गरुड़ पुराण
Garuda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें| ४८ | संक्षिप्त गरुडपुराण | [ आचार- |
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प्रोक्षण करना चाहिये। उसके बाद वह साधक शिवसहित नन्दी आदिकी पूजा करे। 'ॐ हौं शिवाय नमः' मन्त्रसे पद्ममें स्थित शिवकी पूजा करके नन्दी, महाकाल, गङ्गा, यमुना, सरस्वती, श्रीवत्स, वास्तुदेवता, ब्रह्मा, गणपति तथा गुरुकी पूजा करे।
तत्पश्चात् साधकको पद्मके मध्यमें शक्ति एवं अनन्त देवकी पूजा करके पूर्व दिशामें धर्म, दक्षिणमें ज्ञान, पश्चिममें वैराग्य, उत्तरमें ऐश्वर्य, अग्निकोणमें अधर्म, नैर्ऋत्यमें अज्ञान, वायव्यमें अवैराग्य, ईशानमें अनैश्वर्य, पद्मकी कर्णिकामें वामा और ज्येष्ठा उसके बाद पूर्व आदि दिशाओंमें रौद्री, काली, शिवा तथा असिता आदि शक्तियोंकी पूजा करनी चाहिये।
तदनन्तर साधकको शिवके आगे स्थित पीठके मध्यमें 'ॐ हौं कलविकरिण्यै नमः, ॐ हौं बलविकरिण्यै नमः, ॐ हौं बलप्रमथिन्यै नमः, ॐ सर्वभूतदमन्यै नमः, ॐ मनोन्मन्यै नमः'— इन मन्त्रोंसे कलविकरिणी एवं बलविकरिणी आदि शक्तियोंकी पूजा करनी चाहिये। साधक भगवान् शिवके लिये आसन प्रदानकर महामूर्तिकी स्थापना करे। तदनन्तर मूर्तिके मध्यमें शिवको उद्दिष्ट करके आवाहन-स्थापन-सन्निधान-सन्निरोध-सकलीकरण आदि मुद्रा दिखाये और अर्घ्य, पाद्य, आचमन, अभ्यङ्ग, उद्वर्तन तथा स्थानीय जल समर्पित करे एवं अरणि-मन्थन करके पूज्य देवको वस्त्र, गन्ध, पुष्प, दीप और नैवेद्यमें चरु समर्पित करे। नैवेद्यके अनन्तर आचमन दे करके मुखशुद्धिके लिये ताम्बूल, करोद्वर्तन, छत्र, चामर, पवित्रक (यज्ञोपवीत) प्रदानकर परमीकरण (अर्चनीय देवमें सर्वोत्कृष्टताका भाव) करे। तदनन्तर साधक आराध्यके साथ तदाकार होकर उनका जप करे तथा विनम्रभावसे स्तुतिकर उन्हें प्रणाम करे। इसी हृदयादिन्यास आदिके साथ पूर्ण की गयी पूजाको 'षडङ्गपूजा' यह नाम दिया गया है।
इस प्रकार शिवपूजन पूर्ण करनेके पश्चात् साधकको अग्नि आदि चतुर्दिक् कोणों, मध्यभाग तथा पूर्वादि दिशाओंमें अग्नि आदि दिग्देवताओं तथा इन्द्रादि दिक्पालोंकी पूजा करनी चाहिये। तदनन्तर उसको उन देवोंके मध्य स्थित चण्डेश्वरकी पूजाकर उनके लिये निर्माल्य समर्पित करना चाहिये। उसके बाद वह निम्नाङ्कित स्तुतिसे क्षमापन (क्षमा-याचना) करके उनका विसर्जन करे—
गुह्यातिगुह्यगोप्ता त्वं गृहाणास्मत्कृतं जपम्।
सिद्धिर्भवतु मे देव त्वत्प्रसादात् त्वयि स्थितिः॥
यत्किञ्चित् क्रियते कर्म सदा सुकृतदुष्कृतम्।
तन्मे शिवपदस्थस्य रुद्र क्षपय शङ्कर॥
शिवो दाता शिवो भोक्ता शिवः सर्वमिदं जगत्।
शिवो जयति सर्वत्र यः शिवः सोऽहमेव च॥
यत्कृतं यत् करिष्यामि तत् सर्वं सुकृतं तव।
त्वं त्राता विश्वनेता च नान्यो नाथोऽस्ति मे शिव॥
(२३। २६—२९)
हे प्रभो! आप गुह्य-से-गुह्य तत्त्वोंके संरक्षक हैं। आप मेरे किये हुए जपको स्वीकार करें। हे देव! मुझे सिद्धि प्राप्त हो। आपकी कृपासे आपमें मेरी निष्ठा बनी रहे। हे रुद्र! हे भगवान् शङ्कर! मेरे द्वारा सर्वदा पाप-पुण्यरूप जो कर्म किया जाता है, उसे आप नष्ट करें। मैं आपके इन कल्याणकारी चरणोंमें पड़ा हूँ। हे शिव! आप अपने भक्तोंको सर्वस्व देनेवाले हैं। आप ही भोक्ता हैं, हे शिव! यह दृश्यमान सम्पूर्ण जगत् भी तो आप ही हैं। हे शङ्कर! आपकी विजय हो। सर्वत्र जब शिव ही हैं तो मैं भी वही हूँ। जो कुछ मैंने किया है और जो कुछ भविष्यमें करूँगा, वह सब आपके द्वारा ही किया हुआ है। आप रक्षक हैं। आप विश्वनायक हैं। हे शिव! आपके अतिरिक्त मेरा कोई स्वामी नहीं है।