस प्रेतत्वसे कैसे मुक्त हो सकता है? यह सब तुम मुझे बताओ।
प्रेतने कहा—हे राजन्! लिङ्ग (चिह्नविशेष) और पीड़ाके कारण प्रेतयोनिका अनुमान लगाना चाहिये। इस पृथ्वीपर प्रेतद्वारा उत्पन्न की गयी जो