गरुड़ पुराण
Garuda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें६४ संक्षिप्त गरुडपुराण [ आचार-
सभी सुशोभित रहते हैं। इनसे सुसज्जित उन अष्टादशभुजा देवीका स्मरण करना चाहिये।
अट्ठाईस भुजावाली या अट्ठारह भुजावाली अथवा बारह भुजावाली या आठ भुजा अथवा चार भुजावाली दुर्गादेवीका भी ध्यान करना चाहिये। महिषासुरका वध करनेवाली वे देवी सिंहपर विराजमान रहती हैं।
वासुदेवने कहा—हे रुद्र ! सूर्यार्चनमें भगवान् सूर्यका इस प्रकार ध्यान करना चाहिये—
वे भगवान् सूर्य तेजःस्वरूप, रक्त वर्णवाले, श्वेत पद्मपर विराजमान, एक चक्रवाले रथपर समासीन, दो भुजाओंसे युक्त तथा कमल धारण करनेवाले हैं। इस रूपमें उनका सदैव ध्यान करना चाहिये।
श्रीहरिने पुनः कहा—हे वृषध्वज ! [अब] मैं माहेश्वरी-पूजाका वर्णन कर रहा हूँ, उसे सुनो—पहले स्नान तथा आचमन कर ले। इसके बाद आसनपर बैठकर न्यास करके मण्डलमें महेश्वरकी पूजा करे। हे महेशान ! हरकी पूजा परिवारके साथ करे। हे रुद्र ! 'ॐ हां शिवासनदेवता आगच्छत'—इस मन्त्रसे आसनके देवताओंका आवाहन करे। मण्डलके मुख्य द्वारपर स्नान, गन्ध आदिद्वारा 'ॐ हां गणपतये नमः' मन्त्रसे गणपतिकी, 'ॐ हां सरस्वत्यै नमः' मन्त्रसे सरस्वतीकी, 'ॐ हां नन्दिने नमः' मन्त्रसे नन्दीकी, 'ॐ हां महाकालाय नमः' मन्त्रसे महाकालकी, 'ॐ हां गङ्गायै नमः' मन्त्रसे गङ्गाकी, 'ॐ हां लक्ष्म्यै नमः' मन्त्रसे लक्ष्मीकी, 'ॐ हां महाकलायै नमः' मन्त्रसे महाकलाकी तथा 'ॐ हां अस्त्राय नमः' मन्त्रसे अस्त्रकी पूजा करे।
इसी प्रकार 'ॐ हां ब्रह्मणे वास्त्वधिपतये नमः' से वास्त्वधिपतिकी, 'ॐ हां गुरुभ्यो नमः' से गुरुकी, 'ॐ हां आधारशक्त्यै नमः' से आधारशक्तिकी, 'ॐ हां अनन्ताय नमः' से अनन्तकी, 'ॐ हां धर्माय नमः' से धर्मकी, 'ॐ हां ज्ञानाय नमः' से ज्ञानकी, 'ॐ हां वैराग्याय नमः' से वैराग्यकी, 'ॐ हां ऐश्वर्याय नमः' से ऐश्वर्यकी, 'ॐ हां अधर्माय नमः' से अधर्मकी, 'ॐ हां अज्ञानाय नमः' से अज्ञानकी, 'ॐ हां अवैराग्याय नमः' से अवैराग्यकी, 'ॐ हां अनैश्वर्याय नमः' से अनैश्वर्यकी, 'ॐ हां ऊर्ध्वच्छन्दाय नमः' से ऊर्ध्वच्छन्दकी, 'ॐ हां अधश्छन्दाय नमः' से अधश्छन्दकी, 'ॐ हां पद्माय नमः' से पद्मकी, 'ॐ हां कर्णिकायै नमः' से कर्णिकाकी, 'ॐ हां वामायै नमः' से वामाकी, 'ॐ हां ज्येष्ठायै नमः' से ज्येष्ठाकी, 'ॐ हां रौद्र्यै नमः' से रौद्रीकी, 'ॐ हां काल्यै नमः' से कालीकी, 'ॐ हां कलविकरण्यै नमः' से कलविकरणीकी, 'ॐ हां बलप्रमथिन्यै नमः' से बलप्रमथिनीकी, 'ॐ हां सर्वभूतदमन्यै नमः' से सर्वभूतदमनीकी, 'ॐ हां मनोन्मन्यै नमः' से मनोन्मनीकी, 'ॐ हां मण्डलत्रितयाय नमः' से मण्डलत्रितयकी, 'ॐ हां हौं हं शिवमूर्तये नमः' से शिवमूर्तिकी, 'ॐ हां विद्याधिपतये नमः' से विद्याधिपतिकी और 'ॐ हां हीं हौं शिवाय नमः' से शिवकी पूजा करे।
अनन्तर 'ॐ हां हृदयाय नमः' से हृदयकी, 'ॐ हीं शिरसे नमः' से सिरकी, 'ॐ हूं शिखायै नमः' से शिखाकी, 'ॐ हैं कवचाय नमः' से कवचकी, 'ॐ हौं नेत्रत्रयाय नमः' से नेत्रत्रयकी, 'ॐ हः अस्त्राय नमः' से अस्त्रकी और 'ॐ हां सद्योजाताय नमः' से सद्योजातकी पूजा करे।
सद्योजातकी आठ कलाएँ जाननी चाहिए, जो पूर्व आदि दिशाओंमें स्थित हैं। उनकी पूजा [गन्ध आदिसे] इस प्रकार करनी चाहिये—'ॐ हां सिद्धयै नमः' से सिद्धिकी, 'ॐ हां ऋद्धयै नमः'