भारतकोश
गरुड़ पुराण

गरुड़ पुराण

Garuda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished634 पृष्ठ

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पृष्ठ 529

प्रेतकल्प ] यममार्गके सोलह पुरोंका वर्णन ५१९


पीड़ित उस प्रेतको देखकर यमदूत कहते हैं।

यमदूतोंने कहा—'हे प्रेत! कहाँ धन है, कहाँ पुत्र है, कहाँ स्त्री है, कहाँ घर है और कहाँ तू इस प्रकारका दुःख झेल रहा है! चिरकालतक अब तू अपने कर्मोंसे अर्जित पापोंका भोग कर और इस महापथपर चल। हे परलोकके पथिक! तुम जानते हो कि राहगीरोंका बल पाथेयके वशमें है। निश्चित ही तुझे उस मार्गसे चलना होगा, जहाँ कुछ क्रय-विक्रय करना भी सम्भव नहीं है।'

हे पक्षिराज! यमदूतोंके द्वारा इस प्रकार कहे जानेके बाद वह यमदूतोंके द्वारा मुद्गरोंसे मारा जाता है। तत्पश्चात् स्नेहवश अथवा कृपा करके भूलोकमें पुत्रोंके हाथोंसे दिये गये मासिक पिण्डको वह खाता है। उसके बाद वहाँसे वह 'सौरिपुर' के लिये चल देता है। उस नगरमें कालरूपधारी जंगम नामका राजा है। उसको देखकर प्रेत भयभीत हो उठता है और विश्राम करना चाहता है। त्रैपाक्षिक श्राद्धमें दिये गये अन्न और जलका वह उसी नगरमें उपभोग करके दिन और रात चलकर सुन्दर बसे हुए 'नगेन्द्रभवन' नामक नगरकी ओर जाता है। उस महापथपर चलते हुए महाभयंकर वन देखकर वह करुण विलाप करता है। वहाँके कष्टोंसे दुःखित होकर वह बार-बार रोता है। दो मास बितानेके पश्चात् वह उस नगरमें पहुँचता है। यहाँ वह अपने बन्धु-बान्धवोंके द्वारा दिये गये अन्न और जलको खाता-पीता है। उसके बाद यमदूत पाशमें बाँधकर उसे दुःख देते हुए पुनः आगेकी ओर ले जाते हैं। तीसरे मासमें वह 'गन्धर्वनगर' पहुँच जाता है। तीसरे मासमें दिये गये श्राद्ध-पिण्डका यहाँ भक्षण करके चौथे मासमें वह 'शैलागम' नामक नगर पहुँचता है। यहाँ प्रेतके ऊपर पत्थरोंकी वर्षा होती है। वहाँ वह चौथे मासमें दिये गये श्राद्ध-पिण्डको खाकर संतुष्ट होता है। इसके बाद प्रेत पाँचवें मासमें 'क्रौञ्चपुर' जाता है। उस पुरमें पुत्रोंके द्वारा दिये गये पाँचवें मासके श्राद्धके पिण्डको खाता है। तदनन्तर छठे मासमें प्रेत 'क्रूरपुर' नामक नगरकी यात्रा करता है। उस पुरमें छठे मासमें पुत्रोंद्वारा दिये गये श्राद्ध-पिण्डको खाकर उसकी संतुष्टि होती है; किंतु आधे मुहूर्तभर विश्राम करनेके बाद उसका हृदय पुनः दुःखसे काँपने लगता है। यमदूतोंसे तर्जित होकर वह प्रेत उस पुरको लाँघकर 'विचित्रभवन' की ओर प्रस्थान करता है जहाँका राजा विचित्र है। यमराजका छोटा भाई सौरि ही यहाँके राज्यपर शासन करता है।

हे पक्षिराज! पाँच मास और पंद्रह दिनपर ऊनषाण्मासिक श्राद्ध होता है। अतः यमदूतोंके द्वारा संत्रस्त वह प्रेत उसी 'विचित्रभवन' में ऊनषाण्मासिक श्राद्ध-पिण्डका उपभोग करता है। मार्गमें बार-बार उसको भूख पीड़ा पहुँचाती है। अतः यमदूतोंके द्वारा रोके जानेपर भी वह उस मार्गमें विलाप करता है कि क्या कोई पुत्र या बान्धव है? जो मेरे मरनेपर शोक-सागरमें गिरते हुए मुझे सुखी नहीं कर रहा है? इसी समय वहाँपर उसके सामने हजारों मल्लाह आते हैं और कहते हैं कि 'सौ योजन विस्तृत मवाद और रक्तसे पूर्ण नाना प्रकारकी मछलियोंसे व्याप्त, नाना पक्षिगणोंसे आवृत महावैतरणी नदीको पार करनेकी इच्छा करनेवाले तुम्हें हम लोग सुखपूर्वक तारेंगे। किंतु हे पथिक! यदि उस मर्त्यलोकमें तुम्हारे द्वारा गोदान दिया गया है तो उस नावसे तुम पार जाओ।' मनुष्योंका अन्त समय आनेपर वैतरणी-गोदान ही हितकारी होता है। अतः शरीर स्वस्थ रहनेपर वैतरणी-व्रत करना चाहिये और वैतरणी नदीको पार करनेकी इच्छासे विद्वान् ब्राह्मणको गोदान करना चाहिये। वह पापीके समस्त पापोंको विनष्ट करके उसे विष्णुलोक ले जाता है। जिसने वैतरणी-दान नहीं किया है, वह प्रेत उसी नदीमें जाकर डूबने लगता है। डूबते हुए स्वयं अपनी