गरुड़ पुराण
Garuda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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हरिके अतिरिक्त मेरा और कोई पति नहीं हो सकता। हे तात ! मुझे ऐसा लगता है कि इस जन्ममें मुझे सौभाग्यकी प्राप्ति है ही नहीं; क्योंकि मेरे तो एकमात्र भर्ता वे भगवान् हरि ही हैं और कोई नहीं। यद्यपि इस संसारमें सभी स्त्रियाँ सदा सौभाग्यवती मानी जाती हैं किंतु उन्हें विधवा ही समझना चाहिये; क्योंकि अनादि, नित्य, सम्पूर्ण संसारके एकमात्र सारस्वरूप, परम सुन्दर, मोक्षदाता तथा सभी इच्छाओंकी पूर्ति करनेवाले भगवान्को जो पतिरूपमें नहीं मानती हैं, वे सदैव विधवाके समान ही हैं। जिन स्त्रियोंके पति विष्णुभक्त हैं, उन स्त्रियोंका जन्म सफल है। अनेक जन्मोंमें संचित किये गये पुण्योंसे ही विष्णुभक्त पति प्राप्त होता है। कलियुगमें विष्णुभक्त दुर्लभ हैं, हरिभक्ति तो सदा ही दुर्लभ रही है। कलियुगमें हरिकी कथा दुर्लभ है। हरिके भक्तोंकी सत्संगति और भी दुर्लभ है। कलियुगमें शेषाचलपर विराजमान रहनेवाले भगवान् विष्णुका दर्शन दुर्लभ है। विष्णुपदी कालिन्दी नदीके तटपर विराजमान रहनेवाले भगवान् रंगनाथका दर्शन करना बड़ा ही दुर्लभ है। काञ्चीक्षेत्रमें जाकर भगवान् वरदराजकी सेवा करना और दर्शन प्राप्त करना भी सुलभ नहीं है। रामसेतुका दर्शन सरल नहीं है। श्रेष्ठ जनोंने कहा है कि भीमा नदीके तटपर रहनेवाले विष्णुका दर्शन प्राप्त करना सुलभ नहीं है और न तो रेवा नदीके तटपर स्थित विष्णुका एवं गयाक्षेत्रमें विष्णुपदका दर्शन ही सुलभ है। मृत्युलोकमें रहनेवाले लोगोंके लिये बदरीवनमें भगवान् विष्णुका दर्शन पाना भी सुलभ नहीं है। श्रीलक्ष्मीनारायणकी निवासभूमि शेषाचलपर रहनेवाले तपस्वी भी दुर्लभ हैं। प्रयाग नामक तीर्थमें नित्य निवास करनेवाले भगवान् माधवका दर्शन करना मनुष्योंके लिये सरल नहीं है। इसीलिये हे तात ! कृष्णसे अतिरिक्त किसी दूसरेको पतिरूपमें वरण करनेकी मेरी इच्छा नहीं है।' अपने पितासे ऐसा कहकर वह कुमारी शेषाचल पर्वतकी ओर चली गयी।
कपिल नामक महातीर्थमें पहुँचकर उसने वहाँ विराजमान भगवान् श्रीनिवासका दर्शन कर उन्हें प्रणाम किया। तीन दिनतक सम्यक्-रूपसे उनकी सेवा करके वह पापविनाशन नामक तीर्थमें चली गयी। विवाहकी इच्छासे उस तीर्थमें स्नान करके उस तीर्थके उत्तर दिशामें दो कोसके विस्तारमें फैले हुए गुफारूपी एकान्त स्थानमें जाकर भगवान् नारायणके ध्यानमें-तपश्चर्यामें स्थित हो गयी और उसने अनेक प्रकारसे उनकी स्तुति की।
उस कुमारीने स्तुति करते हुए कहा—'हे देव ! आप ही मेरे माता, पिता, पति, सखा, पुत्र, गुरु, श्रेष्ठ स्वजन, मित्र और प्राणवल्लभ हैं। हे प्रभो! ये सभी सांसारिक पिता आदि स्वजन तो निमित्तमात्रसे अपने बने हैं, पर आप तो बिना निमित्त ही सदासे मेरे सब कुछ हैं। इसीलिये हे मुरारे! मैं आपकी ही भार्या होना चाहती हूँ इसी कारण मैंने यह कौमार्यव्रत धारण किया है। हे श्रीनिवास ! आपको मेरा नमस्कार है। आप मुझपर प्रसन्न हों।
उसकी पराभक्तिसे प्रसन्न हो करुणासागर भगवान् श्रीनिवासने प्रकट होकर कहा—'हे कुमारिके! हे सुभगे ! कृष्णावतारमें मैं तुम्हारा पति होऊँगा।' ऐसा वर देकर भगवान् वहींपर अन्तर्धान हो गये। तदनन्तर कव्यवाहकी पुत्री वह कुमारी भी यौगिक रीतिसे वहीं अपना शरीर छोड़कर कुम्भकके घरमें नीला नामसे उत्पन्न हुई। हे पक्षिराज! दितिसे उत्पन्न दैत्योंको मार करके मैंने नीला नामकी लक्ष्मीको प्राप्त किया। तत्पश्चात् नग्नजित् नामक राजाके घरमें उस कुमारीने जन्म लिया। नग्नजित् ही पूर्वमें कव्यवाह थे और उनकी पुत्री कुमारी भी नीला नामसे विख्यात हुई थी। उसके स्वयंवरमें मैंने देवताओं और मनुष्योंके द्वारा न जीते जाने योग्य सात दुर्दान्त बैलोंके साथ अनेक राजाओंको जीतकर बंदी बनायी गयी नीलाको भार्यारूपमें प्राप्त किया।
(अध्याय १९)