गरुड़ पुराण
Garuda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 63, कुल 634 में से
संदर्भ में पढ़ेंकाण्ड ] श्रीगोपालजीकी पूजा, त्रैलोक्यमोहन-मन्त्र ५३
श्रीनिवासाय देवाय नमः श्रीपतये नमः।
श्रीधराय सशार्ङ्ग्याय श्रीप्रदाय नमो नमः॥
श्रीवल्लभाय शान्ताय श्रीमते च नमो नमः।
श्रीपर्वतनिवासाय नमः श्रेयस्कराय च॥
श्रेयसां पतये चैव ह्याश्रयाय नमो नमः।
नमः श्रेयःस्वरूपाय श्रीकराय नमो नमः॥
शरण्याय वरेण्याय नमो भूयो नमो नमः।
स्तोत्रं कृत्वा नमस्कृत्य देवदेवं विसर्जयेत्॥
इति रुद्र समाख्याता पूजा विष्णोर्महात्मनः।
यः करोति महाभक्त्या स याति परमं पदम्॥
(३०। १५-१९)
हे देव! आप लक्ष्मीनिवार और श्रीपति हैं, आपको मेरा नमस्कार है। आप श्रीधर हैं, शार्ङ्गपाणि हैं एवं साधकको लक्ष्मी प्रदान करनेवाले हैं, आपको मेरा नमस्कार है। आप ही श्रीवल्लभ, शान्तिस्वरूप तथा ऐश्वर्यसम्पन्न देव हैं, आपको मेरा प्रणाम है।
आप श्रीपर्वतपर निवास करनेवाले हैं, समस्त मङ्गलोंके स्वामी, सर्वकल्याणकर्ता तथा सर्वमङ्गलाधार हैं, आपको मेरा बार-बार नमस्कार है। आप कल्याण और ऐश्वर्य प्रदान करनेवाले हैं, आपको मेरा नमन है। आप शरण देनेवाले तथा सर्वश्रेष्ठ हैं, आपको बारम्बार प्रणाम है।
इस प्रकार देवाधिदेव श्रीधर भगवान् विष्णुका स्तवन और नमन करके उनका विसर्जन करना चाहिये। भक्तिपूर्वक इस पूजाको करनेवाला परमपदको प्राप्त करता है। जो विष्णुपूजाको प्रकाशित करनेवाले इस अध्यायका पाठ करता है, वह इस लोकमें समस्त पापोंसे मुक्त होकर अन्तमें विष्णुके परमपदको प्राप्त करता है।
रुद्रने कहा— हे प्रभो! हे जगत्के स्वामी! पुनः उस प्रकारकी पूजा-विधिको बतानेकी कृपा करें, जिसके द्वारा इस अत्यन्त दुस्तर भवसागरको पार किया जा सकता है।
श्रीहरि बोले— हे वृषभध्वज! मैं विष्णुदेवके पूजन-विधानको कह रहा हूँ। हे महाभाग! उस भोग और मोक्षको देनेवाले कल्याणकारी पूजनके विषयमें सुनें।
हे रुद्र! सर्वप्रथम मनुष्यको स्नान करना चाहिये। तदनन्तर संध्यासे निवृत्त होकर यज्ञमण्डपमें प्रवेश करना चाहिये। हाथ-पैरका प्रक्षालनकर विधिवत् आचमन करके न्यासविधिके अनुसार दोनों हाथोंके द्वारा व्यापक रूपमें मूलमन्त्रका करन्यास करना चाहिये। हे रुद्र! उन विष्णु-देवके मूलमन्त्रको कह रहा हूँ, आप सुनें—
'ॐ श्रीं ह्रीं श्रीधराय विष्णवे नमः।'
—यह मन्त्र देवाधिदेव परमेश्वर विष्णुका वाचक है। यह समस्त रोगोंको हरण करनेवाला तथा सभी ग्रहोंका शमनकर्ता है। यह सर्वपापविनाशक और भुक्ति-मुक्ति प्रदायक है।
साधकको इन मन्त्रोंके द्वारा अङ्गन्यास करना चाहिये—
'ॐ हां हृदयाय नमः, ॐ हीं शिरसे स्वाहा, ॐ हूं शिखायै वषट्, ॐ हैं कवचाय हुम्, ॐ हौं नेत्रत्रयाय वौषट्, ॐ हः अस्त्राय फट्।'
आत्मसंयमी साधकको चाहिये कि वह अङ्गन्यास करके आत्ममुद्रा प्रदर्शित करे। तदनन्तर हृदयगुहामें विराजमान शङ्ख-चक्रसे युक्त, कुन्द-पुष्प और चन्द्रमाके समान शुभ्र कान्तिवाले, श्रीवत्स और कौस्तुभमणिसे समन्वित, वनमाला तथा रत्नहार धारण किये हुए परमेश्वर भगवान् विष्णुका ध्यान करे।
तदनन्तर 'विष्णुमण्डलमें अवस्थित होनेवाले आप सभी देवगणों, पार्षदों तथा शक्तियोंका मैं आवाहन करता हूँ, यहाँपर आप सब पधारें'—ऐसा कहकर—