भारतकोश
गरुड़ पुराण

गरुड़ पुराण

Garuda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 530
५२०संक्षिप्त गरुडपुराण[ धर्मकाण्ड-

निन्दा करता हुआ कहता है कि 'मैंने पाथेय-हेतु ब्राह्मणको कुछ भी दान नहीं दिया है। न मैंने दान किया है, न तो मैंने अग्निमें आहुति दी है, न भगवन्नामका जप ही किया है, न तीर्थमें जाकर स्नान ही किया है और न भगवान्‌की स्तुति ही की है। हे मूर्ख ! जैसा कर्म तुमने किया है, अब वैसा ही भोग कर।' ऐसा कहनेके बाद यमदूतोंसे हृदयमें मारा जाता हुआ वह प्रेत उसी समय किंकर्तव्यविमूढ हो जाता है और वैतरणीके दूसरे तटपर दिये गये षाण्मासिक श्राद्धके घटादिक दान एवं पिण्डका भोजन करके आगेकी ओर बढ़ता है। अतः हे तार्क्ष्य ! षाण्मासिक श्राद्धपर सत्पात्र ब्राह्मणको विशेषरूपसे भोजन कराना चाहिये।

हे गरुड ! इसके बाद वह प्रेत एक दिन-रातमें दो सौ सैंतालीस योजनकी गतिसे चलता है। सातवाँ मास आनेपर वह 'बह्वापद' नामक पुरमें पहुँचता है। सप्तम मासिक श्राद्धमें जो कुछ दान दिया गया है, उसको खाकर आठवें मासकी समाप्तिपर उसकी यात्रा 'दुःखदपुर' तथा 'नानाक्रन्दनपुर'की ओर होती है। अत्यन्त दारुण क्रन्दन करते हुए नानाक्रन्दगणोंको देखकर वह प्रेत स्वयं शून्यहृदय एवं दुःखित होकर बहुत जोर-जोरसे रोने लगता है। वहाँ आठवें मासके श्राद्धको खाकर वह सुखी होता है। नगरको छोड़कर वह 'तप्तपुर' चला जाता है। 'सुतप्तभवन'में पहुँचकर प्रेत नवें मासके श्राद्धमें पुत्रके द्वारा किये गये पिण्डदान एवं कराये गये ब्राह्मण-भोजनको खाता है। दसवें मासमें वह 'रौद्रनगर' जाता है। वहाँ वह दसवें मासके श्राद्धका भोजन करके आगे स्थित 'पयोवर्षण' नामक पुरके लिये चल देता है। वहाँ पहुँचकर वह ग्यारहवें मासके श्राद्धका भोजन करता है। वहाँ मेघोंकी ऐसी जलवर्षा होती है, जिससे प्रेतको बहुत ही कष्ट होता है। तदनन्तर आगेकी ओर बढ़ता हुआ वह प्रेत अत्यन्त कड़कती हुई धूप और प्याससे व्यथित हो उठता है। बारहवें मासमें पुत्रने श्राद्धमें जो कुछ दान दिया है, उसका ही वह दुःखित प्रेत वहाँपर भोग करता है। इसके बाद वर्ष-समासिके कुछ दिन शेष रहनेपर अथवा ग्यारह मास पंद्रह दिन बीत जानेपर वह 'शीताढ्यपुर' जाता है, जहाँ प्राणियोंको अत्यन्त कष्ट देनेवाली ठंडक पड़ती है। वहाँकी ठंडीसे व्यथित, भूखसे व्याकुल वह प्रेत इस आशाभरी दृष्टिसे दसों दिशाओंको देखने लगता है कि 'क्या मेरा कोई बन्धु-बान्धव है जो मेरे इस दुःखको दूर कर दे ?' उस समय यमदूत उस प्रेतसे यह कहते हैं कि 'तेरा पुण्य वैसा कहाँ है, जो इस कष्टमें सहायता कर सके।' उनके उस वचनको सुनकर वह प्रेत 'हाय दैव!' ऐसा कहता है। निश्चित ही पूर्वजन्ममें किया गया पुण्य दैव है। उसको 'मैंने संचित नहीं किया है', ऐसा मन-ही-मन अनेक प्रकारसे विचार करके वह प्रेत पुनः धैर्यका सहारा लेता है।

इसके बाद वहाँसे चौवालीस योजन परिक्षेत्रमें फैला हुआ गन्धर्व और अप्सराओंसे परिव्याप्त अत्यन्त मनोरम 'बहुधर्मभीतिपुर' पड़ता है, जहाँ चौरासी लाख मूर्त एवं अमूर्त प्राणी निवास करते हैं। इस पुरमें तेरह प्रतीहार हैं, जो ब्रह्माजीके पुत्र हैं और श्रवण कहलाते हैं। वे प्राणियोंके शुभाशुभ कर्मका बार-बार विचार करके उसका वर्णन करते हैं। मनुष्य जो कहते और करते हैं, उन सभी बातोंको ये ही ब्रह्माजीके पुत्र श्रवणदेव चित्रगुप्त तथा यमराजसे बताते हैं। वे दूरसे ही सब कुछ सुनने और देखनेमें समर्थ हैं। इस प्रकारकी चेष्टावाले एवं स्वर्गलोक और भूलोक तथा पातालमें संचरण करनेवाले वे श्रवण आठ हैं। उन्हींके समान उनकी पृथक्-पृथक् श्रवणी नामक उग्र पत्नियाँ हैं। उनकी भी शक्ति वैसी ही है, जैसी उनके पतियोंकी है। वे मर्त्यलोकके अधिकारीके रूपमें हैं। व्रत, दान, स्तुतिसे जो उनकी पूजा करता है, उसके लिये वे सौम्य और सुखद मृत्यु देनेवाले हो जाते हैं। (अध्याय १६)