गरुड़ पुराण
Garuda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 613, कुल 634 में से
संदर्भ में पढ़ेंॐ श्रीपरमात्मने नमः
[ ब्रह्मकाण्ड¹ ]
भगवान् श्रीहरिकी महिमा तथा उनके सर्वेश्वरत्वका प्रतिपादन, श्रीहरिको श्रीमद्भागवत, विष्णु तथा गरुड—ये तीन पुराण विशेष प्रिय हैं, इनका निरूपण तथा गरुडपुराणका माहात्म्य
प्राचीन समयकी बात है जगत्के नेत्रस्वरूप उन परब्रह्म श्रीहरिका स्तवन करते हुए सभी शास्त्रोंके तत्त्वज्ञ शौनक आदि ब्रह्मवादी ऋषिगण नैमिष नामक महापुण्य-क्षेत्रमें उत्तम तपस्यामें संलग्न थे। वे सभी जितेन्द्रिय, भूख-प्यासको जीत लेनेवाले, सत्यपरायण तथा संत थे। वे विशिष्ट भक्तिके साथ समस्त संसारको ज्ञान प्रदान करनेवाले भगवान् विष्णुकी निरन्तर पूजा करते थे। वहाँ कोई यज्ञोंके द्वारा यज्ञपतिकी, कोई ज्ञानके द्वारा ज्ञानात्मक परब्रह्मकी और कुछ ऋषिगण परम भक्तिके द्वारा नारायणकी पूजामें लगे रहते थे।
एक बारकी बात है धर्म, अर्थ, काम तथा मोक्ष—इन चार पुरुषार्थोंकी प्राप्तिका उपाय जाननेकी इच्छासे वे महात्मागण एक स्थानपर एकत्र हुए। ऊर्ध्वरेता वे मुनिगण संख्यामें छब्बीस हजार थे एवं उनके शिष्य-प्रशिष्योंकी संख्या तो बहुत अधिक थी। संसारपर अनुग्रह करनेवाले, वीतराग एवं मात्सर्यरहित वे महातेजस्वी मुनि आपसमें विचार करने लगे कि इस संसारमें दुःखित प्राणियोंकी भगवान् हरिके प्रति अचल भक्ति कैसे हो सकेगी? और कैसे आधिदैविक, आधिभौतिक तथा आध्यात्मिक सम्पूर्ण कर्मोंकी सिद्धि हो सकेगी? उन ऋषियोंकी इस जिज्ञासाको जानकर महामुनि शौनकने हाथ जोड़ते हुए बड़े ही विनयपूर्वक उनसे कहा—
शौनकजीने कहा— हे ऋषियो! पौराणिकोंमें उत्तम सूतजी महाराज इस समय पवित्र सिद्धाश्रममें विराजमान हैं। वे भगवान् वेदव्यासजीके शिष्य हैं और यतियोंके ईश्वर हैं। वे आपकी जिज्ञासाविषयक सभी बातोंको जानते हैं। इसलिये उन्हींके पास चलकर हमलोग पूछें। शौनक मुनिके ऐसा कहनेपर वे सभी उस पुण्य सिद्धाश्रममें गये। नैमिषारण्यवासी उन ऋषियोंने सुखपूर्वक आसनपर बैठे हुए सूतजीसे पूछा—
ऋषियोंने कहा— हे सुव्रत! किस उपायके द्वारा भगवान् विष्णुको प्रसन्न किया जा सकता है? और कैसे इनकी पूजा करनी चाहिये? इसे आप बतायें साथ ही यह भी बतलानेकी कृपा करें कि मुक्तिका साधनभूत तत्त्व क्या है?
इसपर सूतजी महाराजने कहा— हे ऋषिगणो! भगवान् विष्णु, देवी लक्ष्मी, वायु, सरस्वती, शेषनाग, गुरुश्रेष्ठ कृष्णद्वैपायन व्यासजीको नमस्कार कर मैं अपनी बुद्धिके अनुसार वर्णन करता हूँ, आप लोग उन श्रेष्ठ तत्त्वस्वरूप भगवान् हरिके विषयमें सुनें।
ऋषियो! नारायणके समान न कोई है, न हुआ है और न भविष्यमें ही कोई होगा।² इस सत्यवाक्यके द्वारा आप सभीके प्रयोजनको सिद्ध कर रहा हूँ।
शौनकजीने पूछा— हे मुनिश्रेष्ठ! सर्वप्रथम भगवान् विष्णुको क्यों नमस्कार करना चाहिये? हे विद्वन्! हे सुव्रत! यह आप बतानेकी कृपा करें।
सूतजी बोले— हे शौनक! सभी वेदोंके द्वारा एकमात्र वेद्य—जानने योग्य वे हरि ही हैं, वेदादि शास्त्रों तथा
¹-गरुडपुराणके कई संस्करणोंमें 'पूर्व' और 'उत्तर' केवल दो ही खण्ड दिये गये हैं। 'ब्रह्मकाण्ड' वेंकटेश्वर प्रेसद्वारा प्रकाशित संस्करणमें ही उपलब्ध है। इसका संक्षिप्त सारांश यहाँ प्रस्तुत किया गया है।
²-नास्ति नारायणसमं न भूतं न भविष्यति। (१।१।८)