भारतकोश
गरुड़ पुराण

गरुड़ पुराण

Garuda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished634 पृष्ठ

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काण्ड ] वास्तुमण्डल-पूजाविधि ७१


इन चिह्नोंके साथ ही उसमें तीन विन्दु अथवा पाँच विन्दु हों तो वह 'कपिल' नामक शिला है, वह शिला हम सबकी रक्षा करे। उसका पूजन ब्रह्मचारियोंको करना चाहिये। विषम परिमाणवाले दो चक्रोंसे चिह्नित शक्ति-चिह्नसे युक्त शिलाको 'वाराह' शिला कहते हैं। वह हम सबकी रक्षा करे। नीलवर्णवाली, तीन रेखाओंसे युक्त, स्थूल तथा विन्दुयुक्त शिला 'कूर्ममूर्ति' है और वही अगर वर्तुलाकार है तथा उसका पीछेका भाग झुका हुआ हो तो वह शिला 'कृष्ण' कही गयी है, वह हम सबकी रक्षा करे। पाँच रेखावाली शिला 'श्रीधर' नामकी कही जाती है। गदासे अंकित शिला 'वनमाली' है—ये हम सबकी रक्षा करें। गोलाकार तथा छोटी शिला 'वामन' शिला है, बायें भागमें चक्राङ्कित शिला 'सुरेश्वर' की मूर्ति है। विभिन्न रंगोंवाली, अनेक रूपोंवाली, नागके समान फणोंसे युक्त शिला 'अनन्तक' है। स्थूल हो, नीलवर्णकी हो और मध्यमें नीलवर्णका चक्र हो तो वह 'दामोदर'- शिला है। संकुचित द्वारवाली, रक्तवर्णवाली, लम्बी रेखाओंवाली, छिद्रयुक्त, एक चक्र तथा एक कमलवाली विस्तीर्ण शिला 'ब्रह्मशिला' है, ये सब हम सबकी रक्षा करें। विस्तृत छिद्रवाली तथा स्थूल चक्रवाली शिला 'कृष्णशिला' तथा बिल्वाकार शिला 'विष्णुशिला' है। अंकुशके आकारवाली, पाँच रेखाओंवाली तथा कौस्तुभ-चिह्नसे युक्त शिला 'हयग्रीव' शिला है। एक चक्र तथा एक कमलसे अंकित, मणि तथा रत्नोंकी आभासे युक्त कृष्णवर्णकी शिला 'वैकुण्ठ' शिला और द्वारपर रेखावाली, विस्तृत कमलसदृश शिला 'मत्स्यशिला' है—ये हम सबकी रक्षा करें। दाहिनी ओर रेखायुक्त, श्यामवर्णसे समन्वित, रामचक्रसे अंकित 'त्रिविक्रम' नामवाली शिला हम सबकी रक्षा करे। द्वारकामें स्थित, शालग्राममें निवास करनेवाले गदाधारी भगवान्‌को नमस्कार है। एक द्वारवाली, चार चक्रोंसे युक्त, वनमालासे विभूषित, स्वर्णरेखासमन्वित, गोपदसे सुशोभित तथा कदम्बके पुष्पकी आकृतिवाली 'लक्ष्मीनारायण' नामवाली शिला हम सबकी रक्षा करे।

एक चक्रवाले शालग्रामको 'सुदर्शन' कहते हैं, उनके रूपमें वे गदाधारी श्रीविष्णु हम सबकी रक्षा करें। दो चक्र होनेसे शालग्रामशिलाकी 'लक्ष्मीनारायण' संज्ञा होती है। जिसमें तीन चक्र हैं, वह (शिला) 'त्रिविक्रम' की मूर्ति है, चार चक्रवाली चतुर्व्यूह, पाँच चक्रवाली 'वासुदेव', छः चक्रवाली शालग्रामशिला 'प्रद्युम्न', सात चक्रवाली शिला 'संकर्षण', आठ चक्रवाली 'पुरुषोत्तम', नव चक्रवाली शिला 'नवव्यूह', दस चक्रवाली 'दशावतार' तथा ग्यारह चक्रवाली शिला 'अनिरुद्ध' कहलाती है—ये हम सबकी रक्षा करें। बारह चक्रोंसे युक्त शिला 'द्वादशात्मा' है। बारहसे अधिक चक्रकी शिला 'अनन्त' नामवाली है।

जो मनुष्य इस विष्णुमूर्तिमय स्तोत्रका पाठ करता है, उसे स्वर्गकी प्राप्ति होती है।

(अध्याय ४५)


वास्तुमण्डल-पूजाविधि

**श्रीहरिने कहा—**गृहेनिर्माणके प्रारम्भमें जिसके करनेसे समस्त विघ्न नष्ट हो जाते हैं। संक्षेपमें उस वास्तुपूजाकी विधि कहता हूँ, यह पूजा ईशानकोणसे प्रारम्भ होकर इक्यासी पदवाले मण्डपके अन्तर्गत पूर्ण की जानी चाहिये।

इस मण्डलके ईशानकोणमें वास्तुदेवताका मस्तक होता है। नैर्ऋत्यकोणमें उनके दोनों पाद तथा अग्नि और वायुकोणमें दोनों हाथ होते हैं। आवास

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