भारतकोश
गरुड़ पुराण

गरुड़ पुराण

Garuda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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काण्ड ] पञ्चतत्त्वार्चन-विधि ५५


हे महादेव! इस प्रकार इन मन्त्रोंसे अधिकारी मनुष्योंको चाहिये कि वे विष्णुके विभिन्न अङ्गोंकी पूजा करें, तदनन्तर ब्रह्मस्वरूप भगवान् विष्णुका पूजन करके इस स्तुतिसे उन अविनाशी परमात्म प्रभुका स्तवन करें—

विष्णवे देवदेवाय नमो वै प्रभविष्णवे॥
विष्णवे वासुदेवाय नमः स्थितिकराय च।
ग्रसिष्णवे नमश्चैव नमः प्रलयशायिने॥
देवानां प्रभवे चैव यज्ञानां प्रभवे नमः।
मुनीनां प्रभवे नित्यं यक्षाणां प्रभविष्णवे॥
जिष्णवे सर्वदेवानां सर्वगाय महात्मने।
ब्रह्मेन्द्ररुद्रवन्द्याय सर्वेशाय नमो नमः॥
सर्वलोकहितार्थाय लोकाध्यक्षाय वै नमः।
सर्वगोप्त्रे सर्वकर्त्रे सर्वदुष्टविनाशिने॥
वरप्रदाय शान्ताय वरेण्याय नमो नमः।
शरण्याय सुरूपाय धर्मकामार्थदायिने॥
(३१।२४–२९)

देवाधिदेव, तेजोमूर्ति भगवान् विष्णुदेवके लिये नमस्कार है। संसारकी स्थिति (पालन) करनेवाले वासुदेव विष्णुके लिये नमन है। प्रलयके समय संसारको अपने मूल कारण प्रकृतिमें लीन करके आत्मसात्कर शयन करनेवाले विष्णुको प्रणाम है। देवोंके अधिपति तथा यज्ञोंके अधिपति विष्णुको नमन है। मुनियों तथा यक्षोंके प्रभु और समस्त देवोंपर विजय प्राप्त करनेवाले, सबमें व्याप्त रहनेवाले, महात्मा, ब्रह्मा, इन्द्र-रुद्रादिके वन्दनीय सर्वेश्वर भगवान् विष्णुके लिये नमस्कार है।

समस्त लोकोंका कल्याण करनेवाले, लोकाध्यक्ष, सर्वगोसा, सर्वकर्ता तथा समस्त दुष्टोंके विनाशक भगवान् विष्णुके लिये नमन है। वर प्रदान करनेवाले, परम शान्त, सर्वश्रेष्ठ, शरणागतकी रक्षा करनेवाले, सुन्दर रूपवाले, धर्म-काम तथा अर्थ—इस त्रिवर्गके प्रदाता भगवान् विष्णुके लिये बार-बार प्रणाम है।

हे शङ्कर! इस प्रकार ब्रह्मस्वरूप, अव्यय, परात्पर भगवान् विष्णुकी स्तुति करके अपने हृदयमें उनका ध्यान करना चाहिये। तत्पश्चात् मूल मन्त्रसे उन विष्णुकी पूजा करनी चाहिये और मूल मन्त्रका जप करना चाहिये। जो अधिकारी व्यक्ति ऐसा करता है, वह भगवान् विष्णुको प्राप्त कर लेता है। हे रुद्र! इस प्रकार मैंने आपसे इस रहस्यपूर्ण, परम गुह्य, भुक्ति-मुक्तिप्रद और उत्तम विष्णुकी पूजाविधिको कहा है। हे शङ्कर! जो विद्वान् पुरुष इसका पाठ करता है, वह विष्णुभक्त हो जाता है। इसे जो सुनता है अथवा सुनाता है, वह विष्णुलोकको प्राप्त करता है। (अध्याय २८–३१)


पञ्चतत्त्वार्चन-विधि

महेश्वरने कहा— हे शङ्ख-चक्र-गदाधर! आप पञ्चतत्त्वोंकी उस पूजा-विधिको मुझे बतानेकी कृपा करें, जिसका ज्ञान प्राप्त कर लेनेमात्रसे ही मनुष्य परमपदको प्राप्त कर लेता है।

श्रीहरिने कहा— हे सुव्रत शिव! मैं आपसे पञ्चतत्त्व-पूजा-विधिको कह रहा हूँ, यह दिव्य, मङ्गलस्वरूप, कल्याणकारी, रहस्यपूर्ण, श्रेष्ठ तथा अभीष्टोंकी सिद्धि करनेवाली है। हे महादेव! ऐसे उस परम पवित्र कलिदोष-विनाशक पूजन-विधिका आप श्रवण करें।

हे सदाशिव! एक ही परमात्मा जो वासुदेव श्रीहरि हैं, वे ही अविनाशी, शान्त, सनातन, सत्-स्वरूप हैं। वे ध्रुव (नित्य, अचल), शुद्ध, सर्वव्याप्त तथा निरञ्जन हैं। वे ही विष्णुदेव अपनी मायाके प्रभावसे पाँच प्रकारसे अवस्थित हैं। वे जगत्का कल्याण करनेवाले हैं। वे ही अद्वितीय विष्णु