भारतकोश
गरुड़ पुराण

गरुड़ पुराण

Garuda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 528
५१८संक्षिप्त गरुडपुराण[ धर्मकाण्ड—

उसको अत्यधिक पीड़ित करते हैं तो वह बार-बार अपने पूर्व-शरीरजन्य कर्मोंका स्मरण करता हुआ इस प्रकार कहता है—

सुख-दुःखका दाता कोई दूसरा नहीं है। जो लोग सुख-दुःखका दाता दूसरेको समझते हैं, वे कुबुद्धि ही हैं। जीवात्मा सदैव पहले किये गये कर्मका भोग करता है। हे देही! तुमने जो कुछ किया है, उसमें निस्तार करो<sup></sup>। मैंने न दान दिया है, न अग्निमें आहुति डाली है, न हिमालय पर्वतकी गुफामें जाकर तपस्या ही की है और न तो गङ्गाके परम पवित्र जलका ही सेवन किया है। हे जीव! तुमने जो कुछ भी किया है, उसीका फल भोग करो। हे देही! पहले तुमने नित्य न दान दिया है, न गोदान किया है, न आह्निक कृत्य किया है, न तो वेदका दान किया, न शास्त्रको देखा और न शास्त्रबोधित मार्गका सेवन किया, इसलिये हे जीव! जैसा तुमने किया है, अब उसीमें अपना निस्तार करो। हे देही! तुमने जलरहित देशमें मनुष्य और पशु-पक्षियोंके लिये जलाशयका निर्माण नहीं करवाया है, न गायोंकी क्षुधा-शान्ति लिये गोचर-भूमि ही छोड़ी है। हे देही! जो कुछ किया है, अब उसका फल भोग करो<sup></sup>

हे पक्षिन्! पुरुष प्रेतके द्वारा कहे गये उक्त वचनोंको मैंने सुनाया। अब स्त्रीका शरीर लेकर देही पूर्व किये हुए कर्मोंके सम्बन्धमें जैसा कहता है, उसे सावधान होकर सुनो—‘हे देहिन्! मैंने पतिके साथ रहकर उन्हें सुख नहीं दिया है। उनके मरनेपर मैं उनके साथ चितामें भी नहीं प्रविष्ट हुई हूँ और न तो उनके मर जानेपर उस वैधव्य-व्रतका ही पालन किया है, अतएव जो कुछ नहीं किया है उसका फलभोग मैं कर रही हूँ। मैंने मासोपवास अथवा चान्द्रायणव्रतके नियमोंसे इस शरीरका शोधन भी नहीं किया है। हे जीव! स्त्रीका शरीर बहुत-से दुःखोंका पात्र है, पहले किये गये बुरे कर्मोंके अनुसार मैंने इसे प्राप्त किया और इसे भी व्यर्थ ही गँवा दिया। (अध्याय १५)


यममार्गके सोलह पुरोंका वर्णन

**श्रीभगवान्‌ने कहा—**हे खगेश! इस प्रकार करुण-क्रन्दन और विलाप करते हुए अत्यधिक दुःखित प्रेतको सत्रह दिनतक अकेले वायुमार्गमें ही यमदूतोंके द्वारा निर्दयतापूर्वक खींचा जाता है। अट्ठारहवाँ दिन-रात पूर्ण होनेपर पहले वह ‘याम्यपुर’ पहुँचता है। उस रमणीक नगरमें प्रेतोंके महान् गण रहते हैं। वहाँ पुष्पभद्रा नदी तथा देखनेमें सुन्दर लगनेवाला एक वटवृक्ष है। यमदूत वहाँ पहुँचकर उस प्रेतको विश्राम करनेका समय देते हैं। वहाँ प्रेत दुःखित होकर अपनी स्त्री और पुत्रादि सगे-सम्बन्धियोंसे प्राप्त होनेवाले सुखका स्मरण करता है। मार्गमें पड़नेवाले परिश्रमसे थका एवं भूख-प्याससे व्याकुल वह प्रेत वहाँ करुण विलाप करता है। उस समय वह धन, स्त्री, पुत्र, घर, सुख, नौकर और मित्रके विषयमें तथा अन्य सभीके विषयमें सोचता है। उस नगरमें भूख-प्याससे


<sup></sup>सुखस्य दुःखस्य न कोऽपि दाता परो ददातीति कुबुद्धिरेषा।
पुरा कृतं कर्म सदैव भुज्यते देहिन् क्वचिन्निस्तर यत् त्वया कृतम्॥ (१५।८९)
<sup></sup>मया न दत्तं न हुतं हुताशने तपो न तप्तं हिमशैलह्वरे। न सेवितं गाङ्गमहो महाजलं देहिन् क्वचिन्निस्तर यत् त्वया कृतम्॥
न नित्यदानं न गवाहिकं कृतं न वेददानं न च शास्त्रपुस्तकम्। पुरा न दृष्टं न च सेवितोऽध्वा देहिन् क्वचिन्निस्तर यत् त्वया कृतम्॥
जलाशयो नैव कृतो हि निर्जले मनुष्यहेतोः पशुपक्षिहेतवे। गोतृप्तिहेतोर्न कृतं हि गोचरं देहिन् क्वचिन्निस्तर यत् त्वया कृतम्॥
(१५।९०—९२)