भारतकोश
गरुड़ पुराण

गरुड़ पुराण

Garuda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished634 पृष्ठ

पृष्ठ 59, कुल 634 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 59

काण्ड ] भगवती त्रिपुरा तथा गणेश आदि देवोंकी पूजा-विधि ४९


(हरिने पुनः कहा—हे रुद्र!) इसके बाद मैं शिवपूजाकी दूसरी विधि कह रहा हूँ—

इस विधिके अनुसार गणेश-सरस्वती-नन्दी-महाकाल-गङ्गा-यमुना, अस्त्र तथा वास्तुपतिदेवकी पूजा मण्डलके द्वारपर करनी चाहिये और साधक पूर्वादि दिशाओंमें इन्द्रादि सभी दिक्पालोंकी पूजा करे। उसके बाद कारणभूत समस्त तत्त्वोंकी पूजा करे।

उन तत्त्वोंमें 'पृथिवी, जल, तेज, वायु और आकाश'— ये पञ्चमहाभूत हैं। गन्ध, रस, रूप, स्पर्श तथा शब्द—ये उनकी पाँच तन्मात्राएँ हैं। वाक्, पाणि, पाद, पायु एवं उपस्थ—ये पाँच कर्मेन्द्रियाँ और श्रोत्र, त्वक्, चक्षु, जिह्वा तथा घ्राण—ये पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ हैं। इनके अतिरिक्त मन, बुद्धि, चित्त और अहंकार—ये अन्तःकरणचतुष्टय हैं। इनसे ऊपर 'पुरुष' की स्थिति है। इन्हीं (पुरुष)-को शिव कहा जाता है।

इन तत्त्वोंके साथ राग (गानशास्त्रीय रागविशेष), बुद्धि, विद्या, कला, काल, नियति, माया, शुद्धविद्या, ईश्वर और सदाशिव जो सबके मूल हैं, उनकी भी पूजा होनी चाहिये। इन समस्त तत्त्वोंमें जो शिव और शक्ति अर्थात् पुरुष एवं प्रकृतिका तत्त्व अनुस्यूत है, उसको जानकर ज्ञानी साधक जीवन्मुक्त होकर शिवरूप हो जाता है। इन तत्त्वोंमें जो शिवतत्त्व है, वही विष्णु है, वही ब्रह्मा है और वही ब्रह्मतत्त्व है।

भगवान् सदाशिवका मङ्गलमय ध्यानस्वरूप इस प्रकार है—वे देव पद्मासनपर विराजमान रहते हैं। उनका वर्ण शुक्ल है। सदैव सोलह वर्षकी आयुमें स्थित रहते हैं। वे पाँच मुखोंवाले हैं। उनके दसों हाथोंमें क्रमशः दक्षिणभागकी ओर अभयमुद्रा, प्रसादमुद्रा, शक्ति, शूल तथा खट्वाङ्ग और वामभागकी ओर सर्प, अक्षमाला, डमरू, नीलकमल तथा श्रेष्ठ बीजपूरक (बिजौरा नीबू) स्थित रहता है। इच्छा, ज्ञान और क्रिया नामक तीन शक्तियाँ उनके तीन नेत्र हैं। ऐसे वे देव सर्वदा कल्याणकी भावनामें अवस्थित रहते हैं, इसीलिये इन्हें सदाशिव कहा गया है।*

ऐसे मूर्तिमान् देवका चिन्तन करनेवाला साधक सदैव कालभयसे रहित रहता है। इस प्रकार शिवोपासना करनेवाले साधककी न तो अकालमृत्यु होती है और न शीत तथा उष्णादि कारणोंसे ही उसकी मृत्यु होती है। (अध्याय २१—२३)


भगवती त्रिपुरा तथा गणेश आदि देवोंकी पूजा-विधि

सूतजीने कहा—अब मैं गणेश आदि देवोंकी तथा त्रिपुरादेवीकी पूजाको कहूँगा, जो अपने भक्तोंको सर्वदा अभीष्ट प्रदान करनेवाली तथा श्रेष्ठ है। साधकको सबसे पहले गणपतिदेवके आसन एवं उनके मूर्तस्वरूपका पूजन करके न्यासपूर्वक उनकी पूजा करनी चाहिये। साधक 'गां' आदि बीजमन्त्रोंसे निम्न रीतिसे हृदयादिन्यास करे—

ॐ गां हृदयाय नमः, ॐ गीं शिरसे स्वाहा, ॐ गूं शिखायै वषट्, ॐ गैं कवचाय हुम्, ॐ गौं नेत्रत्रयाय वौषट्, ॐ गः अस्त्राय फट्।

इस न्यासके पश्चात् साधकको—'ॐ दुर्गायाः पादुकाभ्यां नमः', 'ॐ गुरुपादुकाभ्यां नमः'


* बद्धपद्मासनासीनः सितः षोडशवार्षिकः ॥
पञ्चवक्त्रः कराग्रैः स्वैर्दशभिश्चैव धारयन् । अभयं प्रसादं शक्तिं शूलं खट्वाङ्गमीश्वरः ॥
दक्षैः करैर्वामकैश्च भुजंगं चाक्षसूत्रकम् । डमरुकं नीलोत्पलं बीजपूरकमुत्तमम् ॥ (२३ । ५४–५६)