गरुड़ पुराण
Garuda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संक्षिप्त गरुडपुराण
[ आचार-
किया जाता है। यह अन्य प्रासादोंकी अपेक्षा उत्तम
कोटिका होता है। इस प्रकारके प्रासादमें प्रत्येक
मण्डप तीन-तीन भद्रगृहोंसे अलंकृत होने चाहिये।
निर्माणपद्धति, आकार और परिमाणके वैभिन्न्यके
कारण वे प्रासाद भिन्न-भिन्न प्रकारके हो जाते हैं।
जिनमें कुछ प्रासादोंका आधार होता है, किंतु कुछ
आधारसे रहित होते हैं। वे प्रासाद अपने छन्दक
अर्थात् छत-निर्माणके भेदसे भी भिन्न-भिन्न प्रकारके
हो जाते हैं। रचना-पद्धति तथा नामके भेदसे
परस्पर सांकर्यके कारण भी भिन्न-भिन्न प्रकारके
प्रासाद हो जाते हैं।
देवताओंकी विशेषताके कारण बहुत प्रकारके
प्रासाद बताये गये हैं। यद्यपि स्वयंभू (स्वतः
प्रादुर्भूत देवमूर्ति) देवताओंके लिये निर्मित होनेवाले
प्रासादके निमित्त कोई नियम नहीं हैं, तथापि
देवोंके लिये उक्त मानके अनुसार ही उन प्रासादोंका
निर्माण करवाना चाहिये, जो चतुरस्र अर्थात् चौरस
भूमिपर समान चार कोणोंसे समन्वित हों। वे
प्रासाद चन्द्रशालाओं (बारादरी) - से युक्त तथा
भेरीशिखर (नौबतखानों)- से संयुक्त होने चाहिये।
उनके सामनेके भागमें वाहनोंके लिये लघु मण्डप
भी निर्मित हों।
देवप्रासादके द्वारदेशकी सन्निधिमें नाट्यशाला
बनानी चाहिये। प्रासादके विभिन्न दिशाओंके मुख्य
द्वारोंपर अलग-अलग द्वारपाल बनाने चाहिये। उस
देवप्रासादसे कुछ दूर देवालयमें रहनेवाले सेवकवर्गके
लिये आवास बनवाना चाहिये।
देवप्रासादकी भूमि फल, पुष्प और जलसे
परिपूर्ण होनी चाहिये। ऐसे प्रासादोंमें देवताओंको
स्थापित करके उनकी अर्ध्यादिक विविध प्रकारके
उपचारोंसे पूजा करनी चाहिये। वासुदेव तो सर्वमय
हैं, उनके भवनका निर्माण करनेवाला व्यक्ति सभी
फलोंको प्राप्त करता है।
(अध्याय ४७)
देव-प्रतिष्ठाकी सामान्य विधि
सूतजीने कहा- अब मैं सभी देवताओंकी
प्रतिष्ठा-विधिको संक्षेपमें कह रहा हूँ। प्रशस्त
तिथि-नक्षत्रादिमें प्रतिष्ठा करवानी चाहिये।
सर्वप्रथम अपनी वैदिक शाखामें कहे गये
विधानके अनुसार या प्रणव-मन्त्र (ॐकार) - का
उच्चारण करके पाँच या उससे अधिक ऋत्विजोंके
साथ मध्य स्थानमें स्थित आचार्यका वरण करे।
तदनन्तर पाद्य, अर्घ्य और मुद्रिका, वस्त्र-गन्ध-
माल्य एवं अनुलेपनीय द्रव्योंसे उनका पूजन करे।
गुरुको चाहिये कि वे मन्त्रन्यासपूर्वक प्रतिष्ठाकर्मका
समारम्भ करें।
प्रासादके अग्रभागमें दस अथवा बारह हाथका
एक वर्गाकार सोलह खम्भोंवाला मण्डप तैयार
करके उसमें (पूर्वादिक चारों दिशाओं और ईशानादिक
चार विदिशाओंमें एक-एक ध्वजा - इस तरह)
कुल आठ ध्वजोंको प्रतिष्ठित करना चाहिये। तदनन्तर
मण्डपके मध्यभागमें चार हाथ परिमाणकी एक
वेदीका निर्माण कराये। उस वेदीके ऊपरी भागमें
नदियोंके संगम-स्थलके किनारेसे लायी गयी बालुका
बिछाये। प्रधान कुण्डका निर्माण करवाकर उसके
पूर्व दिशामें वर्गाकार, दक्षिणमें धनुषाकार, पश्चिममें
वर्तुलाकार और उत्तरमें पद्माकार - इस प्रकार पाँच
कुण्डोंका निर्माण करवाना चाहिये अथवा सभी
कुण्ड चौकोर रखे जा सकते हैं।
कुण्ड-निर्माणके पश्चात् समस्त कामनाओंकी
सिद्धिके लिये आचार्य, शान्तिकर्मके लिये विहित