गरुड़ पुराण
Garuda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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प्रासाद-लक्षण
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निर्मित करे। शुक्रांघ्रिभागको पहलेकी ही भाँति
बनवाकर निर्गम अर्थात् द्वारभागको ऊँचा ही बनवावें—
ऐसा मण्डपनिर्माणका मान है। इसके अतिरिक्त शेष
प्रासाद-भागके स्वरूपको कह रहा हूँ, सुनें—
प्रासाद-मण्डपके अग्रभागमें त्रेवेद अर्थात्
त्रिद्वारीका निर्माण करवाना चाहिये, जिसके क्षेत्रभागमें
देवगण विद्यमान रहते हैं। इस प्रकार प्रासादके
मानका अवधारण करके बाह्य भागका निर्माण
करे।
इस निर्माणकार्यमें प्रासादके चारों ओर एक
पाद परिमाणवाली नेमि या नींवका निर्माण करना
चाहिये। वैसे संसारमें गर्भगृहके परिमाणके अनुसार
नेमिका मान उसका द्विगुण है। भित्तिकी चौड़ाईसे
दो गुणा ऊँचा उसका शिखर भाग होना चाहिये।
लक्षणों एवं स्वरूपकी भिन्नताके कारण प्रासाद
अनेक प्रकारके होते हैं। यथा—वैराज, पुष्पक,
कैलास, मालिका (माणिक) तथा त्रिविष्टप—ये
पाँच प्रकारके प्रासाद हैं। इनमें प्रथम प्रकारका
वैराज नामक प्रासाद सब प्रकारसे चौकोर और
समतल होता है। द्वितीय प्रकारका पुष्पक प्रासाद
आयताकार होता है। तृतीय प्रकारका कैलास
नामक प्रासाद वृत्ताकार, चौथा मालिका नामक
प्रासाद वृत्तायत और पाँचवाँ त्रिविष्टप नामक
प्रासाद अष्टकोणाकार होता है। इस प्रकारसे बने
हुए ये प्रासाद बड़े ही मनोहारी होते हैं। इन
प्रासादोंसे ही अन्य प्रकारके प्रासादोंका स्वरूप
निर्मित हुआ है।
यथा—मेरु, मन्दर, विमान, भद्रक, सर्वतोभद्र,
रुचक, नन्दन, नन्दिवर्धन और श्रीवत्स—ये नौ
प्रकारके चौकोर प्रासाद वैराज नामक प्रासाद
निर्माणकी कलासे ही उत्पन्न हुए हैं।
वलभी, गृहराज, शालागृह, मन्दिर, विमान,
ब्रह्ममन्दिर, भवन, उत्तम्भ और शिविकावेश्म—ये
नौ प्रासाद पुष्पक नामक प्रासादकलासे उत्पन्न हुए
हैं।
वलय, दुन्दुभि, पद्म, महापद्म, मुकुली, उष्णीषी,
शंख, कलश, गुवावृक्ष तथा अन्य वृत्ताकार प्रासाद
कैलास प्रासादसे निकले हैं। गज, वृषभ, हंस,
गरुड, सिंह, सम्मुख, भूमुख, भूधर, श्रीजय तथा
पृथिवीधर—इन प्रासादोंका उद्भव 'मालिका'
(मणिक) नामक वृत्तायत प्रासादसे हुआ है।
वज्र, चक्र, मुष्टिकवधु, वक्रस्वस्तिक, खड्ग,
गदा, श्रीवृक्ष, विजय तथा श्वेत—इन नौ प्रासादोंका
प्रादुर्भाव त्रिविष्टप नामक प्रासादसे हुआ है।
इसके अतिरिक्त त्रिकोण, पद्माकार,
अर्धचन्द्राकार, चतुष्कोण तथा षोडशकोणीय प्रकारसे
भी मण्डपके संस्थानका निर्माण जहाँ-तहाँ किया
जा सकता है, जो क्रमशः—राज्य, ऐश्वर्य, आयुवर्धन,
पुत्रलाभ और स्त्रीप्राप्ति करानेवाले होते हैं।
मुख्यद्वारके स्थानमें ही ध्वजा आदि तथा
गर्भगृहका निर्माण कराना चाहिये। सूत्रके द्वारा सम
संख्याओंसे गुणित मण्डपका निर्माण करके उस
मण्डपके चतुर्थांश अर्थात् चौथाई परिमाणका एक
भद्रगृह निर्मित करवाये। भद्रगृहको समानान्तर
वातायन (रोशनदान)—से अथवा वातायनसे रहित
बनाना चाहिये। कहीं मण्डपकी दीवालके बराबर
अथवा कहीं उससे डेढ़ गुना अथवा कहीं दुगुने
मापके मण्डप बनाये जाने चाहिये। प्रासादके
लतामण्डपकी भूमि विषम तथा चित्र-विचित्र
(रंग-बिरंगी) वर्णकी बनानी चाहिये। परिमाण-
विरोध रहनेपर उसे विषम रेखाओंसे अलंकृत
किया जा सकता है।
प्रासादकी आधारभूमि प्रत्येक दिशाओंमें
अवस्थित चार द्वारों और चार मण्डपोंसे सुशोभित
होनी चाहिये। जो प्रासाद सौ शृंगोंवाला अर्थात् सौ
मीनारोंसे युक्त रहता है, उसे मेरु-संज्ञासे अभिहित