गरुड़ पुराण

गरुड़ पुराण
Garuda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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| विषय | पृष्ठ-संख्या | विषय | पृष्ठ-संख्या |
|---|---|---|---|
| द्रव्य तथा औषध-सेवनमें भगवान् विष्णुके स्मरणकी महिमा | ३५० | १९८- नैमित्तिक तथा प्राकृतिक प्रलय और भगवान् विष्णुसे पुनः सृष्टिका प्रादुर्भाव | ४१० |
| १६९- व्याधिहर वैष्णव कवच | ३५० | १९९- कर्मविपाकका कथन | ४११ |
| १७०- सर्वकामप्रदा विद्या | ३५२ | २००- अष्टाङ्गयोग एवं एकाक्षर ब्रह्मका स्वरूप तथा प्रणवजपका माहात्म्य | ४१३ |
| १७१- विष्णुधर्माख्यविद्या | ३५३ | २०१- भगवद्भक्तिनिरूपण तथा भक्तोंकी महिमा | ४१५ |
| १७२- विषहरी गारुडी विद्या तथा भगवान् गरुडके विराट् स्वरूपका वर्णन | ३५४ | २०२- नामसंकीर्तनकी महिमा | ४१९ |
| १७३- त्रिपुराभैरवी तथा ज्वालामुखी आदि देवियोंके पूजनकी विधि | ३५६ | २०३- विष्णुपूजामें श्रद्धा-भक्तिकी महिमा | ४२० |
| १७४- वायुजय-निरूपण | ३५७ | २०४- विष्णुभक्तिका माहात्म्य | ४२१ |
| १७५- उत्तम तथा अधम अश्वोंके लक्षण, अश्वोंके आगन्तुक और त्रिदोषज रोगोंकी चिकित्सा तथा अश्वशान्ति, गजायुर्वेद, गजचिकित्सा और गजशान्ति | ३५८ | २०५- नृसिंहस्तोत्र तथा उसकी महिमा | ४२५ |
| १७६- स्त्रियोंके विविध रोगोंकी चिकित्सा, बालकोंकी रक्षाके उपाय तथा बलवर्धक औषधियाँ | ३६० | २०६- कुलामृतस्तोत्र | ४२७ |
| १७७- गो एवं अश्व-चिकित्सा | ३६१ | २०७- मृत्वष्टकस्तोत्र | ४२८ |
| १७८- औषधियोंके पर्यायवाची नाम | ३६१ | २०८- अच्युतस्तोत्र | ४२९ |
| १७९- व्याकरण-निरूपण | ३६६ | २०९- ब्रह्मज्ञाननिरूपण तथा षडङ्गयोग | ४३४ |
| १८०- व्याकरणसार | ३६७ | २१०- आत्मज्ञाननिरूपण | ४३७ |
| १८१- छन्द-विधान | ३६९ | २११- गीतासार | ४३९ |
| १८२- छन्द-विधान (आर्या आदि वृत्तोंके लक्षण) | ३७० | २१२- गीतासार | ४४० |
| १८३- छन्द-विधान (समवृत्तलक्षण) | ३७२ | २१३- ब्रह्मगीतासार | ४४१ |
| १८४- छन्द-विधान (अर्धसमवृत्त लक्षण) | ३७८ | २१४- ब्रह्मगीतासार | ४४१ |
| १८५- छन्द-विधान (विषमवृत्तलक्षण) | ३७८ | २१५- गरुडपुराणका माहात्म्य | ४४३ |
| १८६- छन्द-विधान (प्रस्तार-निरूपण) | ३८० | धर्मकाण्ड—प्रेतकल्प | |
| १८७- सदाचार एवं शौचाचारका निरूपण | ३८० | २१६- वैकुण्ठलोकका वर्णन, मरणकालमें और मरणके अनन्तर जीवके कल्याणके लिये विहित विभिन्न कर्तव्योंके बारेमें गरुडजीके द्वारा किये गये प्रश्न, प्रेतकल्पका उपक्रम | ४४५ |
| १८८- स्नान तथा संक्षेपमें संध्या-तर्पणकी विधि | ३९० | २१७- मरणासन्न व्यक्तिके कल्याणके लिये किये जानेवाले कर्म, मृत्युसे पूर्वकी स्थिति तथा कर्मविपाकका वर्णन | ४४९ |
| १८९- तर्पण-विधिको वर्णन | ३९२ | २१८- नरकोंका स्वरूप, नरकोंमें प्राप्त होनेवाली विविध यातनाएँ तथा नरकमें गिरनेवाले कर्म एवं जीवकी शुभाशुभ गति | ४५६ |
| १९०- बलिवैश्वदेवनिरूपण | ३९३ | २१९- आसन्नमृत्यु-व्यक्तिके निमित्त किये जानेवाले प्रायश्चित्त, दस दान आदि विविध कर्म, मृत्युके बाद किये जानेवाले कर्म, षट्पिण्डदान, दाह-संस्कारसे पूर्व किये जानेवाले कर्म, दाह-संस्कारके बाद अस्थिसंचयनादि कर्म तथा गृहप्रवेशके समयके कर्म, दुर्मृत्युकी गति, नारायणबलिका विधान, पुत्तलदाहविधि तथा पञ्चक-मृत्युके कृत्य | ४६३ |
| १९१- संध्याविधि | ३९४ | २२०- आशौचमें विहित कृत्य, आशौचकी अवधि, दशगात्रविधि, प्रथमषोडशी, मध्यमषोडशी तथा | |
| १९२- पार्वणश्राद्धविधि | ३९४ | ||
| १९३- नित्यश्राद्ध, वृद्धिश्राद्ध एवं एकोद्दिष्टश्राद्धका वर्णन | ३९९ | ||
| १९४- सपिण्डीकरणश्राद्धकी विधि | ४०० | ||
| १९५- धर्मसारका कथन | ४०२ | ||
| १९६- प्रायश्चित्तनिरूपण, चान्द्रायणादि विभिन्न व्रतोंके लक्षण तथा पञ्चगव्य-विधान | ४०४ | ||
| १९७- भगवान् विष्णुकी महिमा, चतुष्पाद-धर्मनिरूपण, पुराणों तथा उपपुराणों और अठारह विद्याओंका परिगणन, चारों युगोंके धर्मोंका कथन एवं कलियुगमें नामसंकीर्तनका माहात्म्य | ४०७ |