गरुड़ पुराण
Garuda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 61, कुल 634 में से
संदर्भ में पढ़ेंकाण्ड ] श्रीगोपालजीकी पूजा, त्रैलोक्यमोहन-मन्त्र ५१
प्रकारके विषोंका नाश करनेवाली हे देवि ! मेरे सर्वाङ्गमें फैले हुए विषको प्रभावहीन कर दे । उस विषको तुम देख रही हो । [उस काटनेवाले जन्तुको] सम्मोहित करो, सम्मोहित करो । हे देवि ! तुम मेरी रक्षा करो, रक्षा करो। इस प्रकार प्रार्थना एवं चिन्तन करके 'हूँ मां हूं फफफ ठः' इसका उच्चारण करे तथा 'स्कन्दकी मेखलारूपी बालग्रहों, शत्रुओं और विषोंका हरण करनेवाली हे शाला-माला ! नाना प्रकारके विषोंके वेगका हरण कर, हरण कर।' ऐसा उच्चारण करे और 'हां हां शवरि हुं' शवरि कहकर वेगपूर्ण गतिशीलोंमें अतिगतिशील सर्वत्र व्यापिनी मेघमालारूपिणी देवि ! मेरे सभी नागादि विषजन्तुओंसे उत्पन्न विषका हरण करो।
[इस प्रकार चिन्तन और प्रार्थना करते हुए रोगीके प्रति स्पर्शादि करते हुए मन्त्रपाठ करे।]
(अध्याय २७)
श्रीगोपालजीकी पूजा, त्रैलोक्यमोहन-मन्त्र तथा श्रीधर-पूजनविधि
श्रीसूतजीने कहा—हे ऋषियो! मैं भोग और मोक्ष प्रदान करनेवाली श्रीगोपालजी तथा भगवान् श्रीधर विष्णुकी पूजाका वर्णन कर रहा हूँ, इसे सुनें। पूजा प्रारम्भ करनेसे पहले पूजा-मण्डलके द्वारदेशमें गङ्गा और यमुनाके साथ धाता और विधाताकी, श्रीके साथ शङ्ख, पद्मनिधि एवं शार्ङ्गधनुष और शरभकी पूजा करनी चाहिये तथा पूर्व दिशामें भद्र और सुभद्रकी, दक्षिण दिशामें चण्ड और प्रचण्डकी, पश्चिम दिशामें बल और प्रबलकी, उत्तर दिशामें जय और विजयकी तथा चारों दरवाजोंपर श्री, गण, दुर्गा और सरस्वतीकी पूजा करनी चाहिये।
मण्डलके अग्नि आदि कोणोंमें और दिशाओंमें परम भागवत नारद, सिद्ध तथा गुरुका एवं नल-कूबरका पूजन करे। पूर्व दिशामें विष्णु, विष्णुतपा तथा विष्णुशक्तिकी अर्चना करे। इसके बाद विष्णुके परिवारकी अर्चना करे। मण्डलके मध्यमें शक्तिकी और कूर्म, अनन्त, पृथ्वी, धर्म, ज्ञान तथा वैराग्यकी अग्नि आदि कोणोंमें पूजा करे। वायव्य-कोणके साथ उत्तर दिशामें प्रकाशात्मक एवं ऐश्वर्यकी पूजा करे। 'गोपीजनवल्लभाय स्वाहा'—यह गोपालमन्त्र है। मण्डलकी पूर्व दिशासे आरम्भ करके क्रमशः आठों दिशाओंमें जाम्बवती और सुशीलाके साथ रुक्मिणी, सत्यभामा, सुनन्दा, नाग्रजिती, लक्ष्मणा और मित्रविन्दाकी पूजा करनी चाहिये।
साथ ही श्रीगोपालके शङ्ख, चक्र, गदा, पद्म, मुसल, खड्ग, पाश, अङ्कुश, श्रीवत्स, कौस्तुभ, मुकुट, वनमाला, इन्द्रादि ध्वजवाहक दिक्पाल, कुमुदादिगण और विष्वक्सेनका पूजन करके श्रीलक्ष्मीसहित कृष्णकी भी अर्चना करनी चाहिये।
गोपीजनवल्लभके मन्त्र जपनेसे तथा उनका ध्यान करनेसे एवं उनकी (साङ्गोपाङ्ग) पूजा करनेसे साधक सभी कामनाओंको पूर्ण कर लेता है।
त्रैलोक्यमोहन श्रीधरके मन्त्र इस प्रकार हैं—
'ॐ श्रीं (श्रीः) श्रीधराय त्रैलोक्यमोहनाय नमः। क्लीं पुरुषोत्तमाय त्रैलोक्यमोहनाय नमः। ॐ विष्णवे त्रैलोक्यमोहनाय नमः। ॐ श्रीं ह्रीं क्लीं त्रैलोक्यमोहनाय विष्णवे नमः।
—ये मन्त्र समस्त प्रयोजनोंको पूर्ण करनेवाले हैं।
श्रीसूतजी पुनः बोले— अब मैं श्रीधरभगवान् (विष्णु)-की मङ्गलमयी पूजाका वर्णन करता हूँ।