गरुड़ पुराण
Garuda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंकाण्ड ] नारायणसे सृष्टिका प्रादुर्भाव तथा तत्त्वाभिमानी देवोंका प्राकट्य ६०७
हरिने भी तीन रूप धारण किये, जो ब्रह्मा, विष्णु और महेश कहे गये हैं।
लोकोंकी वृद्धि (पालन) करनेके लिये स्वयं साक्षात् हरि सत्त्वगुणसे विष्णु नामवाले कहलाये। सृष्टि करनेके लिये साक्षात् हरिने रजोगुणके आधिक्यसे ब्रह्मामें प्रवेश किया और संहार करनेके लिये वे हरि तमोगुणसे सम्पन्न होकर रुद्रमें प्रविष्ट हुए। वे अव्यय हरि त्रिगुणमें प्रविष्ट होकर जब सृष्टि-कार्योंन्मुख होते हैं तो उनमें क्षोभ उत्पन्न होता है, फलस्वरूप तीनों गुणोंसे महत्तत्त्वका प्रादुर्भाव होता है। पुनः उस महान्से ब्रह्मा और वायुका प्राकट्य हुआ। यह महत्तत्त्व रजःप्रधान है। इस सृष्टिको गुणवैषम्य नामक सृष्टि जानना चाहिये।
इस प्रकारके विशिष्ट महत्तत्त्वमें लक्ष्मीके साथ स्वयं हरि प्रविष्ट हुए। हे महाभाग! उसके बाद उन्होंने उस महत्तत्त्वको क्षुब्ध किया। क्षोभके फलस्वरूप उससे ज्ञान-द्रव्य-क्रियात्मक अहम् तत्त्व उत्पन्न हुआ।
इस अहंतत्त्वसे तत्त्वाभिमानी देव शेष उत्पन्न हुए तथा गरुड और हर उत्पन्न हुए। हे खग! इस अहंतत्त्वमें साक्षात् हरि प्रविष्ट हुए। लक्ष्मीके साथ भगवान् हरिने स्वयं उस अहंतत्त्वको संक्षुब्ध किया। वैकारिक, तामस और तैजस-भेदसे अहम् तीन प्रकारका है, उस अहम्के नियामक रुद्र भी तीन प्रकारके हुए। वैकारिक अहम्में स्थित रुद्र वैकारिक कहे गये हैं। तामसमें स्थित रुद्र तामस कहे गये और तैजसमें स्थित रुद्र लोकमें तैजस कहे गये। तैजस अहंतत्त्वमें लक्ष्मीके साथ स्वयं हरिने प्रविष्ट होकर उसे संक्षुब्ध किया। इससे वह दस प्रकारका हुआ जो श्रोत्र, चक्षु, स्पर्श, रसना और घ्राण तथा वाक्, पाणि, पाद, पायु और उपस्थ—इन कर्मेन्द्रियों तथा ज्ञानेन्द्रियोंके रूपमें दस प्रकारका कहा जाता है। वैकारिक अहंतत्त्वमें प्रविष्ट होकर हरिने उसे संक्षुब्ध किया। महत्तत्त्वसे एकादश इन्द्रियोंके एकादश अभिमानी देवता प्रकट हुए। प्रथम मनके अभिमानी इन्द्र और कामदेव उत्पन्न हुए। अनन्तर अन्य इन्द्रियोंके अभिमानी देवोंका प्रादुर्भाव हुआ। इसी प्रकार अष्ट वसु आदिका भी प्राकट्य हुआ। द्रोण, प्राण, ध्रुव आदि ये आठ वसु देवता हैं।
रुद्रोंकी संख्या दस जाननी चाहिये। मूल रुद्र भव कहे जाते हैं। हे पक्षिश्रेष्ठ! रैवन्तेय, भीम, वामदेव, वृषाकपि, अज, समपाद, अहिर्बुध्न्य, बहुरूप तथा महान्—ये दस रुद्र कहे गये हैं। हे पक्षीन्द्र! अब आदित्योंको सुनें—उरुक्रम, शक्र, विवस्वान्, वरुण, पर्जन्य, अतिवाहु, सविता, अर्यमा, धाता, पूषा, त्वष्टा तथा भग—ये बारह आदित्य हैं। प्रभव और अतिवह आदि उनचास मरुद्गण कहे गये हैं। हे खगेश्वर! विश्वेदेव दस हैं, उनके नाम इस प्रकार हैं—पुरूरवा, आर्द्रव, धुरि, लोचन, क्रतु, दक्ष, सत्य, वसु, काम तथा काल।
इन्द्रियोंके अभिमानी देवोंके समान ही स्पर्श, रूप, रस आदि तत्त्वोंके अभिमानी अपान, व्यान, उदान आदि वायुदेवोंकी उत्पत्ति हुई। ऐसे ही च्यवनको महर्षि भृगु और उतथ्यको बृहस्पतिका पुत्र कहा गया है। रैवत, चाक्षुष, स्वारोचिष, उत्तम, ब्रह्मसावर्णि, रुद्रसावर्णि, देवसावर्णि, दक्षसावर्णि तथा धर्मसावर्णि इत्यादि मनु कहे गये हैं। ऐसे ही पितरोंके सात गण भी प्रादुर्भूत हुए और इनसे वरुण आदिकी पत्नीरूपमें गङ्गादिका आविर्भाव हुआ। इस प्रकार परमात्मा श्रीहरिसे सभी देवोंका प्रादुर्भाव हुआ और वे नारायण लक्ष्मीके साथ उनमें प्रविष्ट हुए।
(अध्याय ३—५)