गरुड़ पुराण
Garuda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें| ५२ | संक्षिप्त गरुडपुराण | [ आचार- |
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साधकको सर्वप्रथम ‘ॐ श्रां हृदयाय नमः, ॐ श्रीं शिरसे स्वाहा, ॐ श्रूं शिखायै वषट्, ॐ श्रैं कवचाय हुम्, ॐ श्रौं नेत्रत्रयाय वौषट्, ॐ श्रः अस्त्राय फट्’—इन मन्त्रोंसे अङ्गन्यास और करन्यास करना चाहिये। तदनन्तर भगवान्को शङ्ख, चक्र, गदास्वरूपिणी मुद्रा प्रदर्शितकर शङ्ख, चक्र तथा गदा-पद्मसे सुशोभित आत्मस्वरूप श्रीधर-भगवान् पुरुषोत्तमका ध्यान करना चाहिये। तत्पश्चात् स्वस्तिक या सर्वतोभद्र-मण्डलमें श्रीधरदेवकी पूजा करनी चाहिये।
सर्वप्रथम शार्ङ्गधनुष धारण करनेवाले देवाधिदेव भगवान् विष्णुके आसनकी पूजा करनी चाहिये।
‘ॐ श्रीधरासनदेवता आगच्छत’ इस मन्त्रसे आवाहन करके ‘ॐ समस्तपरिवारायाच्युतासनाय नमः’, ‘ॐ धात्रे नमः’, ‘ॐ विधात्रे नमः’, ‘ॐ गङ्गायै नमः’, ‘ॐ यमुनायै नमः’, ‘ॐ आधारशक्त्यै नमः’, ‘ॐ कूर्माय नमः’, ‘ॐ अनन्ताय नमः’, ‘ॐ पृथिव्यै नमः’, ‘ॐ धर्माय नमः’, ‘ॐ ज्ञानाय नमः’, ‘ॐ वैराग्याय नमः’, ‘ॐ ऐश्वर्याय नमः’, ‘ॐ अधर्माय नमः’, ‘ॐ अज्ञानाय नमः’, ‘ॐ अवैराग्याय नमः’, ‘ॐ अनैश्वर्याय नमः’, ‘ॐ कन्दाय नमः’, ‘ॐ नालाय नमः’, ‘ॐ पद्माय नमः’, ‘ॐ विमलायै नमः’, ‘ॐ उत्कर्षिण्यै नमः’, ‘ॐ ज्ञानायै नमः’, ‘ॐ क्रियायै नमः’, ‘ॐ योगायै नमः’, ‘ॐ प्रह्व्यै नमः’, ‘ॐ सत्यायै नमः’, ‘ॐ ईशानायै नमः’, ‘ॐ अनुग्रहायै नमः’—इन मन्त्रोंसे श्रीधरके आसनका पूजन करके (हे रुद्र!) पूर्वोक्त धाता, विधाता, गङ्गा आदि देवोंकी पूजा करनी चाहिये। तदनन्तर हरिका आवाहन करके पूजन करे। उसके बाद ‘ॐ ह्रीं श्रीधराय त्रैलोक्यमोहनाय विष्णवे नमः आगच्छ।’—इस मन्त्रसे श्रीधरदेवका आवाहन तथा पूजन करना चाहिये।
इस पूजाके पश्चात् ‘ॐ श्रियै नमः’—इस मन्त्रसे लक्ष्मीका पूजन करना चाहिये। ‘ॐ श्रां हृदयाय नमः’ ‘ॐ श्रीं शिरसे नमः’, ‘ॐ श्रूं शिखायै नमः’, ‘ॐ श्रैं कवचाय नमः’, ‘ॐ श्रौं नेत्रत्रयाय नमः’, ‘ॐ श्रः अस्त्राय नमः’, ‘ॐ शङ्खाय नमः’, ‘ॐ पद्माय नमः’, ‘ॐ चक्राय नमः’, ‘ॐ गदायै नमः’, ‘ॐ श्रीवत्साय नमः’, ‘ॐ कौस्तुभाय नमः’, ‘ॐ वनमालायै नमः’, ‘ॐ पीताम्बराय नमः’, ‘ॐ ब्रह्मणे नमः’, ‘ॐ नारदाय नमः’, ‘ॐ गुरुभ्यो नमः’, ‘ॐ इन्द्राय नमः’, ‘ॐ अग्नये नमः’, ‘ॐ यमाय नमः’, ‘ॐ निर्ऋतये नमः’, ‘ॐ वरुणाय नमः’, ‘ॐ वायवे नमः’, ‘ॐ सोमाय नमः’, ‘ॐ ईशानाय नमः’, ‘ॐ अनन्ताय नमः’, ‘ॐ ब्रह्मणे नमः’, ‘ॐ सत्त्वाय नमः’, ‘ॐ रजसे नमः’, ‘ॐ तमसे नमः’, ‘ॐ विष्वक्सेनाय नमः’—इत्यादि मन्त्रोंसे षडङ्गन्यास, अस्त्र-पूजा तथा उक्त देव-परिवारकी पूजा करनी चाहिये।
तदनन्तर सपरिकर भगवान् विष्णुका अभिषेक करके वस्त्र, यज्ञोपवीत, गन्ध, पुष्प, धूप, दीप तथा नैवेद्य निवेदित करके प्रदक्षिणा करे। मूल मन्त्रका जप १०८ बार करे और किया हुआ जप अभीष्ट देव भगवान् श्रीधरको समर्पित कर दे।
तत्पश्चात् विद्वान् साधकको चाहिये कि मुहूर्तभर अपने हृदयदेशमें स्थित विशुद्ध स्फटिक मणिके समान कान्तिमान्, करोड़ों सूर्यके सदृश प्रभाववाले, प्रसन्नमुख, सौम्य मुद्रावाले, चमचमाते हुए धवल-मकराकृति-कुण्डलोंसे सुशोभित, सिरपर मुकुटको धारण किये हुए, शुभलक्षणसम्पन्न अङ्गोंवाले तथा वनमालासे अलंकृत परब्रह्मस्वरूप श्रीधरदेवका ध्यान करे।
उसके बाद इन स्तोत्रोंसे भगवान्की स्तुति करनी चाहिये—