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गरुड़ पुराण

गरुड़ पुराण

Garuda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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६०४ संक्षिप्त गरुडपुराण [ ब्रह्म-

इतिहास एवं पुराणोंमें उन्हींकी महिमा गायी गयी है, इसलिये वे विष्णु सर्वप्रथम वन्दनीय हैं, वे विष्णु ही सबमें ज्ञानरूपसे प्रकाशित हैं। इसलिये हरि प्रणामके योग्य हैं। वे सभीमें प्रधान हैं और सबसे बढ़कर हैं, इसलिये भी वे हरि सर्वप्रथम नमस्कार करने योग्य हैं। भगवान् विष्णुके समान न कोई देवता है और न वायुके समान कोई गुरु। विष्णुपदीके समान कोई तीर्थ नहीं है और विष्णुभक्तके समान कोई भक्त नहीं है। कलियुगमें सभी पुराणोंमें तीन पुराण भगवान् हरिको प्रिय और मुख्य हैं। उनमें भी कलिकालमें मनुष्योंका कल्याण करनेवाला श्रीमद्भागवत महापुराण मुख्य पुराण है। इसमें जिनसे सर्वप्रथम सृष्टि हुई है उन श्रीहरिका प्रतिपादन हुआ है, इसीलिये यह भागवत पुराण श्रेष्ठ माना गया है। इस पुराणमें भगवान् विष्णुसे ही ब्रह्मा और महेश आदिकी सृष्टि बतायी गयी है, हे विप्र ! इसी प्रकार इसमें अनेक प्रकारके अर्थोंका तथा तत्त्वज्ञानका निरूपण हुआ है, इन्हीं सब विशेषताओंके कारण यह भागवत श्रेष्ठतम पुराण माना गया है। इसी प्रकार विष्णुपुराण तथा गरुडपुराणको श्रेष्ठ कहा गया है। कलियुगमें ये तीन पुराण मनुष्यके लिये प्रधान बताये गये हैं। उनमें भी गरुडपुराणकी विशेषता कुछ अधिक ही है। यह गरुडपुराण तीन अंशोंमें विभक्त है। इसके प्रथम अंशको कर्मकाण्ड, द्वितीय अंशको धर्मकाण्ड और तृतीय अंशको ब्रह्मकाण्ड कहा जाता है। उन तीनों काण्डोंमें भी अन्तिम यह ब्रह्मकाण्ड श्रेष्ठ है। हे विप्रो! इस तृतीयांश अर्थात् ब्रह्मकाण्डके श्रवणसे जो पुण्य होता है उसे भागवत-श्रवणके समान पुण्य फलवाला कहा गया है। इतना ही नहीं इस ब्रह्मखण्डके पारायणसे वेदपाठके समान फल प्राप्त होता है। इसमें संदेह नहीं है। हे विप्रगणो! इसके पाठ करनेका जो फल कहा गया है वह केवल श्रवण करनेसे भी मिल जाता है। भगवान् हरिने ही व्यासरूपमें अवतरित होकर भागवत, विष्णु, गरुड आदि पुराणोंकी रचना की है। विष्णु-धर्मका प्रतिपादन करनेमें गरुडपुराणके समान कोई भी पुराण नहीं है।<sup></sup> जैसे देवोंमें जनार्दन श्रेष्ठ हैं, आयुधोंमें सुदर्शन श्रेष्ठ है, यज्ञोंमें अश्वमेध श्रेष्ठ है, नदियोंमें गङ्गा श्रेष्ठ हैं, जलजोंमें कमल श्रेष्ठ है, वैसे ही पुराणोंमें यह गरुडपुराण हरिके तत्त्वनिरूपणमें मुख्य कहा गया है। गरुडपुराणमें हरि ही प्रतिपाद्य हैं, इसलिये हरि ही नमस्कार करने योग्य हैं और हरि ही शरण्य हैं तथा वे हरि ही सब प्रकारसे सेवा करने योग्य हैं।<sup></sup> (अध्याय १)


गरुडजीको श्रीकृष्णद्वारा भगवान् विष्णुकी महिमा बताना तथा प्रलयकालके अन्तमें योगनिद्रामें शयन कर रहे उन भगवान् विष्णुको सृष्टि-हेतु अनेक प्रकारकी स्तुति करते हुए जगाना

सूतजीने पुनः कहा— हे शौनकजी ! एक बार गरुडजीने भगवान् विष्णु (कृष्ण)-से किस प्रकार उन्होंने सृष्टिकी रचना की इस विषयमें प्रश्न किया था, तब उन्होंने कहा था कि हे सुव्रत ! इस सृष्टिके मूल कारण अव्यय विष्णु हैं और वे व्यापक तत्त्व हैं, वे सर्वत्र व्याप्त रहते हैं। पूर्ण होनेके कारण वे ही अवतार ग्रहण करते हैं, अनेक रूपोंवाले इस दृश्य जगत्‌को वे एक रूप बनाकर प्रलयकालमें अपनेमें लीन करके शयन करते हैं। उनके गुण, रूप, अवयव तथा वैभवादि ऐश्वर्योंमें भेदरूप दिखायी पड़नेपर भी अभेदरूपमें उनका दर्शन करना चाहिये; क्योंकि भेदरूपमें दर्शन करनेपर शीघ्र ही अन्धकारके


१-गारुडेन समं नास्ति विष्णुधर्मप्रदर्शनम् ॥ (१।७१)
२-गारुडाख्यपुराणे तु प्रतिपाद्यो हरिः स्मृतः। अतो हरिनमस्कार्यो गम्यो योग्यो हरिः स्मृतः ॥ (१।७४)