गरुड़ पुराण
Garuda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रेतकल्प ] मरनेके समय तथा मृत्युके अनन्तर किये जानेवाले कर्म ५१७
दस दिनके पिण्डमें विधि<sup>१</sup>, मन्त्र, स्वधा, आवाहन और आशीर्वादका प्रयोग नहीं होता है, केवल नाम तथा गोत्रोच्चारपूर्वक पिण्डदान दिया जाता है। हे पक्षिन्! मृतकका दाह-संस्कार हो जानेके पश्चात् पुनः शरीर उत्पन्न होता है। पहले दिन जो पिण्डदान दिया जाता है, उससे मूर्धा, दूसरे दिनके पिण्डदानसे ग्रीवा और दोनों स्कन्ध, तीसरे दिनके पिण्डदानसे हृदय, चौथे दिनके पिण्डदानसे पृष्ठ, पाँचवें दिनके पिण्डदानसे नाभि, छठे दिनके पिण्डदानसे कटिप्रदेश, सातवें दिनके पिण्डदानसे गुह्यभाग, आठवें दिनके पिण्डदानसे ऊरु, नौवें दिनके पिण्डदानसे तालु-पैर और दसवें दिनके पिण्डदानसे क्षुधाकी उत्पत्ति होती है। जीवात्मा शरीर प्राप्त करनेके पश्चात् भूखसे पीड़ित हो करके घरके दरवाजेपर रहता है। दसवें दिन जो पिण्डदान होता है, उसको मृतकके प्रिय भोज्य-पदार्थसे बना करके देना चाहिये, क्योंकि शरीर-निर्माण हो जानेपर मृतकको अत्यधिक भूख लग जाती है, प्रिय भोज्य-पदार्थके अतिरिक्त अन्य किसी अन्नादिक पदार्थोंसे बने हुए पिण्डका दान देनेसे उसकी भूख दूर नहीं होती है।
एकादशाह और द्वादशाहके दिन प्रेत भोजन करता है। मरे हुए स्त्री-पुरुष दोनोंके लिये प्रेत शब्दका उच्चारण करना चाहिये। उन दिनों दीप, अन्न, जल, वस्त्र जो कुछ भी दिया जाता है, उसको प्रेत शब्दके द्वारा देना चाहिये, क्योंकि वह मृतकके लिये आनन्ददायक होता है<sup>२</sup>।
त्रयोदशाहको पिण्डज शरीर धारण करके भूख-प्याससे पीड़ित वह प्रेत यमदूतोंके द्वारा महापथपर लाया जाता है। जो प्रेत पापी होते हैं, उनका मार्ग शीत, ताप, शंकुके आकारका चुभनेवाला, मांस खानेवाले जन्तु तथा अग्निसे परिव्याप्त रहता है। जो सुकृती हैं उनका मार्ग सब प्रकारसे सौम्य है, उनको उस मार्गमें कोई कष्ट नहीं होता है। असिपत्रवनसे व्याप्त उस मार्गमें इतने दुःख हैं कि क्षुधा-प्याससे पीड़ित उस प्रेतको नित्य यमदूत अत्यधिक संत्रास देते हैं। प्रतिदिन वह प्रेत दो सौ सैंतालिस योजन चलता है। यमदूतोंके पाशसे बँधा, हा-हा करके विलाप करता हुआ वह प्रेत अपने घरको छोड़कर दिन और रात चलकर यमलोक पहुँचता है। उस महापथमें पड़नेवाले प्रसिद्ध पुरोंके शुभाशुभ भोग प्राप्त करते हुए वह यमलोकको जाता है। इस मार्गमें क्रमशः—याम्यपुर, सौरिपुर, नगेन्द्रभवन, गन्धर्वनगर, शैलागम, क्रौञ्चपुर, क्रूरपुर, विचित्रभवन, बह्वापद, दुःखद, नानाक्रन्दनपुर, सुतप्तभवन, रौद्रनगर, पयोवर्षण, शीताढ्य और बहुधर्म-भीतिभवन नामक प्रसिद्ध पुर हैं।
त्रयोदशाह अर्थात् तेरहवींके दिन यमदूत प्रेतको उस मार्गपर उसी प्रकारसे पकड़कर ले जाते हैं, जिस प्रकार मनुष्य बंदरको पकड़कर ले जाता है। उस प्रकारसे बँधा हुआ वह प्रेत चलते हुए नित्य 'हा पुत्र, हा पुत्र' का करुण विलाप करता है। वह कहता है कि मैंने किस प्रकारका कर्म किया है जो ऐसा कष्ट मैं भोग रहा हूँ। वह यह भी कहते हुए चलता है कि यह मनुष्य-योनि कैसे प्राप्त होती है। मैंने इसको व्यर्थमें गँवा दिया है। प्राणी इस मनुष्य-योनिको बहुत बड़े पुण्यसे प्राप्त करता है। उसको पाकर मैंने याचकोंको स्वार्जित धन दानमें नहीं दिया। आज वह भी पराधीन हो गया है। ऐसा कहकर वह गद्गद हो उठता है<sup>३</sup>। जब यमदूत
१-पार्वणादि श्राद्धोंमें निर्दिष्ट पिण्डदानविधि।
२-दीपमन्नं जलं वस्त्रं यत्किञ्चिद्वस्तु दीयते। प्रेतशब्देन तद्देयं मृतस्यानन्ददायकम्॥
३-मानुष्यं लभ्यते कस्मादिति ब्रूते प्रसर्पति। महता पुण्ययोगेन मानुष्यं जन्म लभ्यते॥
न तत् प्राप्य प्रदत्तं हि याचकेभ्यः स्वकं धनम्। पराधीनं तद्भवदिति ब्रूते (रौति) सगद्गदः॥