भारतकोश
गरुड़ पुराण

गरुड़ पुराण

Garuda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished634 पृष्ठ

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६०८संक्षिप्त गरुडपुराण[ ब्रह्म-

देवताओंद्वारा नारायणकी स्तुति

श्रीकृष्णने कहा— हे खगेश्वर! अपने-अपने तत्त्वमें स्थित उन-उन तत्त्वोंके अभिमानी देवताओंने नारायण हरिकी अनेक प्रकारसे पृथक्-पृथक् स्तुति की।

सर्वप्रथम श्री (देवी लक्ष्मी)-ने स्तुति प्रारम्भ की, उस समय उन्होंने मनमें सोचा कि प्रभुके तो एक-एक करके अनन्त गुण हैं। उन गुणोंकी स्तुति करनेमें मेरी कहाँ शक्ति है! ऐसा विचार कर वे देवी लज्जासे अवनत होकर इस प्रकार कहने लगीं—

श्रीने कहा— हे नाथ! मैं आपके चरणारविन्दोंपर नतमस्तक हूँ। आपके चरणोंके अलावा अन्य मैं कुछ भी नहीं जानती। हे देवदेव! हे ईश्वर! आपमें अनन्त गुण विद्यमान हैं। हे दामोदर! हे योगेन्द्र! आप अपने शरीरमें स्थान देकर मेरी रक्षा करें। स्तुति करनेके लिये मेरे लिये आपसे अधिक और कोई प्रिय नहीं है।

ब्रह्माजीने कहा— हे लक्ष्मीपते! हे जगदाधार-स्वरूप विश्वमूर्ते! कहाँ आप ज्ञानके महासागर और कहाँ मैं अज्ञानी! आपमें असीम शक्ति है। मैं अल्पज्ञ हूँ और मेरी शक्ति भी अल्प है। हे प्रभो! हे मुरारे! आप सदैव मुझको अहंकार और ममताके भावसे दूर ही रखें। हे रमेश! मेरी इन्द्रियाँ सदा असन्मार्गपर प्रवृत्त होती हैं। वे सदा आपके चरणकमलमें अनुरक्त रहें, ऐसी कृपा करें। आपकी स्तुति करनेकी सामर्थ्य मुझमें नहीं है। इसलिये आप प्रसन्न हों। स्तुतिके अनन्तर विधाता ब्रह्मा हाथ जोड़े उनके सामने खड़े हो गये।

देवदेव ब्रह्माजीके बाद वायुदेव भगवान् नारायणके प्रेमसे विह्वल हो हाथ जोड़ते हुए गद्गद वाणीसे उनकी स्तुति करने लगे—

वायुने कहा— हे प्रभो! सभी देवगण आपके सेवक हैं और आपके चरणारविन्दोंका सांनिध्य परम दुर्लभ है। हे रमेश! हे नाथ! लोकमें जो आपकी भक्तिसे विमुख हैं, जो पापकर्म करनेवाले हैं तथा जो अत्यन्त दुःखी हैं ऐसे प्राणियोंपर अनुग्रह करनेके लिये ही आपका अवतरण होता है। हे वासुदेव! आप अपने अवतारोंके द्वारा गौ, ब्राह्मण और देवताओं आदिके क्षेम तथा कल्याणके लिये नाना प्रकारकी लीलाएँ किया करते हैं, आपके अवतारका अन्य दूसरा प्रयोजन नहीं है। हे पुण्यश्रेष्ठ! आपके जो चरितामृत हैं उनका गुणानुवाद करनेसे मेरा मन तृप्त नहीं होता, इसलिये हे मुकुन्द! एक अविचल भक्तिवाले भक्तके समान मुझे भक्ति प्रदान करें ताकि मेरा मन आपके पादारविन्दमें लगा रहे।

हे प्रभो! मेरी निद्रा आपकी वन्दनारूप बन जाय, मेरा सम्पूर्ण आचरण आपकी प्रदक्षिणा हो जाय और मेरा व्यवहार आपकी स्तुति बन जाय, ऐसा समझकर मैं आपके चरणोंमें स्वयंको समर्पित करता हूँ। हे देव! जितने पदार्थ हैं उन्हें देखकर 'यह हरिकी ही प्रतिमा है' ऐसा मानकर हे देवदेव! मैं उसमें स्थित हरि-रूप समझकर आपका भजन करूँ ऐसी आप कृपा करें। आप हरिके प्रसन्न होनेपर लोकमें कौन-सी वस्तु दुर्लभ रह जाती है अर्थात् उसे सब प्राप्त हो जाता है। इस प्रकार स्तुति कर महात्मा वायुदेव हरिके आगे हाथ जोड़कर स्थित हो गये।

सरस्वतीने कहा— हे मुरारे! हे हरे! हे भगवन्! कौन ऐसा रसज्ञ है जो अपनी स्तुति अथवा कीर्तनसे संतुष्ट हो पायेगा अर्थात् कोई नहीं, किसीमें ऐसी बुद्धि नहीं है जो आपकी स्तुति—प्रशंसा कर सके। हे देवदेव! आपके गुणानुवादका कीर्तन ज्यों ही कानमें पहुँचता है वैसे ही वह