गरुड़ पुराण
Garuda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें५४ संक्षिप्त गरुडपुराण [ आचार-
'ॐ समस्तपरिवारायाच्युताय नमः, ॐ धात्रे नमः, ॐ विधात्रे नमः, ॐ गङ्गायै नमः, ॐ यमुनायै नमः, ॐ शङ्खनिधये नमः, ॐ पद्मनिधये नमः, ॐ चण्डाय नमः, ॐ प्रचण्डाय नमः, ॐ द्वारश्रियै नमः, ॐ आधारशक्त्यै नमः, ॐ कूर्माय नमः, ॐ अनन्ताय नमः, ॐ श्रियै नमः, ॐ धर्माय नमः, ॐ ज्ञानाय नमः, ॐ वैराग्याय नमः, ॐ ऐश्वर्याय नमः, ॐ अधर्माय नमः, ॐ अज्ञानाय नमः, ॐ अवैराग्याय नमः, ॐ अनैश्वर्याय नमः, ॐ सं सत्त्वाय नमः, ॐ रं रजसे नमः, ॐ तं तमसे नमः, ॐ कं कन्दाय नमः, ॐ नं नालाय नमः, ॐ लां पद्माय नमः, ॐ अं अर्कमण्डलाय नमः, ॐ सों सोममण्डलाय नमः, ॐ वं वह्निमण्डलाय नमः, ॐ विमलायै नमः, ॐ उत्कर्षिण्यै नमः, ॐ ज्ञानायै नमः, ॐ क्रियायै नमः, ॐ योगायै नमः, ॐ प्रह्व्यै नमः, ॐ सत्यायै नमः, ॐ ईशानायै नमः, ॐ अनुग्रहायै नमः—इन नाममन्त्रोंसे गन्ध-पुष्पादि उपचारोंके द्वारा धाता, विधाता, गङ्गा, यमुना आदि देवताओंका नमस्कारपूर्वक पूजन करना चाहिये।
तदनन्तर हे रुद्र! सृष्टि तथा संहार करनेवाले, सभी पापोंको दूर करनेवाले परमेश्वर भगवान् विष्णुका मण्डलमें आवाहन करके इस विधिसे उनका पूजन करना चाहिये।
जिस प्रकार सर्वप्रथम अपने शरीरमें न्यास किया जाता है, उसी प्रकार प्रतिमामें भी सर्वप्रथम न्यास करना चाहिये। तत्पश्चात् मुद्राका प्रदर्शनकर अर्घ्य-पाद्यादि उपचारोंको अर्पण करना चाहिये। उसके बाद स्नान, वस्त्र, आचमन, गन्ध, पुष्प, धूप, दीप तथा नैवेद्यरूपमें चरु अर्पित करके उन देवकी प्रदक्षिणा करनी चाहिये। तदनन्तर उनके मन्त्रका जप करके इस जप-पूजनको उन्हें ही समर्पित कर देना चाहिये।
हे वृषभध्वज! उन श्रीधरदेवकी पूजा उनके मूल मन्त्रसे करनी चाहिये। हे त्रिनेत्र! इस समय मैं उन मन्त्रोंको भी कह रहा हूँ, जिनसे न्यास तथा विष्णुके परिवार, दिग्देवता और आयुध आदिकी पूजा करनी चाहिये। उन्हें आप सुनें—
ॐ हां हृदयाय नमः, ॐ हीं शिरसे नमः, ॐ हूं शिखायै नमः, ॐ हैं कवचाय नमः, ॐ हौं नेत्रत्रयाय नमः, ॐ हः अस्त्राय नमः, ॐ श्रियै नमः, ॐ शङ्खाय नमः, ॐ पद्माय नमः, ॐ चक्राय नमः, ॐ गदायै नमः, ॐ श्रीवत्साय नमः, ॐ कौस्तुभाय नमः, ॐ वनमालायै नमः, ॐ पीताम्बराय नमः, ॐ खड्गाय नमः, ॐ मुसलाय नमः, ॐ पाशाय नमः, ॐ अङ्कुशाय नमः, ॐ शार्ङ्गाय नमः, ॐ शराय नमः, ॐ ब्रह्मणे नमः, ॐ नारदाय नमः, ॐ पूर्वसिद्धेभ्यो नमः, ॐ भागवतेभ्यो नमः, ॐ गुरुभ्यो नमः, ॐ परमगुरुभ्यो नमः, ॐ इन्द्राय सुराधिपतये सवाहनपरिवाराय नमः, ॐ अग्नये तेजोऽधिपतये सवाहनपरिवाराय नमः, ॐ यमाय प्रेताधिपतये सवाहनपरिवाराय नमः, ॐ निर्ऋतये रक्षोऽधिपतये सवाहनपरिवाराय नमः, ॐ वरुणाय जलाधिपतये सवाहनपरिवाराय नमः, ॐ वायवे प्राणाधिपतये सवाहनपरिवाराय नमः, ॐ सोमाय नक्षत्राधिपतये सवाहनपरिवाराय नमः, ॐ ईशानाय विद्याधिपतये सवाहनपरिवाराय नमः, ॐ अनन्ताय नागाधिपतये सवाहनपरिवाराय नमः, ॐ ब्रह्मणे लोकाधिपतये सवाहनपरिवाराय नमः, ॐ वज्राय हुं फट् नमः, ॐ शक्त्यै हुं फट् नमः, ॐ दण्डाय हुं फट् नमः, ॐ खड्गाय हुं फट् नमः, ॐ पाशाय हुं फट् नमः, ॐ ध्वजाय हुं फट् नमः, ॐ गदायै हुं फट् नमः, ॐ त्रिशूलाय हुं फट् नमः, ॐ चक्राय हुं फट् नमः, ॐ पद्माय हुं फट् नमः, तथा ॐ वौं विष्वक्सेनाय नमः।