गरुड़ पुराण
Garuda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 79, कुल 634 में से
संदर्भ में पढ़ेंकाण्ड ] ब्रह्ममूर्तिके ध्यानका निरूपण ६९
प्राण, अहङ्कार, पञ्चमहाभूत (पृथ्वी, जल, तेज, वायु एवं आकाश), पञ्चतन्मात्र (गन्धतन्मात्र, रसतन्मात्र, रूपतन्मात्र, स्पर्शतन्मात्र एवं शब्दतन्मात्र) विविध गुण, जन्म और भोजन, शयन आदि भोगसे सर्वथा रहित, स्वप्रकाश, निराकार, सदा निरतिशय, नित्य आनन्दस्वरूप, अनादि, नित्य, शुद्ध, बुद्ध, सर्वतः परिपूर्ण, सत्यस्वरूप, परमसुखस्वरूप, परमपद एवं तुरीय (कूटस्थ निरञ्जन परब्रह्म)-के रूपमें वेदोंमें वर्णित है।
हे वृषभध्वज! अपनी आत्माको रथी और शरीरको रथ समझना चाहिये। बुद्धि उसमें सारथि तथा मन लगाम है। इन्द्रियोंको उस रथमें जुते हुए अश्वके रूपमें स्वीकार किया गया है। ये इन्द्रियाँ ही रूप, रस, गन्ध आदि विषयका अनुभव करती हैं।
इन्द्रिय और मनसे युक्त आत्माको ही मनीषियोंने भोक्ता कहा है। जो मनुष्य विज्ञानरूपी सारथिसे युक्त है, मनरूपी लगामको अपने वशमें रखता है, वही उस परमपदको प्राप्त करता है, फिर वह उत्पन्न नहीं होता। जो विज्ञानरूपी सारथिसे नियन्त्रित मनरूपी लगामवाला मनुष्य है, वह स्वर्धुनी<sup>१</sup> (अज्ञान)-से पार हो जाता है और वही विष्णुका परमपद है<sup>२</sup>।
इस योगकी परम साधनामें अहिंसादि धर्मोंको यम तथा शौचादिक कर्मोंको नियम कहा गया है। पद्मादि आसन हैं। प्राण, अपानादिक वायुपर विजय प्राप्त करना प्राणायाम है। इन्द्रियोंपर विजय प्रत्याहार और ईश्वरका चिन्तन करना ध्यानावस्था है। मनको नियन्त्रित करना ही धारणा है और ब्रह्ममें मनको केन्द्रित करनेकी जो स्थिति होती है, वह समाधि है। यदि पहले इस योगके द्वारा चञ्चल चित्त स्थिर नहीं होता तो उस मूर्ति (परमेश्वर)-का इस प्रकार चिन्तन करना चाहिये—
जो हृदयकमलकी कर्णिकाके मध्य विराजमान रहनेवाले हैं तथा शङ्ख, चक्र, गदा और कमलसे सुशोभित हैं, जो श्रीवत्स तथा कौस्तुभमणि, वनमाला एवं लक्ष्मीसे विभूषित हैं, जो नित्य-शुद्ध, ऐश्वर्यसम्पन्न, सत्य, परमानन्दस्वरूप, आत्मस्वरूप, परमब्रह्म तथा परम ज्योतिःस्वरूप हैं—ऐसे वे चौबीस स्वरूप (अवतार)-वाले, शालग्रामकी शिलामें विराजमान, द्वारकादि<sup>३</sup> शिलाओंपर अवस्थित रहनेवाले परमेश्वर ध्यानके योग्य हैं और पूजनीय हैं। मैं भी वही हूँ—ऐसा समझना चाहिये।
इस प्रकार आत्मस्वरूप नारायणका यम-नियम इत्यादिक योगके साधनोंसे एकाग्रचित्त होकर जो ध्यान करता है, वह मनोऽभिलषित इच्छाओंको प्राप्तकर वैमानिक<sup>४</sup> देव हो जाता है। यदि निष्काम होकर उन हरिकी मूर्तिका ध्यान और स्तवन करे तो मुक्ति प्राप्त हो जाती है। (अध्याय ४४)
१-शब्दकल्पद्रुमके—'धूनयति कम्पयति शत्रून्'—इस व्युत्पत्तिके अनुसार 'धुनी' शब्द कम्पित कर देनेवालेके लिये प्रयुक्त होता है। इसलिये यहाँ प्रसंगानुसार 'स्वः' शब्दका मोक्ष अर्थ मानकर मोक्षको कम्पित (प्रतिबन्धित) करनेवाले अज्ञानको 'स्वर्धुनी' कह सकते हैं। इस तरह अज्ञानको पार कर लेना ही 'स्वर्धुनी' को पार करना समझना चाहिये।
२-आत्मानं रथिनं विद्धि शरीरं रथमेव तु। बुद्धिं च सारथिं विद्धि मनः प्रग्रहमेव च। इन्द्रियाणि हयानाहुर्विषयास्तेषु गोचराः॥
आत्मेन्द्रियमनोयुक्तो भोक्तेत्याहुर्मनीषिणः। यस्तु विज्ञानवानात्मा युक्तेन मनसा सदा॥
स तु तत्पदमाप्नोति स हि भूयो न जायते। विज्ञानसारथिर्यस्तु मनःप्रग्रहवान्नरः॥
स्वर्धुन्याः परमाप्नोति तद्विष्णोः परमं पदम्। (४४।६-९)
३-शब्दकल्पद्रुमके अनुसार द्वारकामें होनेवाली तक्षशिला भी भगवान् विष्णुकी मूर्ति मानी जाती है। इसीलिये जैसे गण्डकी नदीमें होनेवाली चक्रयुक्त शिला (शालग्रामशिला)-में विष्णुका सदा संनिधान है, वैसे ही द्वारकाकी शिलामें भी विष्णुका संनिधान है।
४-वैमानिक देव—शब्दकल्पद्रुमके—'विगतं मानम् उपमा यस्य'—इस व्युत्पत्तिके अनुसार निरुपमेयको विमान कहा जा सकता है। 'विमान एव वैमानिकः' इस व्युत्पत्तिके अनुसार वैमानिक शब्द भी निरुपमेय (उपमारहित)-का बोधक हो सकता है। इसलिये प्रकृतमें 'वैमानिक देव'का अर्थ निरुपमेय—उपमारहित—सर्वोत्कृष्ट देव महाविष्णु किया जा सकता है।