गरुड़ पुराण
Garuda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंकाण्ड ] पञ्चवक्त्र-पूजन तथा शिवार्चन-विधि ४७
तत्पश्चात् उसे मानसिक रूपसे कर्णेन्द्रियोंका स्पर्श करना चाहिये। उसके बाद भस्म-धारण और तर्पण आदि क्रियाओंको सम्पन्न करना चाहिये। ‘ॐ हां प्रपितामहेभ्यः स्वधा’, ‘ॐ हां मातामहेभ्यः स्वधा’ और ‘ॐ हां नमः सर्वमातृभ्यः स्वधा’ इन मन्त्रोंसे तर्पण करे। इसी रीतिसे पिता, पितामह, प्रमातामह तथा वृद्धप्रमातामह आदिका भी तर्पण करे और फिर प्राणायाम करना चाहिये।
इसके बाद आचमन तथा मार्जन करके साधकको शिवके गायत्रीमन्त्रका जप करना चाहिये। वह मन्त्र इस प्रकार है—
‘ॐ हां तन्महेशाय विद्महे, वाग्वि Greed शुद्धाय धीमहि, तन्नो रुद्रः प्रचोदयात्।’
अर्थात् प्रणवसे युक्त ‘हां’ बीजशक्तिसे सम्पन्न उन महेश्वरका हम सभी चिन्तन करते हैं। वाणीकी पवित्रताके लिये उनका हम ध्यान करते हैं। वे रुद्र हम सभीको सन्मार्गपर चलनेके लिये प्रेरणा प्रदान करें।
शिव-गायत्रीमन्त्र-जपके पश्चात् सूर्योपस्थान करके सूर्य-मन्त्रोंसे सूर्यरूप शिवकी पूजा करनी चाहिये। उन मन्त्रोंका स्वरूप इस प्रकार है—
‘ॐ हां हीं हूं हैं हौं हः शिवसूर्याय नमः।’ ‘ॐ हं खखोल्काय सूर्यमूर्तये नमः।’ ‘ॐ हां हीं सः सूर्याय नमः।’
—इस पूजाके बाद क्रमशः नामके आदि और अन्तमें ‘ॐ नमः’ शब्दका प्रयोग करके दण्डी तथा पिङ्गल आदि भूतनायकोंका स्मरण करे। तदनन्तर अग्नि आदि कोणोंमें ‘ॐ विमलायै नमः, ॐ ईशानायै नमः’—आदि मन्त्रोंसे क्रमशः विमला और ईशानादि शक्तियोंकी स्थापना करके पूजा करनी चाहिये। ऐसा करनेसे उपासकको परम सुखकी प्राप्ति होती है। [इन शक्तियोंकी पूजाके लिये पृथक्-पृथक् बीजमन्त्र निर्दिष्ट हैं।] यथा—
‘ॐ रां पद्मायै नमः’ (अग्निकोणमें), ‘रीं दीप्तायै नमः’ (नैर्ऋत्यकोणमें), ‘रूं सूक्ष्मायै नमः’(वायव्यकोणमें), ‘रैं जयायै नमः’ (ईशानकोणमें), ‘रैं भद्रायै नमः’ (पूर्व दिशामें), ‘रों विभूत्यै नमः’ (दक्षिण दिशामें), ‘रौं विमलायै नमः’ (पश्चिम दिशामें), ‘रं अमोधिकायै नमः’, ‘रं विद्युतायै नमः’ (उत्तर दिशामें) और ‘रं सर्वतोमुख्यै नमः’ (मण्डलके मध्यमें)। इसके बाद शिवस्वरूप सूर्यप्रतिमाको सूर्यासिन प्रदान करके ‘हां हूं (हीं) सः’ इस मन्त्रसे भगवान् सूर्यकी अर्चना करे और फिर निम्न मन्त्रोंसे न्यास करे—
‘ॐ आं हृदयाय नमः’, ‘ॐ भूर्भुवः स्वः शिरसे स्वाहा’, ‘ॐ भूर्भुवः स्वः शिखायै वौषट्’, ‘ॐ हूं ज्वालिन्यै नमः’, ‘ॐ हुं कवचाय हुम्’, ‘ॐ हूं अस्त्राय फट्’, ‘ॐ हं फट् राज्ञ्यै नमः’, ‘ॐ हं फट् दीक्षितायै नमः।’
साधकको अङ्गन्यासके पश्चात् निम्न मन्त्रोंसे सूर्यादि सभी नवग्रहोंकी मानसी पूजा करनी चाहिये—
‘ॐ सः सूर्याय नमः, ॐ सों सोमाय नमः, ॐ मं मंगलाय नमः, ॐ बुं बुधाय नमः, ॐ बृं बृहस्पतये नमः, ॐ भं भार्गवाय नमः, ॐ शं शनैश्चराय नमः, ॐ रं राहवे नमः, ॐ कं केतवे नमः, ॐ तेजश्चण्डाय नमः।’
इस प्रकार सूर्यदेव आदिकी पूजा करके साधकको आचमन करना चाहिये। उसके बाद वह कनिष्ठिका आदि अंगुलियोंमें करन्यास तथा पुनः निम्नाङ्कित मन्त्रोंसे अङ्गन्यास करे—
‘ॐ हां हृदयाय नमः, ॐ हीं शिरसे स्वाहा, ॐ हूं शिखायै वौषट्, ॐ हैं कवचाय हुम्, ॐ हौं नेत्रत्रयाय वौषट्, ॐ हः अस्त्राय फट्।’
तदनन्तर भूतशुद्धि करे तथा पुनः न्यास करे। अर्घ्यस्थापन करके उसी जलसे अपने शरीरका