गरुड़ पुराण
Garuda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंकाण्ड ] देवी दुर्गाका स्वरूप, सूर्य-ध्यान तथा माहेश्वरीपूजन-विधि [ ६५
से ऋद्धिकी, ‘ॐ हां विद्युतायै नमः’ से विद्युताकी, ‘ॐ हां लक्ष्म्यै नमः’ से लक्ष्मीकी, ‘ॐ हां बोधायै नमः’ से बोधाकी, ‘ॐ हां काल्यै नमः’ से कालीकी, ‘ॐ हां स्वधायै नमः’ से स्वधाकी और ‘ॐ हां प्रभायै नमः’ से प्रभाकी अर्चना करनी चाहिये।
हे वृषभध्वज ! वामदेवकी तेरह कलाएँ जाननी चाहिये, उनकी भी पूजा गन्ध-पुष्प आदिसे करनी चाहिये। उनकी पूजामें पहले ‘ॐ हां वामदेवाय नमः’ कहकर वामदेवकी पूजा करनेके बाद उनकी कलाओंका पूजन करना चाहिये। जैसे—‘ॐ हां रजसे नमः’ से रजस्की, ‘ॐ हां रक्षायै नमः’ से रक्षाकी, ‘ॐ हां रत्यै नमः’ से रतिकी, ‘ॐ हां कन्यायै नमः’ से कन्याकी, ‘ॐ हां कामायै नमः’ से कामाकी, ‘ॐ हां जनन्यै नमः’ से जननीकी, ‘ॐ हां क्रियायै नमः’ से क्रियाकी, ‘ॐ हां वृद्धयै नमः’ से वृद्धिकी, ‘ॐ हां कार्यायै नमः’ से कार्याकी, ‘ॐ हां रा (धा)-त्र्यै नमः’ से रा (धा)-त्रि (त्री)-की, ‘ॐ हां भ्रामण्यै नमः’ से भ्रामणीकी, ‘ॐ हां मोहिन्यै नमः’ से मोहिनीकी और ‘ॐ हां क्ष (त्व) रायै नमः’ से क्ष (त्व)-राकी अर्चना करनी चाहिये।
हे वृषभध्वज ! तत्पुरुषकी चार कलाएँ हैं। पहले ‘ॐ हां तत्पुरुषाय नमः’ इस मन्त्रद्वारा तत्पुरुषकी पूजा करे। तदनन्तर ‘ॐ हां निवृत्यै नमः’ से निवृत्तिकी, ‘ॐ हां प्रतिष्ठायै नमः’ से प्रतिष्ठाकी, ‘ॐ हां विद्यायै नमः’ से विद्याकी और ‘ॐ हां शान्त्यै नमः’ से शान्तिकी पूजा करनी चाहिये।
अघोरकी भैरव-सम्बन्धी छः कलाएँ जाननी चाहिये। इनकी पूजामें पहले ‘ॐ हां अघोराय नमः’ मन्त्रद्वारा अघोरकी पूजा करनेके पश्चात् ‘ॐ हां उमायै नमः’ से उमाकी, ‘ॐ हां क्षमायै नमः’ से क्षमाकी, ‘ॐ हां निद्रायै नमः’ से निद्राकी, ‘ॐ हां व्याध्यै नमः’ से व्याधिकी, ‘ॐ हां क्षुधायै नमः’ से क्षुधाकी तथा ‘ॐ हां तृष्णायै नमः’— से तृष्णाकी पूजा करनी चाहिये।
हे वृषभध्वज ! ईशानदेवकी पाँच कलाएँ हैं, इनकी पूजामें ‘ॐ हां ईशानाय नमः’ इस मन्त्रसे ईशानकी पूजा करनेके पश्चात् ‘ॐ हां समित्यै नमः’ से समितिकी, ‘ॐ हां अङ्गदायै नमः’ से अङ्गदाकी, ‘ॐ हां कृष्णायै नमः’ से कृष्णाकी, ‘ॐ हां मरीच्यै नमः’ से मरीचिकी और ‘ॐ हां ज्वालायै नमः’ से ज्वालाकी पूजा करे।
तदनन्तर हे शङ्कर ! ‘ॐ हां शिवपरिवारेभ्यो नमः’ से शिवपरिवारका, ‘ॐ हां इन्द्राय सुराधिपतये नमः’ से सुराधिपति इन्द्रका, ‘ॐ हां अग्नये तेजोऽधिपतये नमः’ से तेजोऽधिपति अग्निका, ‘ॐ हां यमाय प्रेताधिपतये नमः’ से प्रेताधिपति यमका, ‘ॐ हां निर्ऋतये रक्षोऽधिपतये नमः’ से रक्षोऽधिपति निर्ऋतिका, ‘ॐ हां वरुणाय जलाधिपतये नमः’ से जलाधिपति वरुणका, ‘ॐ हां वायवे प्राणाधिपतये नमः’ से प्राणाधिपति वायुका, ‘ॐ हां सोमाय नेत्राधिपतये नमः’ से नेत्राधिपति सोमका, ‘ॐ हां ईशानाय सर्वविद्याधिपतये नमः’ से सर्वविद्याधिपति ईशानका, ‘ॐ हां अनन्ताय नागाधिपतये नमः’ से नागाधिपति अनन्तका, ‘ॐ हां ब्रह्मणे सर्वलोकाधिपतये नमः’ से सर्वलोकाधिपति ब्रह्माका और ‘ॐ हां धूलिचण्डेश्वराय नमः’ से धूलिचण्डेश्वरका आवाहन, स्थापन, संनिधान, संनिरोध तथा सकलीकरण करना चाहिये।
तदनन्तर तत्त्व-न्यास करके मुद्रा दिखानी चाहिये तथा ध्यान करना चाहिये। इसके बाद पाद्य, आचमन, अर्घ्य, पुष्प, अभ्यङ्ग, उद्वर्तन और स्नान तथा सुगन्धानुलेपन, वस्त्र, अलंकार, भोग, अङ्गन्यास, धूप, दीप, नैवेद्य-अर्पण, करोद्वर्तन, पाद्य, अर्घ्य, आचमन, गन्ध एवं ताम्बूल निवेदन करनेके बाद